क्या यीशु एक भविष्यद्वक्ता था?


प्रश्न: क्या यीशु एक भविष्यद्वक्ता था?

उत्तर:
भविष्यद्वक्ता को कई कार्यों को करने वालों के रूप में बाइबल में प्रस्तुत किया गया है। पहला, भविष्यद्वक्ता परमेश्वर के प्रवक्ता होता है। जब इस्राएल के लोगों ने भविष्यद्वक्ता शमूएल से एक राजा के लिए मांग की, तो परमेश्वर ने शमूएल से कहा कि, "वे लोग जो कुछ तुझ से कहें उसे मान ले; क्योंकि उन्होंने तुझ को नहीं परन्तु मुझी को निकम्मा जाना है कि मैं उनका राजा न रहूँ" (1 शमूएल 8:7)। शमूएल इस्राएल के लोगों तक परमेश्वर के वचन को पहुँचाने के लिए जिम्मेदार था, और परमेश्वर कहता है कि वह शमूएल के अधिकार और शब्दों का स्रोत था। इस प्रकार, शमूएल भविष्यद्वक्ता परमेश्वर का प्रतिनिधि था।

पुराने नियम के कई अन्य वचनों में भी ऐसे कथन पाए जाते हैं, जैसे "प्रभु का वचन आया," जो यह दर्शाता है कि सन्देश का स्रोत परमेश्वर था और भविष्यद्वक्ता नहीं (उदाहरण के लिए, 2 शमूएल 7:4; 2 राजा 20:4; यिर्मयाह; 1:4; यहेजकेल 3:16; और होशे, योएल, मीका, योना, और सपन्याह के आरम्भिक वचन)। इसी तरह से, यीशु ने एक स्वर्गीय सन्देश की शिक्षा दी कि: "मेरा उपदेश मेरा नहीं, परन्तु मेरे भेजनेवाले का है"(यूहन्ना 7:16)। उसने यह भी कहा कि "जैसे मेरे पिता ने मुझे सिखाया वैसे ही ये बातें कहता हूँ" (यूहन्ना 8:28)। यीशु की महायाजकीय प्रार्थना में, वह कहता है कि, "जो वचन तू ने मुझे दिये, मैं ने उन्हें उनको पहुँचा दिये" (यूहन्ना 17:8)। इस प्रकार, यीशु ने एक भविष्यद्वक्ता की भूमिका को स्पष्ट रूप से पूरा किया, क्योंकि वह परमेश्वर के लिए एक प्रवक्ता था।

बाइबल में एक भविष्यद्वक्ता का दूसरा प्राथमिक कार्य यह होता है कि जिसे लोग सामान्य रूप में उस समय के बारे में सोचते हैं, जब वे भविष्यद्वाणी वाली शब्दावली को सुनते हैं, और यह भविष्य की घटनाओं के बारे में ईश्वरीय प्रकाशन के माध्यम से भविष्यद्वाणी करना या पूर्वसूचना देना होता है। पहले से बताना, यद्यपि, भविष्यद्वक्ताओं का सबसे सामान्य कार्य नहीं है, तथापि यह उनकी प्राथमिक भूमिका का एक और रूप है। परमेश्वर की ओर से बोलने में, कभी-कभी सन्देश में भविष्य को पहले से ही बता देना सम्मिलित होता है। यीशु ने भविष्य की भविष्यद्वाणी की जब उसने अपने शिष्यों से कहा कि "अवश्य है कि मैं यरूशलेम को जाऊँ, और पुरनियों, और प्रधान याजकों, और शास्त्रियों के हाथ से बहुत दु:ख उठाऊँ; और मार डाला जाऊँ; और तीसरे दिन जी उठूँ" (मत्ती 16:21)। यह भविष्यद्वाणी सभी चारों सुसमाचारों के विवरणों में लिपिबद्ध है (मत्ती 27-28; मरकुस 15-16; लूका 22-24; और यूहन्ना 18-20)। यीशु ने यह भी भविष्यद्वाणी की थी कि, उसके स्वर्गारोहण के कुछ समय बाद, शिष्यों को पवित्र आत्मा के आगमन पर सामर्थ्य प्राप्त होगी (प्रेरितों के काम 1:8)। प्रेरितों के काम 2 में भविष्यद्वाणी की पूर्ति लिपिबद्ध की गई है : प्रेरितों ने पवित्र आत्मा का वरदान प्राप्त किया और अन्य भाषाओं में बात की जिन्हें वे नहीं जानते थे, जिसके द्वारा उन्होंने यरूशलेम में पिन्तेकुस्त के दिन उपस्थित कम से कम पन्द्रह भिन्न भाषाई समूहों में सुसमाचार में प्रचार किया। इस प्रकार, यीशु ने एक भविष्यद्वक्ता की भूमिका को स्पष्ट रूप से पूरा किया, जैसा कि उसने भविष्यद्वाणी की थी।

कुछ लोग मानते हैं कि भविष्यद्वक्ताओं का तीसरा कार्य चँगाई और आश्चर्यकर्म के कामों को करना था। मूसा ने लाल सागर को दो भाग करते हुए कई अन्य आश्चर्यकर्मों को किया (निर्गमन 14:21–22)। एलिय्याह ने एक ऐसा आश्चर्यकर्म किया जब उसने एक बलिदान को जलाने के लिए स्वर्ग से आग को नीचे आने के लिए पुकारा (1 राजा 18:36–38)। एलीशा ने एक ऐसा आश्चर्यकर्म किया कि जब उसने कुल्हाड़ी को पानी में तैरा दिया (2 राजा 6:6)। सभी चारों सुसमाचार के विवरण यीशु को कई आश्चर्यकर्मों और चँगाई के कामों को करते हुए लिपिबद्ध करते हैं (जैसे, मत्ती 8:14–15; मरकुस 1:40–45; लूका 8:42–48; और यूहन्ना 6:16–21)।

जब अन्य लोग यीशु का उल्लेख करते हैं, तो वे इसका उपयोग उसे "भविष्यद्वक्ता" की पदवी देते हुए कई बार सुसमाचार में करते हैं (मत्ती 21:11; लूका 7:16; यूहन्ना 4:19)। यीशु ने भी स्वयं को मरकुस 6:4 में भविष्यद्वक्ता के रूप में बताया।

परमेश्वर ने मूसा से कहा था कि वह किसी दिन उसके जैसा एक और भविष्यद्वक्ता इस्राएल में भेजेगा, और मैं "अपना वचन उसके मुँह में डालूँगा; और जिस जिस बात की मैं उसे आज्ञा दूँगा वही वह उनको कह सुनाएगा" (व्यवस्थाविवरण 18:18)। यीशु भविष्यद्वक्ता था, जिसने उस भविष्यद्वाणी को पूरा किया (देखें प्रेरितों के काम 3:22; 7:37)। यीशु ने भविष्यद्वक्ता की सभी शर्तों को अपने पद, वचन और कार्य से पूरा किया। वह अन्तिम भविष्यद्वक्ता है, जो स्वयं परमेश्वर का वचन है (यूहन्ना 1:1)।

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