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प्रश्न

परमेश्वर कैसा है?

उत्तर


संसार के इतिहास में प्रत्येक संस्कृति की कुछ धारणा रही है कि परमेश्वर कैसा है। कुछ ने माना है कि परमेश्वर वातावरण के नियन्त्रण में हैं और उन्होंने एक तूफानी देवता की प्रतिमाओं के चारों ओर बिजली के लपटों (कनान में बाल देवता की पूजा) को चलते हुए उसे रच लिया है। कुछ लोगों ने माना है कि परमेश्वर बहुत अधिक सामर्थी है, और इसलिए उन्होंने सबसे सामर्थी वस्तु की पूजा की जिसे वे देख सकते हैं, जैसे सूर्य (मिस्र में रा देवता की पूजा)। दूसरों ने यह मान लिया है कि परमेश्वर प्रत्येक स्थान में विद्यमान है और इसलिए उसने सब कुछ की पूजा करनी आरम्भ की (स्तोइक दर्शनशास्त्र में सर्वेश्वरवाद)। कुछ लोगों ने यह माना है कि परमेश्वर जाना ही नहीं जा सकता है और इसलिए ये लोग अज्ञेयवाद की ओर मुड़ गए हैं, या सिर्फ अपनी बात को बचाने के लिए, “एक अज्ञात् परमेश्वर” की पूजा करते है (प्रेरितों के काम 17:23)।

इन धारणाओं में से प्रत्येक के साथ समस्या यह है कि वे केवल ये उस चित्र का भाग मात्र हैं जो परमेश्वर है। हाँ, परमेश्वर का नियन्त्रण वातावरण में है, परन्तु वह इसके साथ बहुत अधिक बातों को नियन्त्रित करता है। वह सामर्थी है, परन्तु वह सूर्य की तुलना में कहीं अधिक सामर्थी है। वह प्रत्येक स्थान में व्याप्त है, परन्तु वह सब कुछ से परे अर्थात् उच्च भी है । और, धन्यवाद सहित कहना, जबकि कुछ बातें ऐसी हैं जिन्हें हम परमेश्वर के बारे में नहीं समझते हैं, तथापि वह जानने योग्य है। वास्तव में, उसने बाइबल में उसके बारे में जो कुछ हमें आवश्यक रूप से जानने के लिए प्रकाशित किया है, वह सब कुछ बता दिया है। परमेश्वर चाहता है कि वह जाना जाए (भजन संहिता 46:10)।

नॉर्मन गिस्सलर और फ्रैंक टुरेक ने अपनी पुस्तक आई डोन्ट हेव एनफ फेथ टू बी एन एथीइस्ट अर्थात् एक नास्तिक होने के लिए मेरे पास पर्याप्त विश्वास नहीं है, में जो कहा है, वह निम्नलिखित है:

• सत्य की खोज होती है, आविष्कार नहीं। यह किसी की भी ज्ञान के विरूद्ध स्वतंत्र रूप से विद्यमान है। (न्यूटन के आने से पहले गुरुत्वाकर्षण विद्यमान था।)

• सत्य पारलौकिक है; यदि कुछ सत्य है, तो यह सभी लोगों के लिए, सभी स्थानों पर, हर समय सत्य रहता है। (2 + 2 = 4 सभी के लिए, हर स्थान, हर समय में है।)

• सत्य अपरिवर्तनशील है भले ही सत्य के प्रति हमारी मान्यताएँ क्यों न परिवर्तित हो जाएँ। (जब हमने यह विश्वास करना आरम्भ किया कि पृथ्वी सपाट की अपेक्षा गोल है, तो पृथ्वी के बारे में सच्चाई परिवर्तित नहीं हुई, केवल पृथ्वी के बारे में हमारी मान्यता परिवर्तित हो गई।)

इसलिए, जैसा कि हम यह पता लगाने का प्रयास करते हैं कि परमेश्वर कैसा है, हम केवल यहाँ पहले से ही विद्यमान सत्य की खोज करने का प्रयास कर रहे हैं।

सबसे पहले, परमेश्वर विद्यमान है। बाइबल कभी भी परमेश्वर के अस्तित्व के लिए वाद-विवाद नहीं करती है; यह सरलता से उसके होने को बताती है। यह तथ्य कि परमेश्वर है उसके द्वारा रचे गए कार्यों के माध्यम से स्वयं-ही-स्पष्ट होना चाहिए (भजन संहिता 19:1-6)। उत्पत्ति 1:1 कहती है कि, “आदि में परमेश्‍वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्‍टि की।” यह एक सरल परन्तु सामर्थी कथन है। ब्रह्माण्ड में समय, स्थान, पदार्थ और ऊर्जा सम्मिलित है, जिससे कि ब्रह्माण्ड में पाए जाने वाले सभी समझ में आने वाले तत्व परमेश्वर के आदेश से अस्तित्व में आए। अल्बर्ट आइंस्टीन की थ्योरी ऑफ जनरल रिलेटिविटी अर्थात् सामान्य सम्बन्धात्मकता के सिद्धान्त में कहा गया है कि सारे समय, स्थान और पदार्थ का एक निश्चित, एक साथ आरम्भ हुआ था। जिसका आरम्भ हुआ है उसके पीछे उसका एक कारण है। यह कार्य-कारण का नियम है, और परमेश्वर की सच्चाई आसानी से सर्वोच्च कारक के रूप में व्याख्या करती है। परमेश्वर सब कुछ का सृष्टिकर्ता है, और इसलिए हम उसके बारे में और कुछ को जानते हैं: कि वह सर्वशक्तिमान है (योएल 1:15), वह अनन्त काल से स्वयं-अस्तित्व में है (भजन संहिता 90:2), और वह सृष्टि के ऊपर और इस से परे विद्यमान है (भजन संहिता 97:9)।

वही परमेश्वर जिसने सभी वस्तुओं की सृष्टि की है, उन वस्तुओं को नियन्त्रित भी करता है। वह प्रभुता सम्पन्न है (यशायाह 46:10)। वह जो किसी वस्तु का निर्माण करता है, उसके पास उसका स्वामित्व होता है और वह उसे वैसे उपयोग करने की सामर्थ्य रखता है जैसे वह उसे सही देखता है। अन्तिम कारक के पास ही अन्तिम अधिकार है। यशायाह 44:24 में परमेश्वर स्वयं को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है, “जो सब का बनानेवाला है, जिसने अकेले ही आकाश को ताना और पृथ्वी को अपनी ही शक्‍ति से फैलाया है।” अगला वचन यह कहता है कि, “मैं बुद्धिमानों को पीछे हटा देता और उनकी पण्डिताई को मूर्खता बनाता हूँ” (यशायाह 44:25)। यह स्पष्ट रूप से ऐसा परमेश्वर है सामर्थ्य के वह करता है जो उसे आनन्द देता है।

परमेश्वर आत्मा है (यूहन्ना 4:24) और सृष्टि की कोई भी वस्तु उसका प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती है; वास्तव में, ऐसे प्रतिनिधित्व को सृजन करने का प्रयास ही ईश-निन्दा है (निर्गमन 20:4-6)। परमेश्वर अपरिवर्तनीय है (मलाकी 3:6)। परमेश्वर सर्वज्ञ है (1 यूहन्ना 3:20) और सभी स्थानों में — विद्यमान है (भजन संहिता 139:7-13)। वह पवित्र और महिमामयी है (यशायाह 6:3)। वह धर्मी है (व्यवस्थाविवरण 32:4) और वह सभी पापों और अधर्म का न्याय करेगा (यहूदा 1:15)।

परमेश्वर का न्याय एक और सत्य को उजागर करता है कि वह कैसा है: वह एक नैतिक प्राणी है। सी. एस. लुईस, ने मीअर क्रिस्चीऐनिटी अर्थात् केवल मसीहियत नामक पुस्तक में, ऐसा कहते हैं कि, ठीक वैसे ही जैसे कि प्रकृति में अवलोकन करने योग्य नियम (गुरुत्वाकर्षण, एन्ट्रापी अर्थात् उत्क्रम-माप, इत्यादि) विद्यमान हैं, नैतिकता के भी अवलोकन करने योग्य कानून हैं। वह लिखते हैं कि, “पहले, यह कि पूरी पृथ्वी में, मानवीय प्राणी के बीच में, जिज्ञासा वाला यह विचार पाया जाता है कि उन्हें एक निश्चित तरीके से व्यवहार करना चाहिए, और वास्तव में उन्हें इससे छुटकारा नहीं मिल सकता है। दूसरा, यह कि वे वास्तव में उस तरह से व्यवहार नहीं करते हैं। वे प्रकृति के नियम को जानते हैं; वे इसे तोड़ते हैं। ये दो तथ्य हमारे और उस ब्रह्माण्ड के बारे में हमारी सारी स्पष्ट सोच की नींव है जिसमें हम रहते हैं।” सही और गलत के गठन के बारे में विभिन्न विचारों के होने के पश्चात् भी, एक सार्वभौमिक विश्वास यह पाया जाता है कि सही और गलत विद्यमान हैं, और यह परमेश्वर का प्रतिबिम्ब है जिसने हमारी सृष्टि की है (उत्पत्ति 1:26; सभोपदेशक 3:11)।

जब यीशु ने हमारे संसार में प्रवेश किया, तो उसने हमें पिता को दिखाया (यूहन्ना 14:7-9)। यीशु के माध्यम से, हम समझते हैं कि परमेश्वर खोए हुए को बचाने का प्रयास करता है (लूका 19:10)। वह तरस खाता है (मत्ती 14:14), वह दयालु है (लूका 6:36), और वह क्षमा करने वाला है (मत्ती 9:1-1)। ठीक उसी समय, यीशु हमें दिखाता है कि परमेश्वर न पश्चाताप किए हुए पाप का न्याय करेगा (लूका 13:5) और परमेश्वर उन लोगों पर क्रोधित है जो झूठे तरीके से जीवन यापन करते हैं और सच्चाई को स्वीकार करने से इन्कार कर देते हैं (मत्ती 23)।

इन सब बातों से भी बढ़कर, यीशु ने हमें दिखाया कि परमेश्वर प्रेम है (1 यूहन्ना 4:8)। यह प्रेम ही था कि परमेश्वर ने अपने पुत्र को संसार में भेजा (यूहन्ना 3:16)। यह प्रेम ही था कि यीशु पापियों के लिए क्रूस पर मर गया (रोमियों 5:8)। यह प्रेम ही है कि वह अभी भी पापियों को पश्चाताप के लिए बुलाता है कि ताकि वे परमेश्वर के अनुग्रह का अनुभव प्राप्त करें और परमेश्वर की सन्तान कहे जाएँ (1 यूहन्ना 3:1)।

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