2 तीमुथियुस की पुस्तक


लेखक : 2 तीमुथियुस 1: 1 इस पुस्तक के लेखक को प्रेरित पौलुस के रूप में परिचित कराती है।

लेखन तिथि : 2 तीमुथियुस की पुस्तक को 67 ईस्वी सन् के आसपास, प्रेरित पौलुस के ठीक थोड़े समय पहले लिखे हुए होने की सम्भावना पाई जाती है।

लेखन का उद्देश्य : रोम में कैद, तथापि, प्रेरित पौलुस ने अकेलेपन और त्याग दिए जाने को महसूस किया। पौलुस ने पहचान लिया कि उसके पार्थिव जीवन के अन्त के आगमन की सम्भावना शीघ्र थी। 2 तीमुथियुस की पुस्तक अनिवार्य रूप से पौलुस के "अन्तिम वचन" हैं। पौलुस ने अपनी परिस्थितियों में कलीसियाओं और विशेष रूप से तीमुथियुस के लिए की हुई चिन्ताओं को व्यक्त करने के लिए अतीत की ओर देखा। पौलुस तीमुथियुस, और अन्य विश्‍वासियों को विश्‍वास में धैर्य के साथ बने रहने (2 तीमुथियुस 3:14) और यीशु मसीह के सुसमाचार की घोषणा के लिए उत्साह के अपने अन्तिम शब्दों को उपयोग करना चाहता था (2 तीमुथियुस 4:2)।

कुँजी वचन : 2 तीमुथियुस 1:7, "क्योंकि परमेश्‍वर ने हमें भय की नहीं पर सामर्थ्य, और प्रेम, और संयम की आत्मा दी है।"

2 तीमुथियुस 3:16-17, "सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्‍वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेश, और समझाने, और सुधारने, और धार्मिकता की शिक्षा के लिये लाभदायक है। ताकि परमेश्‍वर का जन सिद्ध बने, और हर एक भले काम के लिये तत्पर हो जाए।"

2 तीमुथियुस 4:2, "कि तू वचन का प्रचार कर; समय और असमय तैयार रह — सब प्रकार की सहनशीलता और शिक्षा के साथ उलाहना दे, और डाँट, और समझा।"

2 तीमुथियुस 4:7-8, "मैं अच्छी कुश्ती लड़ चुका हूँ, मैं ने अपनी दौड़ पूरी कर ली है, मैं ने विश्‍वास की रखवाली की है। भविष्य में मेरे लिये धर्म का वह मुकुट रखा हुआ है, जिसे प्रभु, जो धर्मी, और न्यायी है — मुझे उस दिन देगा और मुझे ही नहीं, वरन् उन सब को भी जो उसके प्रगट होने को प्रिय जानते हैं।"

संक्षिप्त सार : पौलुस तीमुथियुस को मसीह और शुद्ध शिक्षा में दृढ़ता से उत्साह के साथ बने रहने के लिए उत्साहित करता है (2 तीमुथियुस 1:1-2, 13-14)। पौलुस तीमुथियुस को अभक्ति से भरी हुई मान्यताओं और प्रथाओं से बचने और जो कुछ अनैतिक है उससे भागने के लिए स्मरण दिलाता है (2 तीमुथियुस 2:14-26)। अन्त के समयों में तीव्र सताव और मसीही विश्‍वास से धर्मत्याग दोनों ही होगा (2 तीमुथियुस 3:1-17)। पौलुस विश्‍वासियों के लिए एक तीव्र निवेदन के साथ समाप्त करता है कि वे अपने विश्‍वास में दृढ़ता से खड़े रहें और अपनी दौड़ को शक्ति के साथ समाप्त करें (2 तीमुथियुस 4:1-8)।

सम्पर्क : पौलुस तीमुथियुस को उन्हें जिनकी वह पासबानी कर रहा था, उन्हें झूठे शिक्षकों से बचाने की चेतावनी देने के लिए इतना अधिक चिन्तित है कि वह मिस्री जादूगरों की कहानी का आह्वान करता है जिन्होंने मूसा को विरोध किया था (निर्गमन 7:11, 22; 8:7, 18, 19; 9:11)। यद्यपि उनके नाम पुराने नियम में उल्लेखित नहीं हैं, तथापि परम्परा यह है कि इन लोगों ने ही सोने के बछड़े को बनाने के लिए लोगों को उत्तेजित किया था और बाकी के मूर्तिपूजकों के साथ मर गए थे (निर्गमन 32)। पौलुस भविष्यद्वाणी करता है कि यही गंतव्य उनका है जो मसीह के सत्य का विरोध करते हैं, उनकी मूर्खता अन्त में "प्रत्येक के सामने स्पष्ट" कर दी जाएगी (2 तीमुथियुस 3:9)।

व्यवहारिक शिक्षा : मसीही जीवन में पथ-से-भटक जाना बहुत ही आसान होता है। हमें हमारी आँखों को सामने रखे हुए पुरस्कार — यीशु मसीह के द्वारा स्वर्ग में प्रतिफल दिए जाने की ओर लगाए रखना चाहिए ( 2 तीमुथियुस 4:8)। हमें दोनों ही अर्थात् झूठी शिक्षाओं और अभक्ति से भरी हुई प्रथाओं से बचने का प्रयास करना चाहिए। इसे केवल परमेश्‍वर के वचन के ज्ञान में बने रहने और कुछ भी ऐसा जो बाइबल आधारित नहीं है, को दृढ़ता से इन्कार करने के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है।


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