पाठ्यात्मक आलोचना — यह क्या होती है?


प्रश्न: पाठ्यात्मक आलोचना — यह क्या होती है?

उत्तर:
सरल शब्दों में कहना, पाठ्यात्मक आलोचना एक ऐसी विधि है, जो यह निर्धारित करने के लिए उपयोग की जाती है कि बाइबल की मूल पाण्डुलिपियों ने क्या कहा है। बाइबल की मूल पाण्डुलिपियाँ खो गई हैं, छुपी हुई हैं, या अस्तित्व में नहीं हैं। हमारे पास जो कुछ है, वह 1लीं से 15वीं शताब्दी ईस्वी सन् (नए नियम के लिए) और 4थीं शताब्दी ईसा पूर्व से 15 वीं शताब्दी ईस्वी सन् (पुराने नियम के लिए) के लिए तिथि निर्धारित करती हुई मूल पाण्डुलिपियों की हजारों प्रतियाँ हैं। इन पाण्डुलिपियों में, कई बहुत ही थोड़े और कुछ महत्वपूर्ण भिन्नताएँ के साथ पाई जाती हैं। पाठ्यात्मक आलोचना के द्वारा इन पाण्डुलिपियों का अध्ययन यह निर्धारित करने के प्रयास है कि वास्तव में मूल पठ्न क्या था।

पाठ्यात्मक आलोचना के लिए तीन प्राथमिक तरीके हैं। पहला टेक्स्टस रीसेप्टस या सीमित मात्रा में प्राप्ति का है। टेक्स्टस रीसेप्टस बाइबल की एक ऐसी पाण्डुलिपि थी, जिसे 1500वीं ईस्वी सन् शताब्दी में इरास्मुस नामक एक व्यक्ति के द्वारा संकलित किया गया था। उसने सीमित मात्रा में पाण्डुलिपियों को संकलित किया और उन्हें अन्त में टेक्स्टस रीसेप्टस के नाम से जानी जाने लगा।

एक दूसरी विधि बहुमत वाले मूलपाठ के रूप में जानी जाती है। बहुमत वाला मूलपाठ उन सभी पाण्डुलिपियों को लेता है, जो आज उपलब्ध हैं, मतभेदों की तुलना करता है, और सबसे अधिक सम्भावित सही पठ्न का चयन करता है, जो सबसे अधिक पठ्न के आधार पर निर्धारित होता है। उदाहरण के लिए, यदि 748 पाण्डुलिपियों ने "उसने कहा" वाक्यांश का उपयोग किया और 1429 पाण्डुलिपियों में उसे "उन्होंने कहा," वाक्यांश का उपयोग हुआ है, तो बहुमत वाला मूलपाठ "उन्होंने कहा" वाक्यांश को मूल पाठ के रूप से चुन लेता है। बहुमत वाले मूलपाठ पर आधारित बाइबल का कोई भी मुख्य अनुवाद नहीं पाया जाता है।

तीसरी विधि को आलोचनात्मक या चयनशील विधि के रूप में जाना जाता है। चयनशील विधि में सबसे अधिक सम्भावित मूल पाठ निर्धारित करने के लिए बाह्य और आन्तरिक साक्ष्यों पर विचार करना सम्मिलित है। बाहरी साक्ष्य हमें इन प्रश्नों को पूछने पर मजबूर करते हैं कि: कितनी पाण्डुलिपियों में पठ्न प्रगट होता है? इन पाण्डुलिपियों की तिथियाँ क्या हैं? संसार के किस क्षेत्र से ये पाण्डुलिपियाँ मिली हैं? आन्तरिक साक्ष्य इन प्रश्नों को संकेत देते हैं कि: इनके भिन्न पठ्न के कारण क्या हो सकते हैं? कौन सा पठ्न सम्भवतः दूसरे पठ्न की उत्पत्ति को समझा सकता है?

कौन सी विधि सबसे सटीक है? यही वह स्थान है जहाँ तर्क वितर्क आरम्भ होता है। जब विधियों में से पहली बार किसी को वर्णित किया जाता है, तो सामान्य रूप से एक व्यक्ति बहुमत वाले मूलपाठ को उस पद्धति के रूप में चुनता है, जिसका उपयोग किया जाना चाहिए। यहाँ अनिवार्य रूप से "बहुमत" और "लोकतांत्रिक" विधि शासन करती हुई मिलती हैं। यद्यपि, यहाँ पर विचार करने के लिए एक क्षेत्रीय विषय भी है। कलीसिया की पहली कुछ शताब्दियों में, अधिकांश मसीही विश्‍वासियों ने यूनानी में बात की और लिखा। चौथी शताब्दी ईस्वी सन् के आरम्भ से ही लतीनी भाषा ने विशेष रूप से कलीसिया में सबसे अधिक प्रचलित सामान्य भाषा बनना आरम्भ कर दिया। लतीनी अनुवाद से आरम्भ होते हुए यूनानी की अपेक्षा लतीनी भाषा में नए नियम की प्रतिलिपियाँ बनाई जाने लगीं।

यद्यपि, पूर्वी मसीही संसार में, यूनानी कलीसिया की मुख्य भाषा के रूप में 1000 से अधिक वर्षों तक बनी रही। परिणामस्वरूप, यूनानी पाण्डुलिपियों का विशाल बहुमत पूर्वी/बैंजन्ताईन क्षेत्र से है। ये बैंजन्ताईन पाण्डुलिपि सभी एक दूसरे के जैसी हैं। वे सभी कुछ यूनानी पाण्डुलिपियों में से उत्पन्न हुई थीं। एक-दूसरे के जैसे होने के पश्‍चात् भी, बैंजन्ताईन पाण्डुलिपियों में कलीसिया के पश्‍चिमी और केन्द्रीय क्षेत्रों में मिली पाण्डुलिपियों के साथ कई भिन्नताएँ मिलती हैं। सारांश में: यदि आपने तीन पाण्डुलिपियों को एक साथ रखते हुए अध्ययन आरम्भ किया है और एक की नकल 100 बार की गई थी, दूसरी की 200 बार नकलें बनाई गई और तीसरे की 5,000 बार नकलें बनाई गई हैं, तो किस समूह के पास बहुमत वाला नियम होगा? निश्‍चित रूप से तीसरे समूह के पास। यद्यपि, तीसरे समूह का पहले या दूसरे समूह की तुलना में मूल पठ्न की निकटता में पाए जाने की सम्भावना नहीं है। इसमें केवल अधिक प्रतियाँ हैं। मूलपाठ की आलोचना/चयनशीलता की विधियाँ पूर्व क्षेत्रों की पाण्डुलिपियों के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों से आने के पश्‍चात् भी भारी बहुमत वाली पाण्डुलिपियों के "तुल्य" एक दूसरे को रखती हैं।

कैसे आलोचना/चयनशीलता की विधि अभ्यास में कैसे कार्य करती है? यदि आप विभिन्न अनुवादों में यूहन्ना 5:1-9 की तुलना करते हैं, तो आप देखेंगे कि आलोचनात्मक मूलपाठ पर आधारित अनुवाद में वचन 4 से लुप्त है। टेक्स्टस रीसेप्टस विधि में, यूहन्ना 5:4 में ऐसे लिखा हुआ है, "क्योंकि नियुक्‍त समय पर परमेश्‍वर के स्वर्गदूत कुण्ड में उतरकर पानी को हिलाया करते थे। पानी हिलते ही जो कोई पहले उतरता वह चंगा हो जाता था चाहे उसकी कोई बीमारी क्यों न हो।" यह वचन बाइबल के उन विभिन्न अनुवादों में क्यों नहीं पाया जाता है, जो आलोचनात्मक मूलपाठ का उपयोग करते हैं? चयनशील विधि निम्नानुसार काम करती है: (1) यूहन्ना 5:4 का मूलपाठ सबसे पुरानी पाण्डुलिपियों में नहीं पाया जाता है। (2) यूहन्ना 5:4 का पाठ सभी बैंजन्ताईन पाण्डुलिपियों में पाया जाता होता है, पतन्तु गैर-पूर्वी पाण्डुलिपियों में से कई नहीं मिलता है। (3) इस बात की सम्भावना अधिक है कि एक लेखक एक स्पष्टीकरण जोड़ देगा इसकी अपेक्षा कि एक लेखक एक स्पष्टीकरण को हटा दे। यूहन्ना 5:4 यह भी स्पष्ट करता है कि अपंग व्यक्ति कुण्ड में क्यों जाना चाहता था। एक लेखक इस वचन को क्यों हटाएगा? यह कोई अर्थ नहीं देती है। यह अवश्य समझ में आता है कि परम्परा अनुसार क्यों एक अपंग व्यक्ति कुण्ड में प्रवेश करना चाहता था, को जोड़ दिया जाए। इन धारणाओं के परिणामस्वरूप, आलोचनात्मक/चयनशील मूलपाठ यूहन्ना 5:4 को स्वयं में सम्मिलित नहीं करता है।

यह बात का कोई अर्थ नहीं रखती है कि आप जिस मूलपाठ की आलोचना करते हैं, वह सही है, यही एक विषय है, जिस पर चर्चा कृपा, सम्मान और दयालुता के साथ की जानी चाहिए। मसीही विश्‍वासी इस विषय के ऊपर असहमत हो सकते हैं और होते भी हैं। हम विधियों पर र्तक विर्तक कर सकते हैं, परन्तु हमें उन लोगों की प्रेरणा और चरित्र के ऊपर आक्रमण नहीं करना चाहिए, जिनके साथ हम इस विषय पर असहमत हैं। बाइबल के सबसे सम्भावित मूल वचन को निर्धारित करने के लिए — हम सभी का एक ही लक्ष्य है। कुछ लोगों के पास लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कुछ भिन्न तरीके हैं।

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