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प्रकाशितवाक्य की पुस्तक

लेखक : प्रकाशितवाक्य 1:1,4,9 और 22:8 विशेष रूप से प्रकाशितवाक्य की पुस्तक के लेखक की पहचान प्रेरित यूहन्ना के रूप में करती है।

लेखन तिथि : प्रकाशितवाक्य की पुस्तक का 90 से 95 मध्य किसी समय लिखे जाने की सम्भावना पाई जाती है।

लेखन का उद्देश्य : यीशु मसीह का प्रकाशितवाक्य परमेश्‍वर के द्वारा यूहन्ना को "जिन बातों का शीघ्र होना अवश्य है, उन्हें दिखाने के लिए दिया गया था।" पुस्तक आने वाली बातों के रहस्यों के बारे में भरी हुई है। यह अन्तिम चेतावनी है कि इस संसार का निश्चित अन्त आएगा और न्याय का होना भी निश्चित है। यह स्वर्ग की छोटी सी और उस सारी प्रतिज्ञा करती हुई महिमा की झलक देता है जो उनके लिए है जिन्होंने अपने वस्त्रों को श्वेत रखा है। प्रकाशितवाक्य हमें महा क्लेश काल में इसकी सारे शापों और अन्तिम आग जिसका सामना सभी अविश्‍वासी अनन्तकाल के लिए करेंगे, के साथ दिखाता है। पुस्तक शैतान और उसके पतन को दोहराता है, जो उसके और उसके दूत के लिए निर्धारित है। हमें सारे प्राणियों और स्वर्ग के सारे स्वर्गदूतों के दायित्वों को और सन्तों की दी हुई प्रतिज्ञाओं को कि वे नए यरूशलेम में सदैव यीशु के साथ रहेंगे, को दर्शाया गया है। यूहन्ना की तरह, जिन बातों को हम प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में पढ़ते हैं,उनका विवरण देने के लिए शब्दों की कठिनाई को पाते हैं।

कुँजी वचन : प्रकाशितवाक्य 1:19, "इसलिये जो बातें तू ने देखी हैं और जो बातें हो रही हैं और जो इसके बाद होनेवाली हैं, उन सब को लिख ले।"

प्रकाशितवाक्य 13:16-17, "उसने छोटे-बड़े, धनी-कंगाल, स्वतंत्र-दास सब के दाहिने हाथ या उनके माथे पर एक एक छाप करा दी। कि उसको छोड़ जिस पर छाप अर्थात् उस पशु का नाम या उसके नाम का अंक हो, अन्य कोई लेन-देन न कर सके।"

प्रकाशितवाक्य 19:11, "फिर मैं ने स्वर्ग को खुला हुआ देखा, और देखता हूँ कि एक श्वेत घोड़ा है; और उस पर एक सवार है, जो विश्‍वासयोग्य और सत्य कहलाता है; और वह धर्म के साथ न्याय और युद्ध करता है।"

प्रकाशितवाक्य 20:11, "फिर मैं ने एक बड़ा श्वेत सिंहासन और उसको, जो उस पर बैठा हुआ है, देखा; उसके सामने से पृथ्वी और आकाश भाग गए, और उनके लिये जगह न मिली।"

प्रकाशितवाक्य 21:1, "फिर मैं ने नये आकाश और नयी पृथ्वी को देखा, क्योंकि पहला आकाश और पहली पृथ्वी जाती रही थी, और समुद्र भी न रहा।"

संक्षिप्त सार : प्रकाशितवाक्य दृष्टान्तों के रंगीन वर्णनों में भव्यता के साथ भरा हुआ है, जो हमारे लिए मसीह के आगमन के अन्तिम दिनों के बारे में बताते हैं और नए स्वर्ग और नई पृथ्वी का उदघाटन करते हैं। प्रकाशितवाक्य अखाया की सात कलीसियाओं के लिखे हुए पत्रों के साथ आरम्भ होता है, तब इसके पश्चात् पृथ्वी के ऊपर उण्डेले गए प्रकोप की श्रृंखला को; पशु के अंक "666" को; अरमगीद्दोन के विनाशकारी युद्ध को; शैतान को बाँधे जाने; प्रभु के राज्य; महान् श्वेत सिंहासन के न्याय को; और परमेश्‍वर की शाश्‍वतकालीन नगर के स्वभाव को प्रकाशित करता है। यीशु मसीह के सम्बन्ध में की हुई भविष्यद्वाणियाँ पूरी हो चुकी हैं और उसके प्रभुत्व के प्रति सारांशित बुलाहट हमें आश्‍वस्त करती है कि उसका आगमन शीघ्रता के साथ होने वाला है।

सम्पर्क : प्रकाशितवाक्य की पुस्तक, पुराने नियम के साथ आरम्भ होती हुई, अन्य के समय की भविष्यद्वाणियों की पराकाष्ठा है। जिस मसीह विरोधी का वृतान्त दानिय्येल 9:27 में उल्लिखित है, वह प्रकाशितवाक्य अध्याय 13 में पूर्ण रीति से विकसित मिलता है। प्रकाशितवाक्य से बाहर, प्रकाशनात्मक साहित्य के उदाहरण, बाइबल में दानिय्येल अध्याय 7-12, यशायाह अध्याय 24-27, यहेजकेल अध्याय 37-41, और जकर्याह अध्याय 9-14 में पाए जाते हैं। ये सारी की सारी भविष्यद्वाणियाँ प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में एक साथ इकट्ठी हो जाती हैं।

व्यवहारिक शिक्षा : क्या आपने मसीह को अपना उद्धारकर्ता स्वीकार किया है? यदि हाँ तो, आपको संसार के ऊपर पड़ने वाले परमेश्‍वर के न्याय से किसी भी तरह का कोई डर नहीं होना चाहिए जो कि प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में वर्णित हैं। न्याय का पक्ष हमारी ओर है। अन्तिम न्याय के आरम्भ होने से पहले, हमें मसीह में दिए जाने वाले परमेश्‍वर के शाश्‍वतकालीन प्रस्ताव के बारे में हमारे मित्रों और पड़ोसियों को गवाही देनी चाहिए। इस पुस्तक में घटित होने वाली घटनाएँ वास्तविक हैं। हमें हमारे जीवनों को वैसे ही व्यतीत करना चाहिए जैसे हम विश्‍वास करते हैं ताकि अन्य भविष्य के बारे में हमारे आनन्द के ऊपर ध्यान दें और हमारे साथ उस नए और महिमामयी नगर में जाने के लिए आ जुड़े।



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