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प्रश्न

कुँवारी मरियम के बारे में बाइबल क्या कहती है?

उत्तर


मरियम को यीशु की माता के रूप में वर्णन करते हुए परमेश्‍वर की ओर से "अत्यधिक अनुग्रह" प्राप्त करने वाले के रूप में प्रस्तुत किया गया है (लूका 1:28)। अत्यधिक अनुग्रह प्राप्त शब्द एक यूनानी शब्द से आया है, जिसका अनिवार्य रूप से अर्थ "बहुत अधिक अनुग्रह" से है। मरियम ने परमेश्‍वर के अनुग्रह को प्राप्त किया था।

अनुग्रह "शर्तहीन कृपा" होता है; अर्थात्, अनुग्रह एक ऐसी आशीष है, जिसे हम इस सच्चाई के पश्‍चात् भी प्राप्त करते हैं कि हम इसे पाने के योग्य नहीं हैं। मरियम को परमेश्‍वर और एक उद्धारकर्ता से अनुग्रह की उतनी ही आवश्यकता थी, जितनी कि हम में से शेष सभी लोगों को होती है। मरियम ने स्वयं इस तथ्य को समझा, जैसा कि उसने लूका 1:47 में घोषित किया है कि, "मेरी आत्मा मेरे उद्धार करने वाले परमेश्‍वर में आनन्दित हुई।"

परमेश्‍वर के अनुग्रह से कुँवारी मरियम ने स्वीकार किया कि उसे उद्धारकर्ता की आवश्यकता है। बाइबल कभी यह नहीं कहती है कि मरियम कोई और नहीं अपितु एक साधारण मनुष्य थी, जिसे परमेश्‍वर ने असाधारण तरीके से उपयोग करने के लिए चुना था। जी हाँ, मरियम एक धर्मी स्त्री थी और परमेश्‍वर द्वारा कृपा (अनुग्रहित) को प्राप्त किए हुए थी (लूका 1:27-28)। उसी समय, मरियम एक पापी मनुष्य भी थी, जिसे यीशु मसीह के रूप में अपने लिए उद्धारकर्ता की आवश्यकता थी (सभोपदेशक 7:20; रोमियों 3:23; 6:23; 1 यूहन्ना 1:8)।

कुँवारी मरियम का "निष्कलंक गर्भाधारण" नहीं हुआ था। बाइबल ऐसा कोई सुझाव नहीं देती है, अपितु वह बताती है कि मरियम का जन्म एक सामान्य मानवीय जन्म था। मरियम एक कुँवारी थी, जब उसने यीशु को जन्म दिया (लूका 1:34–38), परन्तु वह स्थायी रूप से कुँवारी नहीं रही थी। मरियम के पास सदैव कौमार्य रहने का विचार बाइबल आधारित नहीं है। मत्ती 1:25, यूसुफ की बात करते हुए घोषणा करता है कि, “और जब तक वह पुत्र न जनी तब तक वह उसके पास न गया: और उसने उसका नाम यीशु रखा।” यह शब्द जब तक स्पष्ट रूप से इंगित करता है कि यूसुफ और मरियम के यीशु के जन्म के पश्‍चात् सामान्य यौन सम्बन्ध रहे थे। उद्धारकर्ता के जन्म तक मरियम कुँवारी रही, परन्तु बाद में यूसुफ और मरियम के कई बच्चे हुए। यीशु के चार सौतेले भाई: याकूब, यूसुफ, शमौन और यहूदा थे (मत्ती 13:55)। यीशु की सौतेली बहनें भी थीं, यद्यपि उनका नाम या सँख्या नहीं दी गई है (मत्ती 13:55-56)। परमेश्‍वर ने कई अन्य बच्चों को देकर मरियम को आशीष और सम्मान दिया था, जो उस संस्कृति में एक स्त्री के ऊपर परमेश्‍वर की आशीष के लिए स्पष्ट संकेत के रूप में स्वीकार किया जाता था।

एक बार जब यीशु उपदेश दे रहे थे, तो भीड़ में से एक स्त्री ने घोषणा की, "धन्य है वह गर्भ जिसमें तू रहा और वे स्तन जो तू ने चूसे" (लूका 11:27)। यीशु के लिए इस घोषणा को करने का इससे अधिस उत्तम अवसर और कोई भी नहीं हो सकता था कि मरियम वास्तव में प्रशंसा और श्रद्धा के योग्य थीं। तथापि यीशु की प्रतिक्रिया क्या थी? "हाँ; परन्तु धन्य वे हैं जो परमेश्‍वर का वचन सुनते और मानते हैं" (लूका 11:28)। यीशु के लिए, परमेश्‍वर के वचन की आज्ञा का पालन उस स्त्री की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण था, जिसने उद्धारकर्ता को जन्म दिया।

सुसमाचार में कहीं भी यीशु या किसी अन्य ने मरियम की प्रत्यक्ष में प्रशंसा, महिमा, या श्रद्धा को निर्देशित नहीं किया। इलीशिबा, मरियम की सम्बन्धी, ने लूका 1:42-44 में मरियम की बड़ाई की है, परन्तु उसकी यह बड़ाई प्रतिज्ञा किए हुए मसीह को जन्म देने वाली आशीष के ऊपर आधारित है। यह मरियम के भीतर अन्तर्निहित महिमा के ऊपर आधारित नहीं थी। वास्तव में, इसके पश्‍चात् मरियम ने प्रभु की स्तुति के लिए एक गीत को गया है, जिसने उसकी नम्रता से भरी अवस्था को और उसकी दया और विश्‍वासयोग्यता के लिए समर्पित किया गया है (लूका 1:46–55)।

कई लोगों का विश्‍वास है कि मरियम सुसमाचार के लिखे जाने के लिए लूका के स्रोतों में से एक थी (देखें लूका 1:1-4)। लूका स्वर्गदूत जिब्राईल को मरियम के पास जाने और उसे यह बताने के लिए कहता है कि वह एक पुत्र को जन्म देगी, जो उद्धारकर्ता होगा। मरियम अनिश्‍चित थी कि यह कैसे हो सकता है, क्योंकि वह एक कुँवारी थी। जब जिब्राईल ने उसे बताया कि बच्चा पवित्र आत्मा की ओर से उसके गर्भ में आएगा , तो मरियम ने उत्तर दिया, "मैं प्रभु की दासी हूँ...मुझे तेरे वचन के अनुसार हो। तब स्वर्गदूत उसके पास से चला गया" (लूका 1:38)। मरियम ने विश्‍वास के साथ उत्तर दिया और परमेश्‍वर की योजना को प्रस्तुत करने की इच्छा के प्रति स्वयं को अधीन किया। हमें भी, परमेश्‍वर में ऐसा ही विश्‍वास होना चाहिए और उसी का अनुसरण विश्‍वासयोग्यता के साथ करना चाहिए।

यीशु के जन्म की घटनाओं का वर्णन करने और यीशु के बारे में चरवाहों के सन्देश को सुनने वालों की प्रतिक्रिया में, लूका लिखता है कि, "परन्तु मरियम ये सब बातें अपने मन में रखकर सोचती रही" (लूका 2:19)। जब यूसुफ और मरियम ने यीशु को मन्दिर में प्रस्तुत किया, तो शमौन ने पहचाना कि यीशु उद्धारकर्ता था और उसने परमेश्‍वर की बड़ाई की। यूसुफ और मरियम ने शमौन की कही हुई बातों के ऊपर आश्‍चर्य प्रगट किया। शमौन ने मरियम से कहा, "देख, वह तो इस्राएल में बहुतों के गिरने, और उठने के लिये, और एक ऐसा चिह्न होने के लिये ठहराया गया है, जिसके विरोध में बातें की जाएँगी - वरन् तेरा प्राण भी तलवार से वार पार छिद जाएगा - इससे बहुत हृदयों के विचार प्रगट होंगे" (लूका 2:34–35)।

मन्दिर में एक और समय, जब यीशु बारह वर्ष की आयु का था, मरियम परेशान थी कि जब यीशु पीछे ही रह गया जब उसके माता-पिता ने नासरत को छोड़ा था। वे उसकी खोज में व्यथित हो गए थे। जब उन्होंने उसे पाया, जो अब भी मन्दिर में ही था, तब उसने उनसे कहा कि क्या उसे अपने पिता के घर में नहीं होना चाहिए था (लूका 2:49)। यीशु अपने सांसारिक माता-पिता के साथ नासरत लौट आया और उनके अधीन रहा। हमें एक बार फिर से बताया गया है कि मरियम ने "ये सब बातें अपने मन में रखा" (लूका 2:51)। यीशु का पालन पोषण अवश्य ही एक परेशानी से भरा हुआ कार्य रहा होगा तथापि यह बहुमूल्य क्षणों से भरा हुआ होगा, कदाचित् ऐसी स्मृतियाँ जो मरियम के लिए बहुत अधिक मार्मिक बन गईं होंगी जब मरियम अपनी समझ में और अधिक परिपक्व हुई होगी कि यीशु कौन है। हम भी, अपने मन में परमेश्‍वर के ज्ञान और अपने जीवन में उसकी गतिविधि की स्मृतियों को संजोए रख सकते हैं।

यह मरियम थी, जिसने काना के विवाह में यीशु को हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया था, जहाँ उसने अपने पहले आश्‍चर्यकर्म को प्रगट किया था और पानी को दाखरस में परिवर्तित कर दिया था। यद्यपि यीशु ने पहली बार में उसे झिड़क दिया, परन्तु मरियम ने सेवकों को वही करने का निर्देश दिया, जिसे वह उन्हें बताएगा। उसे उस पर विश्‍वास था (यूहन्ना 2:1-11)।

बाद में यीशु की सार्वजनिक सेवकाई में, उसका परिवार चिन्तित हो गया था। मरकुस 3:20–21 लिपिबद्ध करता है कि, "और ऐसी भीड़ इकट्ठी हो गई कि वे रोटी भी न खा सके। जब उसके कुटुम्बियों ने यह सुना, तो वे उसे पकड़ने के लिए निकले; 'क्योंकि वे कहते थे कि उसका चित ठिकाने नहीं है।'" जब उसका परिवार आया, तो यीशु ने घोषणा की कि जो लोग परमेश्‍वर की इच्छा को पूरा करते है, वहीं उसका परिवार है। यीशु के भाइयों ने उसके क्रूस पर चढ़ाए जाने से पहले उसमें विश्‍वास नहीं किया, परन्तु उनमें से कम से कम दो - याकूब और जूदास (यहूदा) ने बाद में ऐसा किया, जिनके नाम से नए नियम की पुस्तकें पाई जाती हैं।

ऐसा प्रतीत होता है कि मरियम ने अपने पूरे जीवन में यीशु के ऊपर विश्‍वास किया। वह उस समय क्रूस के पास उपस्थित थी, जब यीशु की मृत्यु हुई (यूहन्ना 19:25), कोई सन्देह नहीं है कि उसने उस "तलवार" को महसूस किया होगा जिसकी शमौन ने भविष्यद्वाणी की थी कि वह उसकी आत्मा को छेद देगी। यही वह स्थान है अर्थात् क्रूस का स्थान, जब यीशु ने यूहन्ना से मरियम के पुत्र के रूप में सेवा करने के लिए कहा, और यूहन्ना मरियम को अपने घर में ले गया (यूहन्ना 19:26–27)। मरियम पिन्तेकुस्त के दिन भी प्रेरितों के साथ थी (प्रेरितों के काम 1:14)। यद्यपि, प्रेरितों के काम अध्याय 1 के पश्‍चात् मरियम का फिर कहीं उल्लेख नहीं मिलता है।

प्रेरितों ने मरियम को मुख्य भूमिका नहीं दी है। मरियम की मृत्यु बाइबल में लिपिबद्ध नहीं है। मरियम के स्वर्गारोहण या वहाँ पर ऊँचे स्थान पर विराजमान होने जैसी कोई भी के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। यीशु की सांसारिक माता के रूप में, मरियम का सम्मान किया जाना चाहिए, परन्तु वह हमारी भक्ति या आराधना के योग्य नहीं है।

बाइबल कहीं नहीं बताती है कि मरियम हमारी प्रार्थनाओं को सुन सकती है या वह परमेश्‍वर के पास हमारे लिए मध्यस्थता कर सकती है। यीशु स्वर्ग में हमारा एकमात्र अधिवक्ता और मध्यस्थक है (1 तीमुथियुस 2:5)। यदि भक्ति, आराधना, या प्रार्थना को प्रस्तुत करना है, तो मरियम ठीक वही कहेगी जैसा स्वर्गदूतों ने कहा है कि: "परमेश्‍वर को ही दण्डवत् करो!" (देखें प्रकाशितवाक्य 19:10; 22:9)। मरियम स्वयं हमारे लिए इसका उदाहरण प्रस्तुत करती है, वह अपनी भक्ति, आराधना या स्तुति को परमेश्‍वर की ओर ही निर्देशित करती है: “मेरा प्राण प्रभु की बड़ाई करता है और मेरी आत्मा मेरे उद्धार करनेवाले परमेश्‍वर से आनन्दित हुई, क्योंकि उसने अपनी दासी की दीनता पर दृष्‍टि की है; इसलिये देखो, अब से सब युग-युग के लोग मुझे धन्य कहेंगे, क्योंकि उस शक्‍तिमान ने मेरे लिये बड़े–बड़े काम किए हैं - उसका नाम पवित्र है” (लूका 1:46–49)।

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