मुझे परमेश्‍वर में क्यों विश्‍वास करना चाहिए?


प्रश्न: मुझे परमेश्‍वर में क्यों विश्‍वास करना चाहिए?

उत्तर:
परमेश्‍वर में विश्‍वास सारे मानवीय सरोकारों के प्रति सबसे अधिक मूलभूत है। एक व्यक्ति के द्वारा सृष्टिकर्ता को स्वीकार करना उसके बारे में और अधिक जानने के लिए आधारभूत है। परमेश्‍वर में विश्‍वास किए बिना, उसे प्रसन्न करना या यहाँ तक कि उसके पास आना भी असम्भव है (इब्रानियों 11:6)। लोग परमेश्‍वर के अस्तित्व के प्रमाण से घिरे हुए हैं, और यह केवल पाप की कठोरता के द्वारा है कि लोग उसके प्रमाण को अस्वीकार करते हैं (रोमियों 1:18-23)। परमेश्‍वर में अविश्‍वास करना मूर्खता है (भजन 14:1)।

जीवन में दो विकल्प पाए जाते हैं। सबसे पहले, हमारे पास मनुष्यों के सीमित तर्क के ऊपर विश्‍वास करने का विकल्प है। मनुष्यों के तर्क ने विभिन्न दर्शनों, कई विश्‍व धर्मों और "पंथों", विभिन्न सम्प्रदायों, और अन्य विचारों और वैश्‍विक दृष्टिकोणों को उत्पन्न किया है। मनुष्य के तर्क की एक प्रमुख विशेषता यह है कि यह बना नहीं रहता है, क्योंकि मनुष्य स्वयं स्थायी नहीं है। यह मनुष्य के सीमित ज्ञान से भी सीमित है; हम उतने बुद्धिमान नहीं हैं, जितना कि हम सोचते हैं कि हम हैं (1 कुरिन्थियों 1:20)। मनुष्य का तर्क स्वयं से ही आरम्भ होता है और स्वयं के ही साथ समाप्त हो जाता है। मनुष्य समय की सीमा से बाहर निकले हुए इसी में रहता है। मनुष्य का जन्म लेता है, वह परिपक्वता तक बढ़ता है, अपने प्रभाव को पूरे संसार के ऊपर डालता है, और अन्ततः मर जाता है। स्वाभाविक रूप से बोलना, यह उसके स्वयं के लिए है। तर्क के द्वारा जीवन यापन करने का विकल्प एक व्यक्ति को तराजू में जीवन यापन करने के लिए छोड़ देता है और वह सब कुछ की प्राप्ति को चाहता है। यदि एक व्यक्ति निष्पक्षता से ऐसी जीवनशैली के बारे में सोचता है, तो उसे दूसरे विकल्प के ऊपर विचार करना चाहिए।

हमारे पास दूसरा विकल्प बाइबल के परमेश्‍वर के प्रकाशन को स्वीकार करना है। "... तू अपनी समझ का सहारा न लेना" (नीतिवचन 3:5)। नि:सन्देह, बाइबल परमेश्‍वर की ओर से है, को स्वीकार करने के लिए एक व्यक्ति को परमेश्‍वर को स्वीकार करना चाहिए। बाइबल के परमेश्‍वर में विश्‍वास तर्क के उपयोग को अस्वीकार नहीं करता है; अपितु, जब हम परमेश्‍वर की खोज करते हैं, तब वह हमारी आँखें खोलता है (भजन संहिता 119:18), हमारी समझ को प्रबोधित करता है (इफिसियों 1:18), और हमें ज्ञान प्रदान करता है (नीतिवचन 8)।

परमेश्‍वर में विश्‍वास करना परमेश्‍वर के अस्तित्व के प्रमाण के द्वारा थामे रहता है, जो कि आसानी से उपलब्ध है। सारी सृष्टि एक सृष्टिकर्ता की सच्चाई के प्रति एक चुप रहने वाली गवाह की तरह है (भजन संहिता 19:1-4)। परमेश्‍वर की पुस्तक, बाइबल, अपनी वैधता और ऐतिहासिक सटीकता को स्थापित करती है। उदाहरण के लिए, मसीह के पहले आगमन से सम्बन्धित पुराने नियम की एक भविष्यद्वाणी के ऊपर विचार करें। मीका 5:2 कहता है कि मसीह का जन्म यहूदिया के बेतलेहेम में होगा। मीका ने 700 ईसा पूर्व अपनी भविष्यद्वाणी दी थी। सात शताब्दियों के पश्‍चात् मसीह ने कहाँ जन्म लिया था? उसका जन्म यहूदिया के बेतलेहेम में हुआ, जैसे कि मीका ने भविष्यद्वाणी की थी (लूका 2:1-20; मत्ती 2:1-12)।

विज्ञान बोलता है (पृष्ठ 100-107) नामक पुस्तक में पीटर स्टोनर ने दिखाया है कि पवित्रशास्त्र का भविष्यद्वाणी से भरे हुए सन्दर्भ का संयोग के विज्ञान की सम्भावना वाले दृष्टिकोण के द्वारा इन्कार कर दिया गया है। मसीह से सम्बन्धित आठ भविष्यद्वाणियों के सन्दर्भ में विज्ञान की सम्भावना के नियमों का उपयोग करके, स्टोनर ने पाया कि कोई भी व्यक्ति जो सभी आठों भविष्यद्वाणियों को पूरा करेगा, उसे 10 में से 1 की अपेक्षा 17 गुणा बल के साथ होना होगा। यह 100,000,000,000,000,000 में 1 अवसर ही होगा। और यहाँ तो केवल आठ भविष्यद्वाणियों के ऊपर विचार करने की बात हो रही है; यीशु ने और भी बहुत कुछ को पूरा किया है। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि भविष्यद्वाणी के अनुसार बाइबल की सटीकता और विश्‍वसनीयता को प्रमाणित किया जा सकता है।

बाइबल के पठ्न से, हम पाते हैं कि परमेश्‍वर अनन्तकालीन, पवित्र, व्यक्तिगत्, दयालु और प्रेमी है। परमेश्‍वर ने अपने पुत्र, प्रभु यीशु मसीह के देहधारण के द्वारा समय की सीमा को तोड़ दिया है। परमेश्‍वर के प्रेम से भरी हुई गतिविधि मनुष्यों के तर्क के ऊपर अतिक्रमण नहीं करती है, अपितु मनुष्य के तर्क को ज्ञान प्रदान करती है, ताकि वह यह समझने लगे कि उसे परमेश्‍वर के पुत्र के माध्यम से क्षमा और अनन्त जीवन की आवश्यकता है।

निश्‍चित रूप से, कोई भी बाइबल के परमेश्‍वर को अस्वीकार कर सकता है, और कई लोग करते भी हैं। जो कुछ यीशु मसीह ने किया है, लोग उसे अस्वीकार कर सकते हैं। मसीह को अस्वीकार करना परमेश्‍वर को अस्वीकार करना है (यूहन्ना 10:30)। आप इसके प्रति क्या करेंगे? क्या आप मनुष्यों के सीमित, दोषपूर्ण तर्क से अपने जीवन को यापन करेंगे? या आप अपने सृष्टिकर्ता को स्वीकार करेंगे और बाइबल में परमेश्‍वर के दिए हुए प्रकाशन को स्वीकार करेंगे? "अपनी दृष्‍टि में बुद्धिमान न होना; यहोवा का भय मानना, और बुराई से अलग रहना। ऐसा करने से तेरा शरीर भला चँगा, और तेरी हड्डियाँ पुष्‍ट रहेंगी" (नीतिवचन 3:7-8)।

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