बाइबल के अनुसार सच्ची मित्रता क्या है?


प्रश्न: बाइबल के अनुसार सच्ची मित्रता क्या है?

उत्तर:
प्रभु यीशु मसीह सच्चे मित्र की परिभाषा देता है: "इससे बड़ा प्रेम किसी का नहीं कि कोई अपने मित्रों के लिये अपना प्राण दे। जो कुछ मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, यदि उसे मानो तो तुम मेरे मित्र हो। अब से मैं तुम्हें दास न कहूँगा, क्योंकि दास नहीं जानता कि उसका स्वामी क्या करता है; परन्तु मैं ने तुम्हें मित्र कहा है, क्योंकि मैं ने जो बातें अपने पिता से सुनीं, वे सब तुम्हें बता दीं (यूहन्ना 15:13-15)। यीशु एक सच्चे मित्र का शुद्ध उदाहरण है, क्योंकि उसने उसके प्राणों को अपने "मित्रों" के लिए न्योछावर कर दिया है। साथ ही, कोई भी उसके ऊपर उसे अपना व्यक्तिगत् उद्धारकर्ता मानते हुए भरोसा करते हुए उसका मित्र बन सकता है, वह नया जन्म पाता है और उससे नए जीवन को प्राप्त करता है।

दाऊद और शाऊल के मित्र जोनाथन/योनातान के मध्य में सच्ची मित्रता का उदाहरण मिलता है, जो अपने पिता शाऊल के द्वारा दाऊद के प्राणों की खोज में लगे रहने और मार देने के प्रयासों के पश्चात् भी, उसके साथ मित्र के रूप में खड़ा होता है। आप इस कहानी को 1 शमूएल अध्याय 18 में पा सकते हैं। कुछ अन्य महत्वपूर्ण सन्दर्भ 1 शमूएल 18:1-4; 19: 4-7; 20:11-17, 41-42 इत्यादि हैं।

मित्रता के सम्बन्ध में बुद्धि प्राप्त करने के लिए नीतिवचन एक और स्रोत है। "मित्र सब समयों में प्रेम रखता है, और विपत्ति के दिन भाई बन जाता है" (नीतिवचन 17:17)। "मित्रों के बढ़ाने से तो नाश होता है, परन्तु ऐसा मित्र होता है, जो भाई से भी अधिक मिला रहता है" (नीतिवचन 18:24)। यहाँ विषय यह है कि एक मित्र को पाने के लिए, एक व्यक्ति को अवश्य ही मित्र के रूप में होना चाहिए। "जो घाव मित्र के हाथ से लगें वह विश्‍वास योग्य हैं, परन्तु बैरी अधिक चुम्बन करता है" (नीतिवचन 27:6)। "जैसे लोहा लोहा को चमका देता है, वैसे ही मनुष्य का मुख अपने मित्र की संगति से चमकदार हो जाता है" (नीतिवचन 27:17)।

मित्रता का सिद्धान्त आमोस में भी पाया जाता है। "यदि दो मनुष्य परस्पर समहत न हों; तो क्या वे संग चल सकेंगे?" (आमोस 3:3)। मित्र परस्पर सहमत होते हैं। एक मित्र वह व्यक्ति है, जिसके ऊपर आप पूर्ण रूप से विश्‍वास कर सकते हैं। एक मित्र ऐसा व्यक्ति होता है, जिसका आप सम्मान करते हैं और जो आपका सम्मान करता है, यह सम्मान योग्यता के ऊपर आधारित नहीं अपितु मन के परस्पर सहमत होने के ऊपर आधारित होता है।

अन्त में, सच्चे मित्र की वास्तविक परिभाषा प्रेरित पौलुस की ओर से मिलती है: "किसी धर्मी जन के लिये कोई मरे, यह तो दुर्लभ है, परन्तु हो सकता है किसी भले मनुष्य के लिये कोई मरने का भी साहस करे। परन्तु परमेश्‍वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा" (रोमियों 5:7-8)। "इससे बड़ा प्रेम किसी का नहीं कि कोई अपने मित्रों के लिये अपना प्राण दे" (यूहन्ना 15:13)। अब, यही सच्ची मित्रता होती है!

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