यीशु की मृत्यु किस वर्ष हुई?


प्रश्न: यीशु की मृत्यु किस वर्ष हुई?

उत्तर:
यीशु की मृत्यु और उसके पश्‍चात् उसका पुनरुत्थान संसार की सृष्टि के पश्‍चात् घटित होने वाली सबसे महत्वपूर्ण घटनाएँ हैं। मसीह की मृत्यु के माध्यम से परमेश्‍वर ने उन लोगों से जो उस से पाप के कारण "दूर" हो गए थे और "उसकी शारीरिक देह में मृत्यु के द्वारा तुम्हारा भी मेल कर लिया ताकि [तुम्हें] अपने सम्मुख पवित्र और निष्कलंक, और निर्दोष बनाकर उपस्थित करे" (कुलुस्सियों 1:21-22)। और मसीह के पुनरुत्थान के माध्यम से परमेश्‍वर ने दयालुता से "अपनी बड़ी दया से हमें जीवित आशा के लिये नया जन्म दिया" (1 पतरस 1:3)। जैसा कि अधिकांश घटनाओं के साथ यह लिपिबद्ध है, बाइबल हमें इसकी सही तिथि प्रदान नहीं करती है कि यीशु की मृत्यु कब हुई थी। परन्तु हम इसे सटीकता से इसे पता लगाने की समझ प्रदान करती है।

यद्यपि संसार की समय रेखा ऐतिहासिक रूप से ईसा पूर्व (मसीह के आने से पहले) और ईस्वी सन् (एनो डोमीनी- "हमारे प्रभु के वर्ष में"), के मध्य विभाजित है, तौभी यीशु मसीह का जन्म वास्तव में 6 और 4 ईसा पूर्व में हुआ था। हम इसी तिथि तक हेरोदेस महान् की मृत्यु के आधार पर पहुँचते हैं, जो कि 4 ईसा पूर्व में अपनी मृत्यु हो जाने से लेकर 47 ईसा पूर्व तक यहूदिया का राजा था। "हेरोदेस की मृत्यु के बाद" ही यूसुफ और मरियम के साथ यीशु को मिस्र से इस्राएल वापस लौटने के लिए कहा गया था (मत्ती 2:19)।

कई अन्य तथ्य भी हैं जो हमें यीशु की मृत्यु के वर्ष को इंगित करने की अनुमति देते हैं। हम जानते हैं कि यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले ने अपनी सेवकाई का आरम्भ 26 ईस्वी सन् में किया, जो कि लूका 3:1 में दिए हुए ऐतिहासिक वर्णन के ऊपर आधारित है। कदाचित् यीशु ने अपनी सेवकाई को यूहन्ना के द्वारा सेवकाई को आरम्भ कर देने के ठीक पश्‍चात् आरम्भ की थी। तब यीशु ने अगले साढ़े तीन वर्षों तक सेवा की। इस तरह से, उसकी सेवकाई का अन्त 29-30 ईस्वी सन् में हुआ होगा।

पेन्तुस पिलातुस को 26-36 ईस्वी सन् में यहूदिया पर शासन करने के लिए जाना जाता है। क्रूसीकरण की घटना एक फसह के मध्य में घटित हुई थी (मरकुस 14:12), और इस सच्चाई, के साथ ही खगोलीय घटनाएँ (यहूदी पंचाग चन्द्रमा-आधारित था), इस अध्ययन को दो तिथियों — 7 अप्रैल, 30 ईस्वी सन्, और 3 अप्रैल, 33 ईस्वी सन् तक सीमित कर देता है। दोनों तिथियों का समर्थन करने वाले विद्वानों के तर्क पाए जाते हैं; उत्तरोत्तर तिथि (33 ईस्वी सन्) यीशु के द्वारा और अधिक लम्बे समय तक सेवकाई को करते रहने और इसे बाद में आरम्भ करने की मांग करती हैं। लूका 3:1 से यीशु के द्वारा सेवा को आरम्भ करने के बारे में हम जो कुछ पाते हैं, उसके बारे में पहले की तिथि (30 ईस्वी सन्) अधिक सटीक प्रतीत होती है।

मसीह के समय से लेकर अब तक विश्‍व के मंच पर बहुत कुछ घटित हुआ है, परन्तु कुछ ऐसा भी घटित नहीं हुआ है, जिसने जो कुछ 30 ईस्वी सन् में घटित हुआ था — अर्थात् संसार के उद्धारकर्ता की मृत्यु और पुनरुत्थान की घटना की तीव्रता और अर्थ को कम कर दिया हो।

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