अनुवाद प्रक्रिया बाइबल की प्रेरणा, त्रुटिहीनता और अचूकता को कैसे प्रभावित करती है?


प्रश्न: अनुवाद प्रक्रिया बाइबल की प्रेरणा, त्रुटिहीनता और अचूकता को कैसे प्रभावित करती है?

उत्तर:
बाइबल की प्रेरणा का सिद्धान्त शिक्षा देता है कि पवित्रशास्त्र "ईश्‍वर-श्‍वसित" है; अर्थात्, परमेश्‍वर ने व्यक्तिगत रूप से लेखन प्रक्रिया का संचालन किया, मानवीय लेखकों को मार्गदर्शन दिया ताकि उसका पूरा सन्देश हमारे लिए लिपिबद्ध किया जा सके। बाइबल वास्तव में परमेश्‍वर का वचन है। लेखन प्रक्रिया के समय प्रत्येक लेखक को अपने व्यक्तित्व और लेखन शैली को अभिव्यक्त करने की अनुमति थी; यद्यपि, परमेश्‍वर ने लेखकों को निर्देश दिया था कि उनके द्वारा उत्पादित 66 पुस्तकें गलती से मुक्त थीं और यह ऐसा ही था जैसे परमेश्‍वर चाहता था। 2 तीमुथियुस 3:16 और 2 पतरस 1:21 को देखें।

नि:सन्देह, जब हम "प्रेरणा" के बारे में बात करते हैं, तो हम केवल उस प्रक्रिया को सन्दर्भित कर रहे हैं, जिसके द्वारा मूल दस्तावेज संकलित किए गए थे। इसके पश्‍चात्, बाइबल की सुरक्षा ने अपने कार्य को करना आरम्भ किया। यदि परमेश्‍वर हमें अपने वचन को देने के लिए इतनी अधिक दूर गया, तो निश्‍चित रूप से वह अपने को अपरिवर्तित रखने के लिए भी कदम उठाएगा। इतिहास में हम जो देखते हैं, यही कुछ है, जिसे परमेश्‍वर ने किया।

पुराने नियम के इब्रानी ग्रन्थों को यहूदी धर्मशास्त्रियों के द्वारा बड़ी पीड़ा के साथ नकल किया गया था। सोफेरिम, जुगोथ, तानाऐम और मासोरेट्स जैसे समूहों का उन प्रतिलिपियों के प्रति बहुत अधिक सम्मान था, जिनकी नकलें वे बना रहे थे। उनका सम्मान उनके कार्य को नियन्त्रित करने वाले कठोर नियमों के साथ मिश्रित था जैसे कि: चर्मपत्र का प्रकार, पंक्ति का आकार, स्याही का प्रकार और शब्दों की दूरी सब कुछ को निर्धारित किया गया था। स्मृति से कुछ भी लिखना स्पष्ट रूप से प्रतिबन्धित था और पंक्तियों, शब्दों और यहाँ तक कि व्यक्तिगत अक्षरों को विधिवत से शुद्ध रूप में दो बार-जाँच करते हुए सटीकता के साधन के रूप में गिना जाता था। इसका प्रमाण यह था कि यशायाह की लेखनी के द्वारा लिखे गए शब्द आज भी उपलब्ध हैं। मृत सागर कुण्डल पत्रों की खोज स्पष्ट रूप से इब्रानी मूलपाठ की सटीकता की पुष्टि करता है।

नए नियम के यूनानी मूलपाठ के लिए भी यही सच है। हजारों यूनानी ग्रन्थों को, कुछ जो लगभग 117 इस्वी सन् की तिथि के हैं, उपलब्ध हैं। ग्रन्थों के मध्य में थोड़ा सा भी परिवर्तन — नहीं मिलता है, जिस से की विश्‍वास का एक भी कथन प्रभावित नहीं होता है — को आसानी से सुलझाया जाता है। विद्वानों ने निष्कर्ष निकाला है कि वर्तमान में हमारे पास उपलब्ध नया नियम अपने अपरिवर्तित रूप में मूल लेखन के साथ पूर्ण सटीकता में है। पाठ्यात्मक विद्वान सर फ्रेडरिक केन्यॉन ने बाइबल के बारे में ऐसा कहा है कि, "यह व्यावहारिक रूप से निश्‍चित है कि प्रत्येक सन्देही सन्दर्भ का सच्चा पठ्न सुरक्षित कर दिया है . . . । यह संसार में किसी अन्य प्राचीन पुस्तक के बारे में नहीं कहा जा सकता है।"

यह बात हमें बाइबल के अनुवाद में ले आती है। अनुवाद कुछ सीमा तक एक व्याख्यात्मक प्रक्रिया है। एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद करते समय शब्दों के चुनावों को किया जाना चाहिए। क्या यह अधिक सटीक शब्द होना चाहिए, चाहे उस शब्द का अर्थ आधुनिक पाठक के लिए अस्पष्ट है? या अधिक शाब्दिक पढ़ने का मूल्य पर इसे उन्हीं जैसे शब्दों वाला होना चाहिए?

एक उदाहरण के रूप में, कुलुस्सियों 3:12 में, कुछ अनुवाद "बड़ी करूणा" को सन्दर्भित करते हैं जबकि शाब्दिक अनुवाद दया की आंत है। "आंतों" के लिए जिस यूनानी शब्द का उपयोग किया है, वह सचमुच में "आंत" है, जो अपने मूल शब्द "स्पलीन" से आता है। अन्य अनुवादकों ने एक गैर- शाब्दिक शब्द: "बड़ी करुणा वाला मन" ("मन" जिसे आज के पाठक भावनाओं के सिंहासन के रूप में सोचते हैं) या "नम्रता से भरी हुई दीनता और दया" या केवल "करुणा" है।

इसलिए, कुछ अनुवाद दूसरों की तुलना में अधिक शाब्दिक हैं, परन्तु वे सभी निश्‍चित रूप से वचन के लिए न्याय करते हैं। कुलुस्सियों 3:12 में दिए हुए आदेश का मूल अर्थ दयालुता भरी हुई भावनाओं का होना है।

बाइबल के अधिकांश अनुवाद किसी एक समिति के द्वारा किए जाते हैं। इससे यह गारन्टी मिलती है कि कोई भी व्यक्तिगत पूर्वाग्रह या धर्मविज्ञान इसके शब्दों के चुनाव के निर्णयों को प्रभावित नहीं करेगा, इत्यादि। बाइबल का अच्छा, निष्ठावान अनुवाद होना महत्वपूर्ण है। एक अच्छा अनुवाद समूह दी गई विद्वता के प्रति प्रतिबद्ध रहेगा और बाइबल को स्वयं के लिए बोलने देगा।

एक सामान्य नियम के रूप में, अधिक शाब्दिक अनुवादों में कम "व्याख्यात्मक" कार्य होता है। आवश्यकता के अनुसार "स्वतन्त्र" अनुवाद मूलपाठ की अधिक "व्याख्या" करते हैं, परन्तु सामान्य रूप से अधिक पठ्नीय होते हैं। फिर ऐसे सविस्तार व्याख्यान हैं, जो वास्तव में कहीं से भी अनुवादित नहीं हैं, अपितु एक व्यक्ति बाइबल की कहानी को दुहरा रहा होता है।

इस कारण, इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए, क्या बाइबल के अनुवाद प्रेरित और त्रुटिहीन है? इसका उत्तर नहीं में है, वे नहीं हैं। परमेश्‍वर कहीं भी अपने वचन के अनुवाद के लिए प्रेरणा की प्रतिज्ञा को विस्तारित नहीं करता है। यद्यपि आज उपलब्ध कई अनुवाद गुणवत्ता में बहुत ही अच्छे हैं, तथापि वे परमेश्‍वर से प्रेरित नहीं हैं और सही नहीं हैं। क्या इसका अर्थ है कि हम एक दिए हुए अनुवाद पर भरोसा नहीं कर सकते? एक बार फिर से, इसका उत्तर नहीं है। पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के साथ, पवित्रशास्त्र के सावधानीपूर्वक किए गए अध्ययन के द्वारा, हम पवित्रशास्त्र को सही ढंग से समझ सकते, व्याख्या कर सकते और इसे जीवनों पर लागू कर सकते हैं। एक बार फिर से, समर्पित मसीही अनुवादकों (और निश्‍चित रूप से पवित्र आत्मा के निरक्षण में) के विश्‍वासयोग्यता से भरे हुए प्रयासों के कारण, आज उपलब्ध अनुवाद अच्छे और भरोसेमन्द हैं। तथ्य यह है कि हम किसी अनुवाद के लिए अचूकता को स्वीकार नहीं कर सकते हैं, हमें किसी भी विशेष अनुवाद की ओर भी अन्ध भक्ति से दूर रहते हुए और घनिष्ठ अध्ययन की ओर प्रेरित रहना चाहिए।

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