कुलुस्सियों की पुस्तक


लेखक : कुलुस्सियों की पुस्तक का लेखक मूल रूप से प्रेरित पौलुस ही था (कुलुस्सियों 1:13)। इसे तीमुथियुस द्वारा लिखे जाना भी कहा जाता है (1:1)।

लेखन तिथि : कुलुस्सियों की पुस्तक को 58-62 ईस्वी सन् के मध्य में किसी समय लिखे जाने की सम्भावना है।

लेखन का उद्देश्य : कुलुस्सियों की पुस्तक मसीही जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को सम्बोधित करती हुई, एक संक्षिप्त-नीतिशास्त्र का पाठ्यक्रम है। पौलुस व्यक्तिगत् जीवन से घर और परिवार, काम से उस पथ की ओर जिसमें हमें एक दूसरे के साथ व्यवहार करना चाहिए, की ओर आगे बढ़ता है। इस पुस्तक का विषय हमारे प्रभु यीशु मसीह, के द्वारा प्रत्येक क्षेत्र में हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने की पर्याप्तता है।

कुँजी वचन : कुलुस्सियों 1:15-16, "वह तो अदृश्य परमेश्‍वर का प्रतिरूप और सारी सृष्टि में पहिलौठा है। क्योंकि उसी में सारी वस्तुओं की सृष्टि हुई, स्वर्ग की हों अथवा पृथ्वी की, देखी या अनदेखी, क्या सिंहासन, क्या प्रभुताएँ, क्या प्रधानताएँ, क्या अधिकार, सारी वस्तुएँ उसी के द्वारा और उसी के लिये सृजी गई हैं।"

कुलुस्सियों 2:8, "चौकस रहो कि कोई तुम्हें उस तत्व- ज्ञान और व्यर्थ धोखे के द्वारा अहेर न करे ले, जो मनुष्यों के परम्पराओं और संसार की आदि शिक्षा के अनुसार है, पर मसीह के अनुसार नहीं।"

कुलुस्सियों 3:12-13, "इसलिये परमेश्‍वर के चुने हुओं के समान जो पवित्र और प्रिय हैं, बड़ी करूणा, और भलाई, और दीनता, और नम्रता, और सहनशीलता धारण करो। और यदि किसी को किसी पर दोष देने को कोई कारण हो, तो एक दूसरे की सह लो, और एक दूसरे के अपराध क्षमा करो: जैसे प्रभु ने तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी करो।"

कुलुस्सियों 4:5-6, "अवसर को बहुमूल्य समझकर बाहरवालों के साथ बुद्धिमानी से व्यवहार करो। तुम्हारा वचन सदा अनुग्रह सहित और सलोना हो, कि तुम्हें हर मनुष्य को उचित रीति से उत्तर देना आ जाए।"

संक्षिप्त सार : कुलुस्सियों स्पष्ट रूप से उन झूठी शिक्षाओं का खण्डन करने के लिए लिखी गई थी, जो कुलुस्से की कलीसिया में उठ खड़ी हुई थीं, जिन्होंने कलीसिया के अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया था। जबकि हम यह नहीं जानते हैं, कि पौलुस को क्या कहा गया था, यह पत्र उसकी प्रतिक्रया स्वरूप है।

हम पौलुस की प्रतिक्रिया के ऊपर आधारित होकर सारांशित कर सकते हैं कि वह मसीह के विकृत दृष्टिकोण (उसकी वास्तविक और सच्ची मानवता और उसके पूर्ण ईश्‍वरीय होने को स्वीकार न किया जाना) का निपटारा कर रहा था। ऐसा प्रतीत होता है कि पौलुस साथ ही खतने और परम्पराओं के ऊपर "यहूदी" महत्व को दिए जाने के विरूद्ध भी चर्चा करता है (कुलुस्सियों 2:8-11; 3:11)। जिस झूठी शिक्षा को सम्बोधित किया गया है, वह यहूदी-गूढ़ज्ञानवादी या यूहदी सन्यासवाद और यूनानी (स्तोइकी?) दर्शन के मिश्रण जैसी प्रतीत होती है। वह मसीह की पर्याप्तता की ओर संकेत देते हुए उल्लेखनीय कार्य को करता है।

कुलुस्सियों की पुस्तक में मसीह के ईश्‍वरत्व और झूठे दर्शनों के बारे में धर्मसैद्धान्तिक निर्देश (1:15-2:23), साथ ही साथ मसीही विश्‍वास के व्यवहारों, जिसमें मित्रता और बोलने की कला के सम्बन्ध में व्यवहारिक उपदेश (3:1-4:18) निहित हैं।

सम्पर्क : जैसा कि सभी आरम्भिक कलीसियाओं के साथ था, कुलुस्से में यहूदी कर्मकाण्डवाद का विषय पौलुस के लिए एक बहुत बड़ी चिन्ता था। कर्मों के बिना अनुग्रह के द्वारा उद्धार की धारणा इतनी अधिक उग्र रूप से सुधारवादी थी कि पुराने नियम की व्यवस्था का पालन करने वालों के लिए आत्मसात् करने के लिए अत्यन्त कठिन थी। परिणामस्वरूप, कर्मकाण्डी लोगों के मध्य में इस नए विश्‍वास के साथ व्यवस्था की शर्तों में कुछ निश्चित को जोड़ने का एक आन्दोलन निरन्तर चल रहा था। उनमें सबसे मूल खतने की शर्त थी जो अभी भी यहूदियों में से आए हुए कुछ मसीही विश्‍वासियों के द्वारा अभ्यास में लाई जा रही थी। पौलुस ने इस त्रुटि का प्रतिरोध कुलुस्सियों 2:11-15 में किया था, जिसमें उसने घोषणा की कि शरीर का खतना अब और अधिक आवश्यक नहीं था क्योंकि मसीह आ चुका था। उसका खतना मन का खतना है, न कि शरीर का खतना, जो कि पुराने नियम के अनुष्ठान को अब और अधिक आवश्यक नहीं बनाता है (व्यवस्थाविवरण 10:16, 30:6; यिर्मयाह 4:4, 9:26; प्रेरितों के काम 7:51; रोमियों 2:29)।

व्यवहारिक शिक्षा : यद्यपि, पौलुस ने कई क्षेत्रों को सम्बोधित किया है, आज हमारे लिए मूल शिक्षा हमारे जीवनों में दोनों हमारे उद्धार और हमारे पवित्रीकरण के लिए मसीह की पर्याप्तता पूर्ण और पूरी है। हमें सुसमाचार को जानना और समझना चाहिए ताकि हम झूठी शिक्षाओं और कर्मकाण्डों के चतुर स्वरूपों से भ्रम में न पड़ जाएँ। हमें किसी भी तरह के विचलन से सुरक्षित रहना चाहिए जो मसीह की केन्द्रीयता को प्रभु और उद्धारकर्ता के रूप में कम कर देता है। कोई भी "धर्म" जो स्वयं को ऐसी पुस्तकों का उपयोग करते हुए सत्य के साथ तुल्य होने का दावा यह कहते हुए करता है कि वह बाइबल के अधिकार की तुल्यता में है या जो मानवीय प्रयासों को ईश्‍वर प्रदत्त उद्धार के कार्य के साथ जोड़ने का प्रयास करता है, से बचा जाना चाहिए। अन्य धर्म मसीही विश्‍वास के साथ न तो जुड़ सकते और न ही मिल सकते हैं। मसीह हमें नैतिक व्यवहार को पूर्ण मापदण्डों को प्रदान करता है। मसीही विश्‍वास एक धर्म नहीं — अपितु एक परिवार, जीवन यापन करने का एक मार्ग और एक सम्बन्ध है। भले कार्य, ज्योतिष विज्ञान, जादू टोना और ग्रहों को देखना इत्यादि हमें परमेश्‍वर के तरीकों को नहीं दिखता है। केवल मसीह ही उद्धार को प्रदान करता है। उसकी इच्छा हमें उसके वचन, उसके प्रेम पत्र में प्रकाशित कर दी गई है; हमें उसे अवश्य ही जान लेना चाहिए!


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