लोग क्यों मर जाते हैं?


प्रश्न: लोग क्यों मर जाते हैं?

उत्तर:
लोगों के मरने का कारण "मूल पाप" के नाम से पुकारे जाने वाली बात है – अर्थात् अदन की वाटिका में आदम और हव्वा के द्वारा की गई आज्ञा की अवहेलना के कारण लोग मरते हैं। परमेश्‍वर ने पहले जोड़े को चेतावनी दी थी कि उसकी व्यवस्था का उल्लंघन करने से उनकी मृत्यु होगी (उत्पत्ति 2:17), और ऐसा ही हुआ। "पाप की मजदूरी मृत्यु है" (रोमियों 6:23क)।

आदम और हव्वा को सदैव के लिए परमेश्‍वर के साथ रहना था, इसलिए कदाचित् उन्हें यह भी नहीं पता था कि "मरने" का क्या अर्थ होता है। दुर्भाग्यवश, पाप ने अनन्त काल में कुछ समय पहले स्वर्गदूतों के स्वर्गीय लोक पर आक्रमण किया था और शैतान ने हव्वा की परीक्षा ली और वह पाप में गिर गई। हव्वा ने अपने पति को खाने के लिए फल दिया और उसने भी उसकी तरह ही पाप किया। यह पाप संसार में मृत्यु को ले आया क्योंकि मानव जाति ने स्वयं को जीवन के स्रोत से अलग कर लिया।

उस समय से लेकर, एक स्त्री के द्वारा पुरूष की सहायता से उत्पन्न प्रत्येक व्यक्ति पापी सन्तान के रूप में ही उत्पन्न होती है। पाप का यह स्वभाव अपने साथ मृत्यु को ले आता है। "इसलिये जैसा एक मनुष्य के द्वारा पाप जगत में आया, और पाप के द्वारा मृत्यु आई, और इस रीति से मृत्यु सब मनुष्यों में फैल गई, क्योंकि सब ने पाप किया" (रोमियों 5:12)।

उत्पत्ति 3 उस शाप का वर्णन करता है, जिसे परमेश्‍वर ने इस संसार पर उच्चारित किया था। शाप के इन शब्दों में आदम को भी सम्मिलित किया गया था: "और अपने माथे के पसीने [जमीन] की रोटी खाया करेगा, और अन्त में मिट्टी में मिल जाएगा क्योंकि तू उसी में से निकाला गया है; तू मिट्टी तो है और मिट्टी ही में फिर मिल जाएगा"(उत्पत्ति 3:19)। शरीर की शारीरिक मृत्यु यही है, जिसकी परमेश्‍वर ने यहाँ बात की थी। आदम और हव्वा की तुरन्त शारीरिक मृत्यु नहीं हुई, परन्तु, उनके पाप के कारण, निर्दोष जानवर मर गए (उत्पत्ति 3:21)।

दूसरी तरह की मौत, जो आदम और हव्वा के पाप के कारण आई आत्मिक मृत्यु थी- उनकी आत्माओं को परमेश्‍वर की आत्मा से अलग कर दिया गया था; उनकी संगति टूट गई थी। यह आत्मिक मृत्यु मना किए फल को खा लेने के तुरन्त पश्‍चात् आई और वे भयभीत और शर्म में थे (उत्पत्ति 3:10)। आत्मिक मृत्यु, शारीरिक मृत्यु की तरह, उनके वंशजों के ऊपर भी स्थानान्तरित हो गई थी (इफिसियों 2:1)।

तब से लेकर आदम, मानव जाति ने "पाप और मृत्यु की व्यवस्था" के अधीन काम किया है (रोमियों 8:2)। परमेश्‍वर ने अपनी भलाई में पाप और मृत्यु की व्यवस्था को समाप्त करने के लिए अपने पुत्र को भेजा और "आत्मा की व्यवस्था जो जीवन देती है" को स्थापित किया है (रोमियों 8:2)। पहला कुरिन्थियों 15: 20-26 कहता है कि, "परन्तु सचमुच मसीह मुर्दो में से जी उठा है, और जो सो गए हैं उनमें वह पहला फल हुआ। क्योंकि जब मनुष्य के द्वारा मृत्यु आई, तो मनुष्य ही के द्वारा मरे हुओं का पुनरुत्थान भी आया। और जैसे आदम में सब मरते हैं, वैसे ही मसीह में सब जिलाए जाएँगे... सबसे अन्तिम बैरी जो नष्ट किया जाएगा, वह मृत्यु है।"

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