यदि परमेश्वर सर्वज्ञानी है तो वह प्रश्नों को क्यों पूछता है?


प्रश्न: यदि परमेश्वर सर्वज्ञानी है तो वह प्रश्नों को क्यों पूछता है?

उत्तर:
परमेश्वर सर्वज्ञानी है — वह सब कुछ जानता है। हम पवित्रशास्त्र में भी देखते हैं जहाँ परमेश्वर प्रश्नों को पूछता है। अदन के बाग में, परमेश्वर आदम से पूछता है कि वह कहाँ है और उसने क्या किया है (उत्पत्ति 3:9, 11)। स्वर्ग में, वह शैतान से पूछता है कि वह कहाँ गया था (अय्यूब 1:7)। जंगल में, परमेश्वर मूसा से पूछता है कि उसके हाथ में क्या है (निर्गमन 4:2)। याईर के घर जाने वाले मार्ग में भीड़ से, यीशु पूछता है कि उसे किसने छुआ (मरकुस 5:30)। सर्वज्ञ होने के नाते, परमेश्वर पहले से ही इन प्रश्नों के उत्तरों को जानता था। "वह तो मन की गुप्‍त बातों को जानता है" (भजन संहिता 44:21)। इस कारण वह क्यों पूछता है?

परमेश्वर जिन प्रश्न को पूछता है वह सदैव एक उद्देश्य को पूरा करते हैं। वह जानकारी को प्राप्त करने के लिए उन्हें नहीं पूछता है, क्योंकि वह पहले से ही सारी जानकारी को रखता है; उसके प्रश्न एक भिन्न उद्देश्य की पूर्ति करते हैं, और यह उद्देश्य प्रश्न के सन्दर्भ और उस व्यक्ति की आवश्यकताओं के आधार पर भिन्न होता है, जिस पर प्रश्न को निर्देशित किया जाता है।

आदम और हव्वा के द्वारा वर्जित फल खाने और स्वयं को परमेश्वर से छिपा लेने के पश्चात्, परमेश्वर ने ऐसे पुकारा, "तू कहाँ है?" (उत्पत्ति 3:9)। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि, परमेश्वर को आदम के भौतिक स्थान का पता था; यह प्रश्न का बिन्दु नहीं था। आदम को छिपने से रोकने के लिए प्रश्न को तैयार किया गया था। परमेश्वर दण्ड और त्वरित न्याय के कठोर शब्दों के साथ, क्रोध में अपनी पापी सृष्टि के पास आ सकता था, परन्तु उसने ऐसा नहीं किया। इसकी अपेक्षा, परमेश्वर ने आदम से एक प्रश्न किया और इस तरह अपने अनुग्रह, नम्रता और मेल-मिलाप की इच्छा को दिखाया।

जब एक युवा विद्यार्थी को मूल रूप में अंकगणित पढ़ाते हैं, तो एक शिक्षिका पूछ सकती है कि, "2 + 2 क्या होता है?" शिक्षिका यह इसलिए नहीं पूछती है क्योंकि वह उत्तर नहीं जानती है, अपितु इसलिए कि वह समस्या पर विद्यार्थी का ध्यान आकर्षित करना चाहती है। जब परमेश्वर ने आदम से पूछा, "तू कहाँ हो?" तो प्रश्न का उद्देश्य, आदम को उस समस्या पर ध्यान देना के लिए था, जिसमें वह और उसकी पत्नी उलझ रहे थे।

पवित्रशास्त्र में परमेश्वर के अन्य प्रश्नों के अन्य उद्देश्य हो सकते हैं। अय्यूब 38-41 में, परमेश्वर ने अय्यूब की अनुपस्थिति में सब कुछ के रचे जाने के बारे में निरन्तर प्रश्न किया अर्थात् जब पृथ्वी की नींव रखी गई थी, से लेकर (अय्यूब 38:4), समुद्र के दैत्यों को पकड़ने की अय्यूब की अक्षमता इत्यादि तक (अय्यूब 41:1)। यहाँ, यह स्पष्ट है कि परमेश्वर अपनी सामर्थ्य और सम्प्रभुता पर जोर देने के लिए एक निर्देशात्मक औजार के रूप में प्रश्नों का उपयोग कर रहा है।

योना से परमेश्वर का निरन्तर प्रश्न यह रहा है कि, "तेरा क्रोध, क्या वह उचित है?" (योना 4:4, 9) ये प्रश्न योना के लिए स्वयं की-परीक्षा करने के लिए उसके मन में हलचल उत्पन्न करने के लिए किया गया था। एलिय्याह के लिए परमेश्वर का प्रश्न यह था कि, "तू यहाँ क्या कर रहा है?" (1 राजा 19:9) ये प्रश्न बताता है कि कैसे एलिय्याह अपने लिए परमेश्वर के उद्देश्य से भटक रहा था। यशायाह की उपस्थिति में परमेश्वर का प्रश्न यह था कि, "मैं किस को भेजूँ? और हमारी ओर से कौन जाएगा? "(यशायाह 6:8) इस प्रश्न में भविष्यद्वक्ता को स्वेच्छिक रूप से जाने के लिए उकसाए जाने का प्रभाव पाया जाता है।

इस पृथ्वी पर यीशु की सेवकाई के समय में, वह अक्सर प्रश्न पूछता था। एक अच्छा शिक्षक सीखने की प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने के लिए रणनीतिक प्रश्नों का उपयोग करेगा, और यीशु मुख्य शिक्षक था। यीशु ने सीखने के अवसर को प्रदान करने के लिए कई बार प्रश्नों को पूछा था: "लोग क्या कहते हैं कि मैं कौन हूँ?" (मरकुस 8:27)। या किसी महत्वपूर्ण बात के ऊपर उसके श्रोताओं का ध्यान केन्द्रित करने के लिए प्रश्न को पूछा था: "व्यवस्था में क्या लिखा है?...तू इसे कैसे पढ़ते है?" (लूका 10:26)। या आत्मनिरीक्षण का संकेत देने के लिए प्रश्न किया था: "क्या तू चँगा होना चाहता है?" (यूहन्ना 5:6)। या गहरी सोच को समझने के लिए प्रश्न किया था: "फिर यह क्या लिखा है : 'जिस पत्थर को राजमिस्त्रियों ने निकम्मा ठहराया था, वही कोने का सिरा हो गया'?" (लूका 20:17)। या विश्वास को प्रकाश में लाने के लिए प्रश्न किया: "मुझे किसने छुआ?" (लूका 8:45)। या एक बड़ा प्रकाशन को प्रगट करने के लिए प्रश्न किया: "तू क्यों रोती है? किसको ढूँढ़ती है? "(यूहन्ना 20:15)।

परमेश्वर ऐसा पिता है जो भाषा का उपयोग सम्बन्ध के सन्दर्भ के भीतर रहते हुए सिखाने के लिए करता है। वह एक शिक्षक है जो अपने विद्यार्थियों को शिक्षण सम्मिलित करने के लिए प्रश्नों का उपयोग करता है, उन्हें सोचने के लिए मजबूर करता है, और उन्हें सच्चाई की ओर इंगित करता है। जब वह एक प्रश्न पूछता है, तो ऐसा नहीं है कि वह उत्तर नहीं जानता है, परन्तु क्योंकि जानना चाहता है कि हम उत्तर को जानें।

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