यशायाह की पुस्तक


लेखक : यशायाह 1:1 यशायाह की पुस्तक के लेखक का परिचय यशायाह भविष्यद्वक्ता के रूप में देता है।

लेखन तिथि : यशायाह की पुस्तक ईसा पूर्व 701 और 681 के मध्य में लिखी गई थी।

लेखन का उद्देश्य : भविष्यद्वक्ता यशायाह को मूलरूप से यहूदा के राज्य के विरूद्ध भविष्यद्वाणी के लिए बुलाया गया था। यहूदा आत्म जागृति के समयों और विद्रोह के समयों में से निकल रहा था। यहूदा को अश्शूर और मिस्र के द्वारा नष्ट कर दिए जाने का खतरा था, परन्तु यह परमेश्‍वर की दया के कारण बचा लिया गया था। यशायाह ने पाप से पश्चात् करने और भविष्य में परमेश्‍वर के छुटकारे की आशा से भरे हुए प्रत्याशा के सन्देश की घोषणा की।

कुँजी वचन : यशायाह 6:8, "तब मैंने प्रभु का यह वचन सुना, 'मैं किस को भेजूँ, और हमारी ओर से कौन जाएगा?' तब मैं ने कहा, 'मैं यहाँ हूँ! मुझे भेज!"

यशायाह 7:14, "इस कारण प्रभु आप ही तुम को एक चिन्ह देगा: सुनो, एक कुमारी गर्भवती होगी और पुत्र जनेगी और उसका नाम इम्मानुएल रखेगी।"

यशायाह 9:6, "क्योंकि हमारे लिये एक बालक उत्पन्न हुआ, हमें एक पुत्र दिया गया है; और प्रभुता उसके काँधे पर होगी, और उसका नाम अद्भुत युक्ति करनेवाला पराक्रमी परमेश्‍वर, अनन्तकाल का पिता, और शान्ति का राजकुमार रखा जाएगा।"

यशायाह 14:12-13, हे भोर के चमकनेवाले तारे, तू कैसे आकाश से गिर पड़ा है? तू जो जाति जाति को हरा देता था, तू अब कैसे काटकर भूमि पर गिराया गया है? तू मन में कहता तो था "मैं स्वर्ग पर चढूँगा; मैं अपने सिंहासन को ईश्‍वर के तारागण से अधिक ऊँचा करूँगा; और उत्तर दिशा की छोर पर सभा के पर्वत पर बिराजूँगा।"

यशायाह 53:5-6, "परन्तु वह हमारे ही अपराधों के कारण घायल किया गया, वह हमारे अधर्म के कामों के कारण कुचला गया; हमारी ही शान्ति के लिये उस पर ताड़ना पड़ी, कि उसके कोड़े खाने से हम चंगे हो जाएँ। हम तो सब के सब भेड़ों की समान भटक गए थे; हम में से हर एक ने अपना अपना मार्ग लिया; और यहोवा ने हम सभों के अधर्म का बोझ उसी पर लाद दिया।"

यशायाह 65:25, "भेड़िया और मेम्ना एक संग चरा करेंगे, और सिंह बैल के समान भूसा खाएगा; और सर्प का आहार मिट्टी ही रहेगा। मेरे सारे पवित्र पर्वत पर न तो कोई किसी को दु:ख देगा और न कोई किसी की हानि करेगा, यहोवा का यही वचन है।"

संक्षिप्त सार : यशायाह की पुस्तक परमेश्‍वर के न्याय और उद्धार को प्रगट करती है। परमेश्‍वर "पवित्र, पवित्र, पवित्र" है (यशायाह 6:3) और इस कारण वह पाप को दण्डित किए बिना ऐसे ही छोड़ नहीं सकता है (यशायाह 1:2; 2:11-20; 5:30; 34:1-2; 42:25)। यशायाह परमेश्‍वर के आने वाले दण्ड को "भस्म करने वाली आग" के रूप में चित्रित करता है (यशायाह 1:31; 30:33)।

ठीक उसी समय, यशायाह समझ जाता है, कि परमेश्‍वर दया, अनुग्रह और तरस का परमेश्‍वर भी है (यशायाह 5:25; 11:16; 14:1-2; 32:2; 40:3; 41:14-16)। इस्राएल की जाति (दोनों ही अर्थात् यहूदा और इस्राएल) परमेश्‍वर की आज्ञा के प्रति अन्धा और बहरा हो गई है (यशायाह 6:9-10; 42:7)। यहूदा की तुलना ऐसी दाखलता के साथ की गई है, जिसे कुचला जाना चाहिए, और दिया जाएगा (यशायाह 5:1-7)। केवल उसकी दया और इस्राएल के साथ की हुई प्रतिज्ञाओं के कारण ही, परमेश्‍वर दोनों को ही अर्थात् इस्राएल या यहूदा को पूर्ण रीति से नष्ट नहीं होने देगा। वह बहाली, क्षमा और चंगाई को ले आएगा (43:2; 43:16-19; 52:10-12)।

पुराने नियम की किसी भी अन्य पुस्तक से अधिक, यशायाह की पुस्तक उद्धार के विषय के ऊपर ध्यान केन्द्रित करती है, जो मसीह के द्वारा आएगा। मसीह एक दिन न्याय और धार्मिकता के साथ राज्य करेगा (यशायाह 9:7; 32:1)। मसीह का राज्य शान्ति को और इस्राएल के लिए सुरक्षा को ले आएगा (यशायाह 11:6-9)। मसीह के द्वारा ही, इस्राएल सभी जातियों के लिए प्रकाश बन जाएगा (यशायाह 42:6; 55:4-5)। मसीह का इस पृथ्वी पर राज्य (यशायाह अध्याय 65-66) ही वह उद्देश्य है, जिसकी ओर यशायाह की पूरी पुस्तक संकेत कर रही है। यह मसीह के राज्य के आगमन के समय ही होगा, जब परमेश्‍वर की धार्मिकता पूर्ण रीति से इस संसार के ऊपर प्रकाशित हो जाएगी।

आभासित होते हुए विरोधाभास में, यशायाह की पुस्तक यह भी प्रस्तुत करती है, कि मसीह एक ऐसा व्यक्ति होगा जो दु:ख उठाएगा। यशायाह अध्याय 53 मसीह के दु:खों के ऊपर सजीव चित्रण को वर्णित करता है। यह उसके जख्म हैं, जिनके द्वारा चंगाई को प्राप्त किया जाता है। यह उसके दु:ख हैं जिसके द्वारा हमारे अपराधों को हटा दिया गया है। इस प्रतीत होते हुए विरोधाभास को यीशु मसीह नामक व्यक्ति में समाधान कर दिया गया है। अपने पहले आगमन में, यीशु यशायाह 53 में वर्णित दु:ख उठाने वाला सेवक के रूप में मसीह था। अपने दूसरे आगमन के समय, यीशु विजयी और राज्य करने वाला राजा, शान्ति के राजकुमार के रूप में होगा (यशायाह 9:6)।

प्रतिछाया : जैसा कि ऊपर कहा गया है, यशायाह का अध्याय 53 आने वाले मसीह का और उसके द्वारा हमारे पापों के लिए चुकाए जाने वाले मूल्य के लिए दु:खों को उठाने का वर्णन करता है। अपनी प्रभुता में, परमेश्‍वर ने क्रूसीकरण के प्रत्येक विवरण का उपयोग इस अध्याय में मसीह सम्बन्धी दी हुई प्रत्येक भविष्यद्वाणी के साथ ही पुराने नियम की अन्य सभी भविष्यवाणियों को विस्तार सहित पूर्ण किया। अध्याय 53 में प्रस्तुत चित्रण मार्मिक और भविष्यद्वाणी है और सुसमाचार की पूर्ण चित्र को अपने में सम्मिलित करता है। यीशु को तिरस्कृत किया गया और त्यागा गया (वचन 3; लूका 13:34; यूहन्ना 1:10-11), परमेश्‍वर के द्वारा मारा-कूटा गया (वचन 4; मत्ती 27:46), और हमारे अपराधों के लिए घायल किया गया था (वचन 5; यूहन्ना 19:34; 1 पतरस 2:24)। अपने दु:खों के द्वारा, उसने उस दण्ड को अपने ऊपर लेते हुए चुका दिया, जिसके योग्य हम थे और हमारे लिए अन्तिम और सिद्ध बलिदान बन गया (वचन 5; इब्रानियों 10:10)। यद्यपि वह पाप रहित था, तथापि परमेश्‍वर ने हमारे पाप उसके ऊपर डाल दिए, और हम उसमें होते हुए परमेश्‍वर की धार्मिकता बन गए (2 कुरिन्थियों 5:21)।

व्यवहारिक शिक्षा : यशायाह की पुस्तक नकारे न जाने वाले रूप में हमारे उद्धारकर्ता को प्रस्तुत करती है। वही केवल स्वर्ग का मार्ग है, वही केवल परमेश्‍वर के अनुग्रह को प्राप्त करने का एक तरीका है, वही केवल मार्ग, सत्य और जीवन है (यूहन्ना 14:6; प्रेरितों के काम 4:12)। मसीह के द्वारा हमारे लिए चुकाए हुए मूल्य को जानते हुए, हम कैसे "इस बड़े उद्धार" का अन्देखा या इसका इन्कार कर सकते हैं? (इब्रानियों 2:3)। हमारे पास मसीह के निकट आने और जिस उद्धार को देने का प्रस्ताव वह करता है, उसे अपनाने के लिए इस पृथ्वी पर केवल कुछ ही वर्षों का समय है। मृत्यु उपरान्त कोई दूसरा अवसर नहीं है और शाश्‍वतकाल का नरक एक बहुत ही लम्बा समय है।

क्या आप ऐसे लोगों को जानते हैं, जो मसीह के विश्‍वासी होने का दावा करते हैं, जो दु-चित्ते हैं, जो पाखण्डी हैं? यही कदाचित् इस बात का सर्वोत्तम सार है, कि कैसे यशायाह ने इस्राएल की जाति को चित्रित किया। इस्राएल का दिखावा धार्मिकता से भरा हुआ था, परन्तु यह मुखौटा था। यशायाह की पुस्तक में भविष्यद्वक्ता यशायाह इस्राएल को अपने सारे मन से, बाहरी नहीं अपितु आन्तरिक रूप से आज्ञा पालन करने की चुनौती देता है। यशायाह की इच्छा यह थी, कि जिन्होंने उसके वचनों को सुना या जो उसके वचनों को पढ़ते हैं, वे अपनी दुष्टता से मन को फिरा सकें और क्षमा और चंगाई के लिए परमेश्‍वर की ओर मुड़ जाएँ।


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