क्या यीशु काला था?


प्रश्न: क्या यीशु काला था?

उत्तर:
कुछ समूह ऐसे हैं, जो सामान्य रूप में "काले इब्री" आन्दोलन के साथ किसी न किसी रूप में सम्बद्ध हैं, जो बड़ा जोर देते हुए तर्क देते हैं कि यीशु की त्वचा का रंग दिखावे में/काला/अफ्रीकी त्वचा वाला रंग था। यद्यपि यह सीधे ही इस तथ्य के विरुद्ध चला जाता है कि बाइबल यीशु के यहूदी होने की घोषणा करती है, जिसका अर्थ है कि उसके पास गहरे भूरे रंग की त्वचा थी, अन्त में, यह चर्चा/तर्क-वितर्क मुख्य बात को ही खो देती है। क्या यह वास्तव में अर्थ रखता है कि हम यीशु की त्वचा का रंग जानें — चाहे वह काली, पीली, भूरी या श्वेत ही क्यों न हो? यद्यपि यह कुछ लोगों के लिए एक विवादास्पद विषय हो सकता है, सच्चाई तो यह है कि हम यह नहीं जानते हैं कि यीशु की त्वचा का रंग क्या था। जबकि यीशु के यहूदी होने के अँसख्य सन्दर्भ पाए जाते हैं, इसका कारण उसकी विरासत से है, बाइबल बहुत ही कम सन्दर्भों को उपलब्ध कराती है, यदि कोई हो, कि यीशु अपने दिखावे में किस तरह का रहा होगा।

यह भविष्यद्वक्ता यशायाह है, जो हमें यीशु के शारीरिक दिखावे का सबसे अच्छा वर्णन देता है: "वह उसके सामने अँकुर के समान, और ऐसी जड़ के समान उगा जो निर्जल भूमि में फूट निकले; उसकी न तो कुछ सुन्दरता थी कि हम उसको देखते, और न उसका रूप ही हमें ऐसा दिखाई पड़ा कि हम उसको चाहते" (यशायाह 53:2)। यदि यीशु की त्वचा का रंग और स्वरूप महत्वपूर्ण होता, तो परमेश्वर ने हमें उसके बारे में बताया होता। इसके अतिरिक्त, यह अनुमान लगाना कि यीशु का या तो यह रंग था या वह, ऐसी जानकारी का अनुमान लगाना है, जो कि पवित्रशास्त्र के भीतर नहीं पाई जाती है। इस कारण, अनुमान को लगाना व्यर्थ है (1 तीमुथियुस 1:4; तीतुस 3:9)। मुख्य विषय यह है कि यह छुटकारे की पूरी योजना में कोई अर्थ नहीं देता कि यीशु की त्वचा का रंग क्या था (इफिसियों 1:7; कुलुस्सियों 1:14)।

इसलिए, जब बात यीशु की आती है, तो क्या हमें स्वयं के प्रति इसे लेकर कोई चिन्ता करनी चाहिए? पतरस हमें बताता है, "क्योंकि उसकी ईश्‍वरीय सामर्थ्य ने सब कुछ जो जीवन और भक्‍ति से सम्बन्ध रखता है, हमें उसी की पहचान के द्वारा दिया है, जिसने हमें अपनी ही महिमा और सद्गुण के अनुसार बुलाया है" (2 पतरस 1:3)। दूसरे शब्दों में, मसीह ने हमें इस पृथ्वी पर और स्वर्ग दोनों में, महिमा और नैतिक उत्कृष्टता के जीवन के लिए बुलाया है। हम उसकी महिमा के लिए शुद्ध और धर्मी जीवन जीते हैं। इस वचन का सन्देश स्पष्ट है कि: यह उसकी महिमा और भलाई है, जो मनुष्य को उसके लिए जीवन और धर्म की खोज करने के लिए आकर्षित करती है। जिस तरह से वह दिखता है या उसकी त्वचा का रंग है, उससे इसका कोई लेना-देना नहीं है।

पतरस हमें यह भी बताता है कि परमेश्वर "किसी का पक्ष नहीं करता, वरन् हर जाति में जो उससे डरता और धर्म के काम करता है, वह उसे भाता है" (प्रेरितों के काम 10:34-35)। जब यीशु ने हमें सारे संसार में जाने और सुसमाचार को फैलाने के लिए बुलाया (मत्ती 28:18-20), तो वह हमें यह कह रहा था कि कोई सांस्कृतिक या नस्लीय अवरोध नहीं हैं, और यह कि हम सभी यीशु मसीह में एक हैं। पौलुस ने गलातिया की कलीसियाओं को लिखे अपने पत्र में कहा है कि, "अब न कोई यहूदी रहा और न यूनानी, न कोई दास न स्वतन्त्र, न कोई नर न नारी, क्योंकि तुम सब मसीह यीशु में एक हो" (गलातियों 3:28)। हमारे उद्धारकर्ता की त्वचा के रंग का हमारे द्वारा सुसमाचार को साझा करने पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। न ही हमारे पड़ोसी की त्वचा का रंग हमारे द्वारा उसे सुसमाचार के सन्देश को प्रदान करने पर कोई प्रभाव डालती है (रोमियों 1:16)। पहली सदी की कलीसिया के प्रेरितों ने विदेशी देशों की संस्कृतियों को अपना लिया था, परन्तु उन्होंने ऐसा मसीह की व्यवस्था के प्रति उनकी विश्वासयोग्यता के साथ समझौता करते हुए कभी नहीं किया था (1 कुरिन्थियों 9:19-23)।

जब भी पौलुस ने नई संस्कृति या विदेशी भूमि में प्रवेश किया, उसने अपनी शिक्षा के तरीके को बदल दिया, परन्तु उसने कभी भी अपना सन्देश नहीं बदला। वह उन्हीं बातों का प्रचार करता रहा, जो उसने सदैव सिखाई थीं, चाहे उसके सुनने वालों की त्वचा का रंग कैसा भी क्यों न नहीं था। जो बात मूल्य रखती थी वह यह थी कि उन्हें मसीह का सुसमाचार प्राप्त हुआ। सच्चाई तो यह है कि मसीह के सुसमाचार के सन्देश ने तब भी कार्य किया और सुसमाचार का सन्देश आज भी काम करता है! यह अभी भी उन लोगों के मनों तक पहुँचता है, जो परमेश्वर को जानने के लिए लालसा रखते हैं, चाहे वे काले, श्वेत, पीले या भूरे हों। यह यीशु की त्वचा का रंग या हमारे पड़ोसी की त्वचा का रंग नहीं है, जो हमारे शाश्वत गंतव्य में अर्थ रखता है। परन्तु यह जिस कार्य को करता है, वह यह है कि "किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं; क्योंकि स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिसके द्वारा हम उद्धार पा सकें" (प्रेरितों के काम 4:12)।

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