क्यों परमेश्‍वर हमें क्लेशों और परीक्षाओं में से होकर जाने देता है?


प्रश्न: क्यों परमेश्‍वर हमें क्लेशों और परीक्षाओं में से होकर जाने देता है?

उत्तर:
मसीही जीवन के सबसे कठिन हिस्सों में से एक यह है कि मसीह के शिष्य बनने से हम जीवन की परीक्षाओं और कष्टों या क्लेशों से मुक्त नहीं होते हैं। एक भला और प्रेम करने वाला परमेश्‍वर हमें एक बच्चे की मृत्यु, बीमारी और स्वयं और हमारे प्रियजनों को, वित्तीय कठिनाइयों, चिन्ता और डर जैसी बातों में से होकर जाने की अनुमति क्यों देता है? कुल मिलाकर, क्या हम से प्रेम करने का अर्थ यह नहीं है कि वह हमारी जीवन को आसान और आरामदायक बनाना चाहता है? ठीक, परन्तु नहीं, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। बाइबल स्पष्ट रूप से शिक्षा देती है कि परमेश्‍वर उसकी सन्तान से प्रेम करता है, और हमारे "उसकी सभी बातें भलाई को उत्पन्न" करती हैं (रोमियों 8:28)। इसलिए इसका अर्थ अवश्य ही यह होना चाहिए कि क्लेश और परीक्षाओं के द्वारा, वह हमारे जीवनों में सभी बातों के द्वारा हमारे भले को उत्पन्न करने के लिए कार्य कर रहा है। इसलिए, सभी मसीही विश्‍वासियों के लिए, सभी कष्ट एवं परीक्षाएँ को एक अलौकिक उद्देश्य होना चाहिए।

जैसा कि सभी बातों में, परमेश्‍वर का अन्तिम उद्देश्य हमें अधिकाधिक उसके पुत्र की समानता में लाने का है (रोमियों 8:29)। यही एक मसीही विश्‍वासी का लक्ष्य होना चाहिए और जीवन में सब कुछ, जिसमें कष्ट और परीक्षाएँ भी सम्मिलित हैं, हमें उस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए सक्षम करने के लिए रूपरेखित हैं। यह पवित्रीकरण की प्रक्रिया का हिस्सा है, परमेश्‍वर के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए पृथक किया जाना और उसकी महिमा के लिए जीवन व्यतीत करने के अनुरूप होना। जिन परीक्षाओं को हम पूरा कर सकते हैं, उनका वर्णन 1 पतरस 1:6-7 में किया गया है: "इस कारण तुम मगन होते हो, यद्यपि अवश्य है कि अब कुछ दिन तक नाना प्रकार की परीक्षाओं के कारण दु:ख में हो। और यह इसलिये है कि तुम्हारा परखा हुआ विश्‍वास, जो आग से ताए हुए नाशमान सोने से भी कहीं अधिक बहुमूल्य है, यीशु मसीह के प्रगट होने पर प्रशंसा और महिमा और आदर का कारण ठहरे।" एक सच्चे मसीही विश्‍वासी के विश्‍वास को उन परीक्षाओं के कारण सुनिश्चित किया जाएगा जिनका सामना हम करते हैं, ताकि हम इस ज्ञान को प्राप्त कर लें कि यह वास्तविक है और यह सदैव बना रहेगा।

परीक्षाएँ हम में ईश्‍वरीय चरित्र को विकसित करती हैं, और यह हमें योग्य करती हैं कि, "हम क्लेशों में भी घमण्ड करें, यह जानकर कि क्लेश से धीरज, और धीरज से खरा निकलना, और खरे निकलने से आशा उत्पन्न होती है। और आशा से लज्जा नहीं होती, क्योंकि पवित्र आत्मा जो हमें दिया गया है, उसके द्वारा परमेश्‍वर का प्रेम हमारे मन में डाला गया है" (रोमियों 5:3-5)। यीशु मसीह ने इसके लिए सिद्ध आदर्श को प्रस्तुत किया है। "परन्तु परमेश्‍वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा" (रोमियों 5:8)। ये वचन यीशु मसीह के क्लेशों और परीक्षाओं और हमारे दोनों के लिए परमेश्‍वर के अलौकिक उद्देश्य के पहलुओं को प्रगट करते हैं। धैर्य हमारे विश्‍वास को प्रमाणित करता है। "जो मुझे सामर्थ्य देता है, उसमें मैं सब कुछ कर सकता हूँ" (फिलिप्पियों 4:13)।

तथापि, हमें हम पर आने वाले "क्लेशों और परीक्षाओं" के प्रति, यदि वे हमारी अपनी ही गलती के परिणामस्वरूप हम पर आए हैं, तो बहानों को बनाने के लिए सचेत रहना चाहिए। "तुम में से कोई व्यक्ति हत्यारा या चोर या कुकर्मी होने, या पराए काम में हाथ डालने के कारण दु:ख न पाए" (1 पतरस 4:15)। परमेश्‍वर हमारे पापों को क्षमा कर देगा, क्योंकि उनके लिए शाश्‍वतकालीन दण्ड को क्रूस के ऊपर मसीह के बलिदान के द्वारा चुका दिया गया है। तथापि, हमें इसी जीवन में हमारे पापों और बुरे निर्णयों के स्वाभाविक परिणामों से दु:ख उठाना पड़ेगा। परन्तु परमेश्‍वर तौभी इन दु:खों को अपने सर्वोच्च भले और अपने प्रयोजनों की प्राप्ति के लिए हमें निर्मित करने और उनके अनुसार ढालने के लिए उपयोग करता है।

क्लेश और परीक्षाएँ दोनों ही एक उद्देश्य और एक प्रतिफल के साथ आती हैं। "हे मेरे भाइयो, जब तुम नाना प्रकार की परीक्षाओं में पड़ो, तो इसको पूरे आनन्द की बात समझो, यह जानकर कि तुम्हारे विश्‍वास के परखे जाने से धीरज उत्पन्न होता है। पर धीरज को अपना पूरा काम करने दो कि तुम पूरे और सिद्ध हो जाओ, और तुम में किसी बात की घटी न रहे...धन्य है वह मनुष्य, जो परीक्षा में स्थिर रहता है, क्योंकि वह खरा निकलकर जीवन का वह मुकुट पाएगा जिसकी प्रतिज्ञा प्रभु ने अपने प्रेम करनेवालों से की है" (याकूब 1:2-4,12)।

जीवन के सभी क्लेशों और परीक्षाओं के द्वारा हमें जय प्राप्त होती है। "परन्तु परमेश्‍वर का धन्यवाद हो, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमें जयवन्त करता है।" यद्यपि, हम एक आत्मिक युद्ध में लगे हुए हैं, तथापि, शैतान के पास मसीह के विश्‍वासियों के ऊपर कोई अधिकार नहीं है। परमेश्‍वर ने हमें उसके वचन को मार्गदर्शन के रूप में प्रदान किया, और उसके पवित्र आत्मा को हमें योग्य करने के लिए दिया है। और हमें यह सौभाग्य प्रदान किया है कि हम उसके पास किसी भी समय, कहीं पर भी, किसी भी बात के लिए प्रार्थना करने के लिए आ जा सकते हैं। उसने साथ ही हमें आश्‍वस्त किया है कि वह हमें हमारी क्षमता से परे किसी भी परीक्षा में नहीं पड़ने देगा, और यह कि वह "परीक्षा के साथ निकास भी करेगा कि तुम सह सको" (1 कुरिन्थियों 10:13)।

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