1 तीमुथियुस की पुस्तक


लेखक : 1 तीमुथियुस की पुस्तक प्रेरित पौलुस के द्वारा लिखी गई थी (1 तीमुथियुस 1:1)।

लेखन तिथि : 1 तीमुथियुस की पुस्तक 62-66 ईस्वी सन् में लिखी गई थी।

लेखन का उद्देश्य : पौलुस ने तीमुथियुस को इफिसियों की कलीसिया और एशिया के प्रान्त में अन्य सम्भव कलीसियाओं की देखभाल करने के लिए उत्साहित करने के लिए इस पत्र को लिखा था (1 तीमुथियुस 1:3)। यह पत्र प्राचीनों को अभिषेक देने (1 तीमुथियुस 3:1-7), और कलीसिया में विभिन्न पदों पर अभिषिक्त लोगों को मार्गदर्शन देने के प्रबन्ध (1 तीमुथियुस 3:8-13) की नींव को निर्मित करता है। अपने सार में, 1 तीमुथियुस कलीसियाई संगठन और प्रशासन के नेतृत्व के लिए हस्तपुस्तिका है।

कुँजी वचन : 1 तीमुथियुस 2:5, "क्योंकि परमेश्‍वर एक ही है, और परमेश्‍वर और मनुष्यों के बीच में भी एक ही बिचवई है, अर्थात् मसीह यीशु जो मनुष्य है।"

1 तीमुथियुस 2:12, "और मैं कहता हूँ, कि स्त्री न उपदेश करे, और न पुरूष पर आज्ञा चलाए, परन्तु चुपचाप रहे।"

1 तीमुथियुस 3:1-2, "यह बात सत्य है कि जो अध्यक्ष होना चाहता है, वह भले काम की इच्छा करता है। यह आवश्यक है कि अध्यक्ष निर्दोष, और एक ही पत्नी का पति, संयमी, सुशील, सभ्य, अतिथि-सत्कार करनेवाला, और सिखाने में निपुण हो। पियक्कड़ या मारपीट करनेवाला न हो; वरन् कोमल हो, और न झगड़ालू, और न धन का लोभी हो।"

1 तीमुथियुस 4:9-10, "और यह बात सच और हर प्रकार से मानने के योग्य है। क्योंकि हम परिश्रम और यत्न इसी लिये करते हैं कि हमारी आशा उस जीवते परमेश्‍वर पर है, जो सब मनुष्यों का और निज करके विश्‍वासियों का उद्धारकर्ता है।"

1 तीमुथियुस 6:12, "विश्‍वास की अच्छी कुश्ती लड़; और उस अनन्त जीवन को धर ले, जिसके लिये तू बुलाया, गया, और बहुत गवाहों के साम्हने अच्छा अंगीकार किया था।"

संक्षिप्त सार : यह पौलुस के द्वारा तीमुथियुस को लिखा हुआ पहला पत्र है, जो कि एक जवान पास्टर है, जो पौलुस के लिए उसके कार्यों में एक सहायक के रूप में था। तीमुथियुस एक यूनानी था। उसकी माता एक यहूदिन थी और उसका पिता एक यूनानी था। पौलुस तीमुथियुस के लिए एक परामर्शदाता और अगुवे से कहीं अधिक, उसके लिए एक पिता के जैसे और तीमुथियुस पौलुस के लिए एक पुत्र के जैसे था (1 तीमुथियुस 1:2)। पौलुस इस पत्र को तीमुथियुस को इस विनती के साथ लिखते हुए करता है कि वह झूठे शिक्षकों और झूठे धर्मसिद्धान्तों से स्वयं की सुरक्षा करे। तथापि, इस पत्र का अधिकांश भाग व्यक्तिगत् व्यवहार का निपटारा करता है। पौलुस तीमुथियुस को आराधना (अध्याय 3) और कलीसिया में परिपक्व अगुवों को विकसित करने के लिए निर्देश देता है और (अध्याय 3)। पासबानी व्यवहार से सम्बन्धित उसके अधिकांश पत्र, झूठे शिक्षकों के बारे में चेतावनी, और पापी सदस्यों, विधवाओं, प्राचीनों, और दासों को प्रति कलीसिया के उत्तरदायित्व का निपटारा करते हैं। अपने पूरे पत्र में, पौलुस तीमुथियुस को दृढ़ता के साथ खड़े होने, और अपनी बुलाहट के प्रति सत्य से बने रहने के लिए उत्साहित करता है।

सम्पर्क : 1 तीमुथियुस की पुस्तक में पुराने नियम का एक रूचिकर सम्पर्क कलीसिया के प्राचीनों को "दो गुने" आदर के योग्य मानने और उस सम्मान को पाने के अधिकार हैं जब बात गलत कार्य के लिए दोष लगाए जाने की आती है, के आधार के रूप में पौलुस उद्धृत करता है (1 तीमुथियुस 5:17-19)। व्यवस्थाविवरण 24:15, 25:4 और लैव्यव्यवस्था 19:13 सभी एक कार्य करने वाले उसके पारिश्रमिक अदा करने की आवश्यकता को, जो कुछ उसने कमाया है और उसे समय पर दिए जाने की बात करते हैं। मूसा की व्यवस्था का आंशिक भाग मांग करता है कि दो या तीन गवाह किसी एक व्यक्ति के विरूद्ध एक दोष लगाने के लिए आवश्यक थे (व्यवस्थाविवरण 19:15)। कलीसियाओं में यहूदी मत से आए हुए मसीही विश्‍वासी जिनकी पासबानी तीमुथियुस कर रहा था, अच्छी तरह से पुराने नियम के इन सम्पर्कों से जागरूक थे।

व्यवहारिक शिक्षा : यीशु मसीह पौलुस के द्वारा यहाँ पर परमेश्‍वर और मनुष्य के मध्य में उन सभों के एक बिचवई (1 तीमुथियुस 2:5), उद्धारकर्ता के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो उसमें विश्‍वास करेंगे। वह कलीसिया का प्रभु है, और तीमुथियुस उसकी सेवा उसकी कलीसिया की पासबानी करते हुए करता है। इस प्रकार, हम पौलुस के द्वारा "विश्‍वास में उसके पुत्र" को लिखित प्रथम पत्र की मुख्य व्यवहारिक शिक्षा को पाते हैं। पौलुस तीमुथियुस को कलीसियाई धर्मसिद्धान्तों, कलीसियाई नेतृत्व, और कलीसियाई प्रशासन के विषयों के ऊपर निर्देश देता है। हम इन ही निर्देशों को आज हमारी स्थानीय कलीसिया के प्रशासन के ऊपर कार्यरत् देखते हैं। इसी तरह से, एक पास्टर का कार्य और सेवकाई, एक प्राचीन की योग्यताएँ, और एक डीकन की योग्यताएँ आज उतनी ही विशेष और महत्वपूर्ण जैसी कि वे तीमुथियुस के दिनों में थी। तीमुथियुस को लिखे हुए पौलुस का पहला पत्र नेतृत्वपन, प्रशासन, और स्थानीय कलीसिया की पासबानी के ऊपर लिखी हुई एक निर्देश पुस्तिका है। इस पत्र में निहित निर्देशों को कोई भी अगुवा या मसीह की कलीसिया का होने वाला कोई भी अगुवा स्वयं के ऊपर लागू कर सकता है और यह आज भी उतनी अधिक प्रासंगिक हैं जितनी कि पौलुस के दिनों में थीं। वे जो उनकी कलीसिया में नेतृत्वपन की भूमिका के लिए नहीं बुलाए गए हैं, यह पुस्तक तौभी उनके लिए व्यवहारिक है। प्रत्येक अनुयायी को उसके विश्‍वास के ऊपर बने रहना चाहिए और झूठी शिक्षाओं से बचना चाहिए। प्रत्येक अनुयायी को दृढ़ता और धैर्य के साथ खड़े रहना चाहिए।


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