1 थिस्सलुनीकियों की पुस्तक


लेखक : 1 थिस्सलुनीकियों 1:1 सूचित करता है कि 1 थिस्सलुनीकियों की पुस्तक प्रेरित पौलुस के द्वारा, सम्भवत: सीलास और तीमुथियुस के साथ मिलकर लिखी गई थी।

लेखन तिथि : 1 थिस्सलुनीकियों की पुस्तक 50 ईस्वी सन् के आसपास लिखी गई थी।

लेखन का उद्देश्य : थिस्सलुनीके की कलीसिया में मसीह के आगमन के बारे में कुछ गलत धारणाएँ थीं। पौलुस ने इन्हें अपने पत्र के द्वारा स्पष्ट करना चाहा। उसने साथ ही इसे पवित्र जीवन यापन करने के लिए निर्देश स्वरूप भी लिखा।

कुँजी वचन : 1 थिस्सलुनीकियों 3:5, "इस कारण जब मुझ से और न रहा गया, तो तुम्हारे विश्‍वास का हाल जानने के लिये भेजा, कि कहीं ऐसा न हो कि परीक्षा करनेवाले ने तुम्हारी परीक्षा की हो, और हमारा परिश्रम व्यर्थ हो गया हो।"

1 थिस्सलुनीकियों 3:7, "इसलिये हे भाइयो, हम ने अपने सारे दु:ख और क्लेश में तुम्हारे विश्‍वास से तुम्हारे विषय में शान्ति पाई।"

1 थिस्सलुनीकियों 4:14-17, "क्योंकि यदि हम विश्‍वास करते हैं कि यीशु मरा और जी भी उठा, तो वैसे ही परमेश्‍वर उन्हें भी जो यीशु में सो गए हैं, उसी के साथ ले आएगा। क्योंकि हम प्रभु के वचन के अनुसार तुम से यह कहते हैं कि हम जो जीवित हैं, और प्रभु के आने तक बचे रहेंगे, सोए हुओं से कभी आगे न बढ़ेंगे। क्योंकि प्रभु आप ही स्वर्ग से उतरेगा; उस समय ललकार, और प्रधान दूत का शब्द सुनाई देगा, और परमेश्‍वर की तुरही फूँकी जाएगी, और जो मसीह में मरे हैं, वे पहले जी उठेंगे। तब हम जो जीवित और बचे रहेंगे, उनके साथ बादलों पर उठा लिए जाएँगे, कि हवा में प्रभु से मिलें, और इस रीति से हम सदा प्रभु के साथ रहेंगे।"

1 थिस्सलुनीकियों 5:16, "सदा आनन्दित रहो। निरन्तर प्रार्थना मे लगे रहो। हर बात में धन्यवाद करो: क्योंकि तुम्हारे लिये मसीह यीशु में परमेश्‍वर की यही इच्छा है।"

संक्षिप्त सार : पहले तीन अध्याय थिस्सलुनीके की कलीसिया में पौलुस के वापस आने की लालसा के बारे में हैं परन्तु वह ऐसा इसलिए नहीं कर सका था क्योंकि शैतान ने उसे रोके रखा (1 थिस्सलुनीकियों 2:18), और पौलुस उनकी कितना अधिक चिन्ता करता है और यह सुनकर कि वे कैसे थे, बहुत अधिक उत्साहित हुआ था। पौलुस तब उनके लिए प्रार्थना करता है (1 थिस्सलुनीकियों 3:11-13)। अध्याय 4 में, पौलुस थिस्सलुनीकियों के विश्‍वासियों को मसीह यीशु में, कैसे एक पवित्र जीवन को यापन करना है, के ऊपर निर्देश दे रहा है (1 थिस्सलुनीकियों 4:1-12)। पौलुस उनकी एक गलत धारणा के प्रति निर्देश देता चला जाता है। वह उनसे कहता है कि जो लोग मसीह यीशु में सो गए हैं, वे भी उस समय स्वर्ग जाएँगे जब मसीह वापस आएगा (1 थिस्सलुनीकियों 4:13-18, 5:1-11)। पुस्तक का समापन मसीही जीवन को यापन करने के अन्तिम निर्देशों के साथ अन्त होता है।

सम्पर्क : पौलुस थिस्सलुनीके के विश्‍वासियों को स्मरण दिलाता है कि जिस सताव का सामना वे उनके "अपने ही देश के लोगों" (वचन 2:15), यहूदियों से कर रहे हैं, ये वही हैं, जिन्होंने मसीह का इन्कार कर दिया था, जो वही है जिसके बारे में पुराने नियम की भविष्यद्वताओं ने दु:ख उठाया था (यिर्मयाह 2:30; मत्ती 23:31)। यीशु ने चेतावनी दी थी कि परमेश्‍वर के सच्चे भविष्यद्वक्ताओं को सदैव ही अधर्मियों के विरोध को सहन करना होगा (लूका 11:49)। कुलुस्सियों में, पौलुस ने इसी सत्य का स्मरण दिलाया है।

व्यवहारिक शिक्षा : इस पुस्तक को कई परिस्थितियों में लागू किया जा सकता है। यह मसीही को चाहे वे मरे हुए हों या जीवित हों आश्‍वस्त करती है कि जब मसीह का आगमन पुन: होगा तब हम उसके साथ होंगे (1 थिस्सलुनीकियों 4:13-18)। यह हमें आश्‍वस्त करती है कि मसीही विश्‍वासी होने के नाते हम परमेश्‍वर के क्रोध को नहीं पाएँगे (1 थिस्सलुनीकियों 5:8-9)। यह हमें निर्देश देती है कि कैसे मसीही जीवन को प्रतिदिन यापन करना है (1 थिस्सलुनीकियों 4–5)।


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