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गिनती की पुस्तक

लेखक : गिनती की पुस्तक का लेख मूसा था।

लेखन तिथि : गिनती की पुस्तक का ईसा पूर्व 1045 और 1000 के मध्य ही किसी समय लिखे जाने की सम्भावना है।

लेखन का उद्देश्य : गिनती की पुस्तक का सन्देश, विश्‍वव्यापी और स्थाई बने रहने वाला है। इसने विश्‍वासियों को आत्मिक युद्ध का स्मरण दिलाया है, जिसमें वे सम्मिलित हैं, क्योंकि गिनती की पुस्तक परमेश्‍वर के लोगों का परमेश्‍वर के साथ जीवन यापन करने और आराधना करने के बारे में। गिनती की पुस्तक अनिवार्य रूप से व्यवस्था (निर्गमन और लैव्यव्यवस्था) को प्राप्त करने वाले इस्राएलियों और उन्हें प्रतिज्ञा की हुई भूमि (व्यवस्थाविवरण और यहोशू) में प्रवेश के लिये तैयार करने के मध्य के अन्तराल को पाटने का कार्य करती है।

कुँजी वचन : गिनती 6:24-26, "यहोवा तुझे आशीष दे और तेरी रक्षा करे; यहोवा तुझ पर अपने मुख का प्रकाश चमकाए, और तुझ पर अनुग्रह करे; यहोवा अपना मुख तेरी ओर करे, और तुझे शान्ति दे।"

अनुग्रह 12:6-8, "तब यहोवा ने कहा, 'मेरी बातें सुनो: यदि तुम में कोई नबी हो, तो उस पर मैं यहोवा दर्शन के द्वारा अपने आप को प्रगट करूँगा, या स्वप्न में उससे बातें करूँगा। परन्तु मेरा दास मूसा ऐसा नहीं है; वह तो मेरे सब घरानों में विश्‍वासयोग्य है। उस से मैं गुप्त रीति से नहीं, परन्तु आमने सामने और प्रत्यक्ष होकर बातें करता हूँ; और वह यहोवा का स्वरूप निहारने पाता है। इसलिये तुम मेरे दास मूसा की निन्दा करते हुए क्यों नहीं डरे?"

गिनती 14:30-34, "उनमें से यपुन्ने के पुत्र कालिब और नून के पुत्र यहोशू को छोड़ कोई भी उस देश में न जाने पाएगा, जिसके विषय मैं ने शपथ खाई है, कि तुम को उस में बसाऊँगा। परन्तु तुम्हारे बालबच्चे जिनके विषय तुम ने कहा है, कि ये लूट में चले जाएँगे, उनको मैं उस देश में पहुँचा दूँगा; और वे उस देश को जान लेंगे जिस को तुम ने तुच्छ जाना है। परन्तु — तुम लोगों के शव इसी जंगल में पड़े रहेंगे। और जब तक तुम्हारे शव जंगल में न गल जाएँ तक तक — अर्थात् चालीस वर्ष तक — तुम्हारे बालबच्चे जंगल में तुम्हारे व्यभिचार का फल भोगते हुए चरवाही करते रहेंगे। जितने दिन तुम उस देश का भेद लेते रहे — अर्थात् चालीस दिन, उनकी गिनती के अनुसार, दिन पीछे एक वर्ष, अर्थात् चालीस वर्ष तक तुम अपने अधर्म का दण्ड उठाए रहोगे, तब तुम जान लोगे कि मेरा विरोध क्या है।"

संक्षिप्त सार : गिनती की पुस्तक की अधिकांश घटनाएँ जंगल में घटित होती हैं, मूल रूप से इस्राएलियों के जंगल में भटकने के दूसरे और चालीसवें वर्ष के मध्य में घटित होती हैं। इस पुस्तक के प्रथम 25 अध्याय जंगल में इस्राएल की पहली पीढ़ी के अनुभवों के वृतान्त का इतिहास है, जबकि पुस्तक का बाकी का भाग दूसरी पीढ़ी के अनुभवों के वृतान्त का इतिहास है। आज्ञाकारिता और विद्रोह का विषय पश्चाताप और आशीष के पश्चात् पूरी पुस्तक में, साथ ही सम्पूर्ण पुराने नियम में भी चलता रहता है।

परमेश्‍वर की पवित्रता का विषय लैव्यव्यस्था से चलते हुए गिनती की पुस्तक में आगे बढ़ता है, जो कनान की प्रतिज्ञा की हुई भूमि में परमेश्‍वर के लोगों की तैयारी और इससे सम्बन्धित निर्देशो को प्रदर्शित करता है। गिनती की पुस्तक की महत्वपूर्णता इस बात से इंगित होती है, कि इसे कई बार नए नियम में उद्धृत किया गया है। पवित्र आत्मा के ऊपर गिनती के संदर्भ में 1 कुरिन्धियों 10:1-12 में विशेष ध्यान दिया गया है। यह वाक्यांश कि "यह सब कुछ हमारे लिए उदाहरण ठहरा" को इस्राएलियों के पास और उनके साथ परमेश्‍वर की अप्रसन्नता को उद्धृत करता है।

रोमियों 11:22 में, पौलुस परमेश्‍वर की "कृपा और कड़ाई" के बारे में बात करता है। संक्षेप में कहना, यही गिनती का सन्देश है। परमेश्‍वर की कड़ाई को जंगल में विद्रोही पीढ़ी की होने वाली मृत्यु में देखी जा सकती है, वे जो प्रतिज्ञा की हुई भूमि में कभी भी प्रवेश न करने पाए। परमेश्‍वर की कृपा नई पीढ़ी में पूर्णता को प्राप्त करती है। परमेश्‍वर ने उन लोगों को तब तक सुरक्षा, संभाल और भोजन वस्तुओं का प्रबन्ध किया जब तक कि उन्होंने प्रतिज्ञा की हुई भूमि में प्रवेश नहीं कर लिया। यह हमें परमेश्‍वर के प्रेम और न्याय को स्मरण दिलाता है, जो सदैव सर्वोच्च सद्भाव में पाए जाते हैं।

प्रतिछाया : परमेश्‍वर उसके लोगों से पवित्रता की मांग करता है, जो कि पूरी तरह से और अन्तिम रीति से यीशु मसीह में पूर्ण हुई, जो हमारे स्थान पर व्यवस्था को पूर्ण करने के लिए आया (मत्ती 5:17)। प्रतिज्ञा किए हुए मसीह की अवधारणा इस पुस्तक में व्याप्त है। अध्याय 19 में दी हुई "एक लाल निर्दोष बछिया" की कहानी मसीह के बलिदान का पूर्ण चित्रण है, जो परमेश्‍वर का बिना किसी दाग और धब्बे के एक निर्दोष मेम्ना है, जिसने हमारे पापों के लिए स्वयं का बलिदान दे दिया। शारीरिक चंगाई को प्रदान करने के लिए खम्भे पर लटका कर ऊँचे उठाए गए पीतल के साँप (अध्याय 21) भी या तो क्रूस के ऊपर, या फिर वचन की सेवकाई में मसीह के ऊँचे पर उठाए जाने का पूर्व चित्रण है, उसकी ओर विश्‍वास से देखने वाले प्रत्येक को आत्मिक चंगाई प्राप्त होगी।

अध्याय 24 में, बिलाम का चौथा आशीर्वचन तारे और राजदण्ड की बात करता है, जो कि याकूब में से आने वाला था। यहाँ पर मसीह के लिए एक भविष्यद्वाणी दी गई है, जिसे प्रकाशितवाक्य 22:16 में "भोर का तारा" कह कर पुकारा गया है, क्योंकि उसकी महिमा, तेज, और वैभव और ज्योति उसकी ओर से आती है। उसे साथ ही राजदण्ड कह कर पुकारा जा सकता है, अर्थात् उसके राजवंशी होने के कारण राजदण्ड को धारण करने वाला। उसके पास न केवल एक राजा का नाम है, अपितु एक राज्य भी है, और वह अनुग्रह, दया और धार्मिकता के साथ एक राजदण्ड के साथ राज्य करता है।

व्यवहारिक शिक्षा : नए नियम में गिनती की पुस्तक में एक मुख्य धर्मवैज्ञानिक विषय विकसित होता है, अर्थात् पाप और अविश्‍वास, विशेष रूप से विद्रोह, परमेश्‍वर के न्याय को प्राप्त करना इत्यादि का। पहला कुरिन्थियों विशेष रीति से कहता है — और इब्रानियों 3:7-4:13 इसे दृढ़ता से लागू करता है — कि ये घटनाएँ अविश्‍वासियों के लिए क्या पालन करना है और किनसे बचा जाना है, के रूप में नमूने की रीति पर लिखी गई हैं। हमें हमारे "मनों को बुरी बातों के ऊपर" (वजन 6), या अनैतिक यौन सम्बन्धों (वचन 8) पर नहीं लगाना है, या "परमेश्‍वर की परीक्षा नहीं करनी है" (वचन 9) या कुड़कुड़ाना और शिकायत नहीं करनी है (वचन 10)।

ठीक वैसे ही जैसे कि इस्राएली अपने विद्रोह के कारण जंगल में 40 वर्षों तक भटकते रहे, परमेश्‍वर भी कई बार हमें उसके विरूद्ध हमारे द्वारा किए हुए विद्रोह के कारण ऐसा होने देता है कि हम उससे दूर चले जाएँ और अकेलेपन और आशीषों की कमी से दुखित हो जाएँ। परन्तु परमेश्‍वर विश्‍वासयोग्य और धर्मी है, और ठीक वैसे ही जैसे उसने इस्राएलियों को अपने मन के अनुसार उचित स्थान पर स्थापित किया, हम यदि पश्चाताप करते और उसकी ओर लौट आते हैं, तो वह सदैव मसीही विश्‍वासियों को आशीष और उसके साथ घनिष्ठता की संगति में बनाए रखेगा (1 यूहन्ना 1:9)।



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