जब मैं स्वर्ग में पहुँचूँगा, तो "अच्छा और विश्‍वासयोग्य दास" सुनने के लिए मुझे क्या करने की आवश्यकता है?


प्रश्न: जब मैं स्वर्ग में पहुँचूँगा, तो "अच्छा और विश्‍वासयोग्य दास" सुनने के लिए मुझे क्या करने की आवश्यकता है?

उत्तर:
यीशु के द्वारा दिए हुए तोड़ों के दृष्टान्त में, परमेश्‍वर दो विश्‍वासयोग्य सेवकों के बारे में बताता है, जिन्हें स्वामी की सम्पत्ति को बढ़ाने के लिए जो कुछ दिया गया था, उसका उन्होंने उपयोग किया। जब स्वामी लम्बे समय की अनुपस्थिति के पश्‍चात् लौट कर आया, तो उसने अपने दो विश्‍वासयोग्य सेवकों को पुरस्कृत किया और उनमें से प्रत्येक को ऐसे कहा, "धन्य, हे अच्छे और विश्‍वासयोग्य दास, तू थोड़े में विश्‍वासयोग्य रहा; मैं तुझे बहुत वस्तुओं का अधिकारी बनाऊँगा। अपने स्वामी के आनन्द में सहभागी हो!" (मत्ती 25:21, 23)। हर मसीही विश्‍वासी स्वर्ग में किसी दिन यीशु के होंठों से इन शब्दों को सुनना चाहता है।

हम विश्‍वास के द्वारा अनुग्रह से बचाए जाते हैं (इफिसियों 2:8-9), परन्तु हम "भले कामों के लिए सृजे गए" हैं (इफिसियों 2:10)। यीशु ने स्वर्ग में धन इकट्ठा करने की बात की थी (मत्ती 6:20), और उसका तोड़ों का दृष्टान्त उन लोगों के लिए विभिन्न प्रतिफलों को दिए जाने के संकेत देता है, जो इस संसार में ईमानदारी से उसकी सेवा करते हैं।

यीशु से इन शब्दों, "धन्य, हे अच्छे और विश्‍वासयोग्य दास" को सुनने के लिए, सबसे पहले यह सुनिश्‍चित करें कि आप बचाए गए हैं। अविश्‍वासी उन शब्दों को कभी नहीं सुनेंगे, क्योंकि "विश्‍वास के बिना परमेश्‍वर को प्रसन्न करना अनहोना है" (इब्रानियों 11:6)। और पहचानें कि यीशु न केवल आपका उद्धारकर्ता है; अपितु वह आपका प्रभु भी है (लूका 6:46 को देखें)। "आनन्द से यहोवा की सेवा करो!" (भजन संहिता 100:2)।

यहाँ कुछ विचार दिए गए हैं, जिनका पालन करके आप प्रभु की सेवा कर सकते हैं:

1. सुसमाचार को साझा करें — प्रभु यीशु चाहता है कि हम दूसरों को शिष्य बनाए, परमेश्‍वर के स्वभाव और चरित्र की शिक्षा दें और उसकी मृत्यु और पुनरुत्थान के अर्थ को साझा करें (मत्ती 28:18-20)।

2. वंचितों की सहायता करें — लूका 16:19-31 में धनी व्यक्ति और लाज़र की कहानी में, धनी व्यक्ति की निन्दा की जाती है, क्योंकि वह लाजर की सहायता नहीं करता है और क्योंकि वह अपनी सम्पत्ति पर बहुत अधिक भरोसा करता है। दूसरों की आवश्यकताओं से पहले अपनी स्वयं-की-सन्तुष्टि को प्राथमिकता न दें। पहला यूहन्ना 3:17 कहता है, "पर जिस किसी के पास संसार की सम्पत्ति हो और वह अपने भाई को कंगाल देखकर उस पर तरस खाना न चाहे, तो उसमें परमेश्‍वर का प्रेम कैसे बना रह सकता है?"

3. दूसरों के द्वारा दी गई ठेसों के कारण उन्हें क्षमा करें — यह मेल-मिलाप या भरोसे के जैसा नहीं है, परन्तु इसका अर्थ यह है कि आप प्रतिशोध को लेना छोड़ देते हैं। प्रभु यीशु ने क्षमा के आदर्श को प्रस्तुत किया है: "वह गाली सुनकर गाली नहीं देता था, और दु:ख उठाकर किसी को भी धमकी नहीं देता था, पर अपने आप को सच्‍चे न्यायी [पिता] के हाथ में सौंपता था"(1 पतरस 2:23)।

4. अपने अधिकार के पद को अपने अधीन लोगों की सहायता करने के अवसर के रूप में देखें, और स्वयं के अधीनस्थ अधिकार को आपके अधिकारियों के अधीन ठीक उसी तरह अधीन होने के द्वारा आदर्श को प्रस्तुत करें जैसे यीशु ने पिता के अधिकार के प्रति किया था। इन दोनों तरीकों में, आप मसीह जैसा हो सकते हैं, क्योंकि यीशु भिन्न लोगों के लिए स्वामी और सेवक दोनों था। "तुम एक दूसरे का भार उठाओ, और इस प्रकार मसीह की व्यवस्था को पूरी करो" (गलतियों 6:2)।

5. कलीसिया की संगति के माध्यम से परमेश्‍वर के चरित्र को सर्वोत्तम तरीके से जानने, उपदेश सुनने, बाइबल का अध्ययन करने, प्रार्थना करने और इतिहास को लिपिबद्ध करने के द्वारा कि वह आपके जीवन में कैसे सम्मिलित हैं, परमेश्‍वर की खोज करें।

6. पहचानें कि हर लाभकारी पदवी, जो आपके पास है, परमेश्‍वर के कारण हैं, जो प्रत्येक आशीष का स्रोत है, और: "हर एक अच्छा वरदान और हर एक उत्तम दान ऊपर ही से है, और ज्योतियों के पिता की ओर से मिलता है..." (याकूब 1:17)।

7. अप्रसिद्ध होने के लिए तैयार रहें, यीशु के दृष्टान्त में अच्छे सामरी की तरह दुर्लभ साहस को प्रदर्शित करें (लूका 10:30-37)। जो कुछ भी बाइबल कहती है, वहीं करे जो सदैव सही है। "... तब पतरस और अन्य प्रेरितों ने उत्तर दिया, "मनुष्यों की आज्ञा से बढ़कर परमेश्‍वर की आज्ञा का पालन करना ही हमारा कर्तव्य है" (प्रेरितों के काम 5:29)।

8. आत्मनिर्भर हो नैतिक न्याय में (अपने स्वयं के चरित्र का मूल्यांकन करना), अपने संदिग्ध कार्यों और दृष्टिकोणों को तर्कसंगत बनाने की अपेक्षा यीशु के चरित्र को माप के रूप में देखें। नम्रता दिखाएँ।

यह सब कुछ इस स्थान पर ले आता है: परमेश्‍वर से किसी भी अन्य वस्तु की तुलना में अधिक प्रेम करना, और ईमानदारी से दूसरों के साथ प्रेम करना (मरकुस 12:30-31)। मसीह के न्याय सिंहासन के समय, जो प्रभु के प्रति विश्‍वासयोग्य हैं, जिन्हें उसने बचाया है, इन शब्दों को सुनेंगे, "धन्य, हे अच्छे और विश्‍वासयोग्य दास।" प्रभु का कोई भी सच्चा सेवक इस से और अधिक की मांग नहीं कर सकता है।

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जब मैं स्वर्ग में पहुँचूँगा, तो "अच्छा और विश्‍वासयोग्य दास" सुनने के लिए मुझे क्या करने की आवश्यकता है?