एक व्यक्ति का सुसमाचारक होना क्या होता है?


प्रश्न: एक व्यक्ति का सुसमाचारक होना क्या होता है?

उत्तर:
एक सुसमाचारक वह होता है, जो शुभ सन्देश की घोषणा करता है; दूसरे शब्दों में, सुसमाचार का प्रचारक या मिशनरी। सुसमाचार के वरदान के साथ एक व्यक्ति अक्सर वह होता है, जो सुसमाचार प्रचार करने और पश्‍चाताप की बुलाहट को लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर यात्रा करता है। चारों सुसमाचारों के मानवीय लेखकों - मत्ती, मरकुस, लूका और यूहन्ना - को भी कभी-कभी "सुसमाचारक" कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने वास्तव में यीशु मसीह - "शुभ सन्देश" की सेवकाई को लिपिबद्ध किया था।

इफिसियों 4:11–13 में कहा गया है, “उसने कुछ को प्रेरित नियुक्‍त करके, और कुछ को भविष्यद्वक्‍ता नियुक्‍त करके, और कुछ को सुसमाचार सुनानेवाले नियुक्‍त करके, और कुछ को रखवाले और उपदेशक नियुक्‍त करके दे दिया, जिस से पवित्र लोग सिद्ध हो जाएँ और सेवा का काम किया जाए और मसीह की देह उन्नति पाए, जब तक कि हम सब के सब विश्‍वास और परमेश्‍वर के पुत्र की पहिचान में एक न हो जाएँ, और एक सिद्ध मनुष्य न बन जाएँ और मसीह के पूरे डील-डौल तक न बढ़ जाएँ।” प्रेरितों के काम 21:8 में फिलिप्पुस को एक प्रचारक के रूप में नामित किया गया है, और 2 तीमुथियुस 4:5 में पौलुस तीमुथियुस को उपदेश देता कि वह सुसमाचार प्रचारक के काम को करे। पूरी बाइबल में शब्द सुसमाचारक का केवल तीन बार उपयोग हुआ है। अन्य लोगों को भी "सुसमाचारक" माना जा सकता है, जिन्होंने शुभ सन्देश का प्रचार किया था, जिसमें यीशु मसीह (लूका 20:1) और पौलुस (रोमियों 1:15) इत्यादि भी सम्मिलित हैं, परन्तु फिलिप्पुस ऐसा व्यक्ति है, जिसे विशेष रूप से पवित्रशास्त्र में सुसमाचारक कहा जाता है।

फिलिप्पुस चुने गए सात डीकनों में से एक था, ताकि प्रेरित शिक्षा और प्रार्थना के कार्य को कर सकें (प्रेरितों के काम 6:2-4)। स्पष्ट है, फिलिप्पुस कैसरिया में बस गया था और वह वहाँ पर पौलुस के प्रेरितों के काम 21 में आने से पहले लगभग 20 वर्षों तक रहा था। फिलिप्पुस का इससे पहले का प्रचार कार्य सामरिया में था (प्रेरितों के काम 8:4–8)। उसने सामरियों को "मसीह के बारे में घोषणा की थी" (वचन 5) और दुष्टात्माओं को बाहर निकालते हुए और लकवा मारे हुए को चँगा करते हुए आश्‍चर्यकर्मों को किया था। यह उल्लेखनीय है कि फिलिप्पुस ने यीशु के नाम पर पानी का बपतिस्मा दिया, परन्तु पवित्र आत्मा का बपतिस्मा तब तक नहीं उतरा था जब तक कि प्रेरित सामरिया में नहीं आए।

पतरस और यूहन्ना की सामरिया में उपस्थिति और पवित्र आत्मा का विश्‍वास करते हुए सामरियों में वास करना (प्रेरितों के काम 8:17) फिलिप्पुस की सेवकाई की पुष्टि है। एक प्रचारक के रूप में, फिलिप्पुस ने सुसमाचार का प्रचार किया था, और जब सामरी लोगों ने विश्‍वास किया और आत्मा को प्राप्त किया, तो उनका कलीसिया में स्वागत किया गया। जहाँ पहले यहूदियों और सामरी लोगों के बीच विभाजन और शत्रुता थी, वहाँ अब प्रेम का आत्मिक बन्धन विद्यमान हो गया (कुलुस्सियों 3:14)। फिलिप्पुस के पथप्रदर्शन करने वाले प्रयासों ने उसके श्रोताओं को विश्‍वास के द्वारा पवित्र आत्मा को प्राप्त करने की नींव को रखा। सुसमाचारक के द्वारा उद्धार से पूर्व का कार्य यही होता है, जिसमें वह सुसमाचारक कहलाता है।

सुसमाचारक के रूप में फिलिप्पुस की सेवकाई प्रेरितों के काम 8 में चलती रहती है, क्योंकि वह गाजा के रेगिस्तानी मार्ग पर जाने के लिए एक स्वर्गदूत से अगुवाई पाता है। मार्ग पर उसकी मुलाकात कूश की रानी के अधिकारी से होती है। फिलिप्पुस परमेश्‍वर के वचन के बारे में उस मनुष्य की समझ खोलता है, और वह खोजा उद्धार को प्राप्त करता है। फिलिप्पुस उस मनुष्य को बपतिस्मा देता है, और पवित्र आत्मा फिलिप्पुस को वहाँ से उठा लेता है (प्रेरितों के काम 8:39)। फिलिप्पुस बाद में "अशदोद में आ निकला, और जब तक कैसरिया में न पहुँचा, तब तक नगर नगर सुसमाचार सुनाता गया" (वचन 40)। जहाँ कहीं वह जाता है, फिलिप्पुस सुसमाचार को साझा करता है। यही सुसमाचार प्रचारक करते हैं।

तीमुथियुस को मुक्ति-पूर्व के उपदेश को देने के लिए कहा गया था जो "एक प्रचारक का काम" है (2 तीमुथियुस 4:5)। शुभ सन्देश का यही प्रचार, महान आदेश में शिष्यों के लिए और हम सभी के लिए युग के अन्त तक की सामान्य बुलाहट है (मत्ती 28:16–20)। यहूदा 1:3 में, सभी सन्तों को विश्‍वास के लिये पूरा यत्न करना है, जिसे पवित्र लोगों को एक ही बार सौंपा गया था।, और, वचन 23 में हमें "बहुतों को आग में से झपटकर निकालना है।"

सुसमाचारक के पद की आवश्यकता तब तक होगी जब तक कलीसिया स्वयं मसीह की परिपक्वता तक नहीं पहुँच जाती (इफिसियों 4:13)। शुभ सन्देश का अर्थ इसे साझा करना है। और हमारे पास सबसे अच्छा शुभ सन्देश यह है कि - यीशु मर गया और फिर से जी उठा और उन सभों को बचाता है, जो उसको पुकारते हैं (रोमियों 10:9–13)।

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