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प्रश्न

पुराने नियम की कहानी क्या है?

उत्तर


आदि में, परमेश्‍वर पहले से ही विद्यमान था। अपने भले आनन्द के लिए, परमेश्‍वर ने अपने वचन की सामर्थ्य से समय और ब्रह्माण्ड की सृष्टि की, कुछ नहीं को कुछ हो जाने में परिवर्तित कर दिया। सृष्टि के छठे दिन, परमेश्‍वर ने कुछ अद्वितीय: अर्थात् मानव जाति — एक पुरूष और एक स्त्री को — अपने स्वरूप और समानता में बनाया। जैसे ही परमेश्‍वर ने पहले दो मनुष्यों को नर और मादा के रूप में रचा, उसने विवाह की वाचा की स्थापना की (उत्पत्ति 1-2)।

परमेश्‍वर ने पुरूष और उसकी पत्नी को अदन की वाटिका के एक आदर्श वातावरण में रखा, और उन्हें वाटिका की देखभाल के दायित्व को दे दिया। परमेश्‍वर ने उन्हें वाटिका में से किसी भी फल खाने की अनुमति दी परन्तु एक: अच्छे और बुरे के ज्ञान के वृक्ष को छोड़कर जिसका फल खाने के लिए उन्हें मना कर दिया गया था। उनके पास आज्ञा पालन करने या अवज्ञा करने का विकल्प था, परन्तु परमेश्‍वर ने उन्हें चेतावनी दी कि यदि उन्होंने आज्ञा की अवहेलना की तो परिणाम मृत्यु होगा (उत्पत्ति 2:15-17)।

इस बीच, लूसिफर नाम के एक शक्तिशाली स्वर्गदूत ने स्वर्ग में परमेश्‍वर के विरूद्ध विद्रोह कर दिया। वह और एक तिहाई स्वर्गदूत प्राणी स्वर्ग से बाहर निकाल दिए गए। लूसिफर वाटिका में आया जहाँ पुरूष और उसकी पत्नी थी। वहाँ, उसने एक सांप का रूप धारण किया और मना किए हुए फल को खाने की परमेश्‍वर की आज्ञा की अवहेलना करने वाली परीक्षा में पहली स्त्री को डाल दिया। उसने स्त्री को बताया कि वह नहीं मरेगी और फल उसके लिए वास्तव में अच्छा था। स्त्री ने उसके झूठ पर विश्‍वास किया और फल के कुछ हिस्से को खा लिया। तब उसने अपने पति, आदम को भी खाने के लए फल दिया और उसने भी खा लिया। तुरन्त, यह जोड़ा जान गया कि उन्होंने गलत किया है। उन्होंने स्वयं को शर्मिन्दा और कमजोर और उघाड़े हुए महसूस किया। जब परमेश्‍वर उनसे मुलाकात करने आया, तो उन्होंने स्वयं को छिपा लिया (यशायाह 14:12-15; उत्पत्ति 3)।

नि:सन्देह, परमेश्‍वर ने उन्हें ढूंढ़ लिया। न्याय को लागू किया गया। भूमि को मनुष्य के कारण शाप दिया गया: यह अब अपने फल को आसानी से नहीं देगी; इसकी अपेक्षा, फसल का उत्पादन करने के लिए मनुष्य को परिश्रम करना होगा। प्रसव के समय स्त्री को पीड़ा से निकलने का शाप दिया गया। तब से सांप को मिट्टी में रेंग कर चलने का शाप दिया गया। और तब परमेश्‍वर ने एक प्रतिज्ञा की: एक दिन, कोई एक स्त्री से जन्म लेगा जो सांप के साथ युद्ध करेगा। जन्म लेने वाला यह व्यक्ति सांप के सिर को कुचल देगा, यद्यपि, इस प्रक्रिया में वह स्वयं घायल होगा। अदन की वाटिका से बाहर निकालने से पहले परमेश्‍वर ने एक जानवर का वध किया और उसके चमड़े से उस पापी जोड़े को वस्त्र प्रदान किए (उत्पत्ति 3:15-19, 21)।

पहले जोड़े के परिवार में भलाई और बुराई के बीच संघर्ष चलता रहा। उनके पुत्रों में से एक, कैन ने अपने भाई, हाबिल की हत्या कर दी, और उसके इस काम के लिए उसे शाप दिया गया। एक और सन्तान पहली स्त्री से उत्पन्न हुई। उसका नाम शेत था (उत्पत्ति 4:8, 25)।

कई पीढ़ियों के पश्‍चात्, संसार बुराई से भर गया था। हिंसा और परमेश्‍वर के प्रति अनादर व्यापक मात्रा में प्रचलित था। परमेश्‍वर ने मनुष्य की बुराई को नष्ट करने और फिर से सब कुछ आरम्भ करने के लिए संकल्प लिया। शेत के वंशजों में से एक व्यक्ति नूह के नाम से था, जिस विस्तारित अनुग्रह (अयोग्य के ऊपर परमेश्‍वर की आशीष) दिया गया। परमेश्‍वर ने नूह को बताया कि वह पृथ्वी को नष्ट करने के लिए एक बड़ी जल प्रलय को भेज देगा, और उसने नूह को जल प्रलय से बचने के लिए एक जहाज बनाने के लिए निर्देश दिए। नूह ने जहाज को बनाया और जब समय आया, तब परमेश्‍वर ने प्रत्येक तरह के जानवरों को जहाज में प्रवेश करने के लिए प्रेरित किया। नूह और उसके परिवार के साथ इन जानवरों को भी बचाया गया। जल प्रलय ने पृथ्वी पर हर दूसरी जीवित वस्तु को नष्ट कर दिया (उत्पत्ति 6-8)।

जल प्रलय के बाद, नूह और उसके परिवार ने पृथ्वी को फिर से जनसँख्या के उत्पादन को आरम्भ किया। जब उनके वंशजों ने परमेश्‍वर की अवज्ञा में स्वयं के लिए एक गुम्मट को बनाने लगे, तो परमेश्‍वर ने उनकी भाषा में गड़बड़ी डाल दी। पृथ्वी के निवासी अपने से सम्बन्धित भाषा समूहों के अनुसार अलग हो गए और पृथ्वी के चारों ओर फैल गए (उत्पत्ति 11:1-8)।

वह समय आ गया जब परमेश्‍वर ने सांप के सिर को-कुचलने-वाले को इस संसार में भेजने की अपनी योजना पर कार्यवाही से परिचित किया। पहला कदम स्वयं के लिए एक अलग लोगों को निर्मित करने थी। उसने लोगों की एक नई जाति को आरम्भ करने के लिए अब्राहम नाम के एक व्यक्ति और उसकी पत्नी सारा को चुना। परमेश्‍वर ने अब्राहम को अपने घर से बाहर निकल आने के लिए बुला लिया और उसे कनान देश ले गया। परमेश्‍वर ने अब्राहम को असँख्य वंशजों को देने की प्रतिज्ञा की जो कनान की भूमि को अपनी भूमि के रूप में प्राप्त करेंगे। परमेश्‍वर ने अब्राहम के वंश को आशीष और उसके वंश के माध्यम से पृथ्वी के सभी राष्ट्रों को आशीष देने की प्रतिज्ञा की। समस्या यह थी कि अब्राहम और सारा बूढ़े थे, और सारा बांझ थी। परन्तु अब्राहम ने परमेश्‍वर की प्रतिज्ञा के ऊपर विश्‍वास किया, और परमेश्‍वर ने अब्राहम के विश्‍वास को उसके लेखे में धार्मिकता गिना (उत्पत्ति 12:1-4; 15: 6)।

उचित समय पर, परमेश्‍वर ने अब्राहम और सारा को एक पुत्र, इसहाक को देते हुए आशीष दी। परमेश्‍वर ने कई वंशजों और आशीष देने की अपनी प्रतिज्ञा को इसहाक के साथ दोहराया। इसहाक के जुड़वाँ पुत्र अर्थात् एसाव और याकूब थे। परमेश्‍वर ने याकूब को प्रतिज्ञा की गई आशीष को प्राप्त करने के लिए चुना और उसका नाम इस्राएल में परिवर्तित कर दिया। याकूब/इस्राएल के बारह पुत्र थे, जो इस्राएल के बारह गोत्रों के प्रधान बन गए (उत्पत्ति 21:1-6; 25: 19 -26; 28:10-15; 35:23-26)।

एक गम्भीर अकाल के कारण, याकूब अपने पूरे परिवार को कनान से मिस्र में ले आया। मरने से पहले, याकूब ने अपने प्रत्येक पुत्र को भविष्यद्वाणी आधारित आशीषों को दिया। यहूदा को, उसने प्रतिज्ञा दी कि उसके वंश में से एक राजा होगा-जो संसार की सभी जातियों के द्वारा सम्मानित किया जाएगा। याकूब का परिवार मिस्र में बढ़ता चला गया, और वे वहाँ अगले 400 वर्षों तक रहे। तब मिस्र के राजा, ने डरते हुए कि कहीं इस्राएल के लोग संभालने में बहुत अधिक न हो जाएँ, उन्हें गुलाम बना दिया। परमेश्‍वर ने लेवी के गोत्र से मूसा नाम के एक भविष्यद्वक्ता को उठा खड़ा किया, ताकि इस्राएलियों को मिस्र से बाहर लाया जा सके और उस देश में ले जाया जा सके जिसकी प्रतिज्ञा इब्राहीम के साथ की गई थी (उत्पत्ति 46; 49; निर्गमन 1:8-14; 3:7-10)।

मिस्र से निर्गमन लाल सागर के विभाजन सहित कई बड़े आश्‍चर्यकर्मों के साथ हुआ। एक बार सुरक्षित रूप से मिस्र से बाहर निकल आने पर इस्राएल की सन्तान ने सीनै की पहाड़ी पर डेरा लगा लिया, जहाँ परमेश्‍वर ने मूसा को व्यवस्था दी। यह व्यवस्था, संक्षेप में दस आज्ञाओं के रूप में इस्राएल के साथ की गई एक वाचा का आधार था: यदि वे उसकी आज्ञाओं का पालन करते हैं, तो उन्हें आशीषें मिलेंगी, परन्तु यदि उन्होंने उसकी आज्ञाओं को तोड़ दिया, तो वे शापों से पीड़ा को पाएंगे। इस्राएल परमेश्‍वर की आज्ञाओं का पालन करने के लिए सहमत हो गया (निर्गमन 7-11; 14:21-22; 19-20)।

नैतिक संहिता को स्थापित करने के अतिरिक्त, व्यवस्था ने याजक की भूमिका को परिभाषित और पाप के लिए प्रायश्‍नत करने के लिए बलि चढ़ाने को प्रस्तुत किया। प्रायश्‍नत केवल निर्दोष लूह के बलिदान के छिड़काव से ही किया जा सकता है। व्यवस्था ने पवित्र निवासस्थान, या मिलाप के तम्बू का निर्माण कैसे किया जाता है, को भी विवरण दिया, जिसमें परमेश्‍वर की उपस्थिति बनी रहेगी और जहाँ वह अपने लोगों से मिला करेगा (लैव्यव्यवस्था 1; निर्गमन 25:8-9)।

व्यवस्था को प्राप्त करने के पश्‍चात्, मूसा ने इस्राएलियों को प्रतिज्ञा किए गए देश की सीमा तक मार्गदर्शन दिया। परन्तु लोग, कनान के यौद्धाओं जैसे निवासियों से डर गए और परमेश्‍वर की प्रतिज्ञा के ऊपर सन्देह करते हुए, इसमें प्रवेश करने से इन्कार कर दिया। दण्ड स्वरूप, परमेश्‍वर ने उन्हें वापस जंगल की ओर मोड़ दिया, जहाँ उन्हें 40 वर्षों तक घूमने के लिए मजबूर होना पड़ा। अपने अनुग्रह में, परमेश्‍वर ने बड़े ही आश्‍चर्यजनक रूप से पूरी भीड़ के लिए भोजन और पानी को प्रदान किया (गिनती 14:1-4, 34-35; निर्गमन 16:35)।

40 वर्षों के अन्त में, मूसा की मृत्यु हो गई। उसकी अन्तिम भविष्यद्वाणियों में से एक और भविष्यद्वक्ता के आने से सम्बन्धित है, जो मूसा के जैसा ही होगा और जिसकी आवाज लोगों को अवश्य सुननी चाहिए। मूसा के उत्तराधिकारी, यहोशू का उपयोग इस्राएल के लोगों को प्रतिज्ञा किए गए देश में ले जाने के लिए किया गया। वे परमेश्‍वर की इस प्रतिज्ञा के साथ आगे बढ़े कि उनके विरूद्ध कोई भी शत्रु खड़ा नहीं हो सकेगा। परमेश्‍वर ने अपनी सामर्थ्य को यरीहो नामक शहर की दीवारों को समतल बन देने के द्वारा दिखाई, जिसका सामना सबसे पहले किया गया था। अपने अनुग्रह और दया में, परमेश्‍वर ने यरीहो के विनाश से पहले राहाब नामक एक विश्‍वास करनी वाली वेश्या को बचा लिया (व्यवस्थाविवरण 18:15; यहोशू 6)।

आने वाले अगले कुछ वर्षों में, यहोशू और इस्राएली कनानियों में से अधिकांश को बाहर निकालने में सफल हुए, और भूमि बारह गोत्रों में विभाजित की गई। तथापि, भूमि पर विजय अभियान अभी पूरा नहीं हुआ था। विश्‍वास और सरल आज्ञा पालन की कमी के कारण, वे अपने कार्य को समाप्त करने में असफल हुए, और कनानियों के क्षेत्र बने रहे। इन मूर्तिपूजक प्रभावों के इस्राएलियों के ऊपर प्रभाव पड़े, जिन्होंने मूर्तियों की पूजा को अपनाना आरम्भ किया, जो कि परमेश्‍वर की व्यवस्था के सीधे उल्लंघन में था (यहोशू 15:63; 16:10; 18:1)।

यहोशू की मृत्यु के पश्‍चात्, इस्राएली लोगों ने एक उथल-पुथल वाले समय का अनुभव किया। देश मूर्तिपूजा में गिर गया और परमेश्‍वर उन पर एक शत्रु की अधीन गुलाम हो जाने को दण्ड स्वरूप ले आएगा। परमेश्‍वर के लोग पश्‍चाताप करेंगे और सहायता के लिए परमेश्‍वर को पुकारेंगे। तब परमेश्‍वर मूर्तियों को नष्ट करने, लोगों को शत्रु के विरूद्ध फिर से बटोर कर व्यूह करने और शत्रु को हराने के लिए एक न्यायी को उठाएगा। शान्ति थोड़ी देर के लिए ही रहेगी, परन्तु उस न्यायी की मृत्यु के पश्‍चात्, लोग पहले की तरह फिर से मूर्तिपूजा में गिर जाएंगे, और चक्र दोहराया जाएगा (न्यायियों 17:6)।

अन्तिम न्यायी शमूएल था, जो कि एक भविष्यद्वक्ता भी था। अपने समय में, इस्राएल ने अन्य राष्ट्रों की तरह अपने ऊपर शासन करने के लिए उससे राजा की मांग की। परमेश्‍वर ने उनकी विनती का उत्तर दे दिया और शमूएल ने शाऊल को इस्राएल के पहले राजा के रूप में अभिषेक किया। यद्यपि, शाऊल का राजा होना एक विफलता थी। उसने परमेश्‍वर की आज्ञा की अवहेलना की और उसे सत्ता से हटा दिया गया। परमेश्‍वर ने शाऊल के उत्तराधिकारी के रूप में यहूदा के गोत्र के दाऊद को राजा होने के लिए चुना। परमेश्‍वर ने दाऊद से प्रतिज्ञा की उसके वंश से एक ऐसा आएगा जो सदैव के लिए उसके सिंहासन पर बना रहेगा (1 शमूएल 8:5; 15:1, 26; 1 इतिहास 17:11-14)।

दाऊद के पुत्र सुलैमान ने दाऊद की मृत्यु के पश्‍चात् यरूशलेम में शासन किया। सुलैमान के पुत्र के शासनकाल के समय, गृहयुद्ध छिड़ गया, और राज्य विभाजित हो गया: जिसमें उत्तरी राज्य को इस्राएल कह कर पुकारा गया और दक्षिणी राज्य को यहूदा कहा जाता था। दाऊद के राजवंश ने यहूदा में शासन किया (1 राजा 2:1; 12)।

इस्राएल के राज्य में बुरे राजाओं की एक निरन्तर चलती रहने वाली श्रृंखला थी। उनमें से किसी ने भी परमेश्‍वर की कोई खोज नहीं की या परमेश्‍वर की व्यवस्था के अनुसार राष्ट्र को अगुवाई देने का प्रयास किया। परमेश्‍वर ने उन्हें चेतावनी देने के लिए भविष्यद्वक्ताओं को भेजा, जिसमें आश्‍चर्यकर्म-करने वाले एलिय्याह और एलीशा सम्मिलित थे, परन्तु राजा अपनी बुराई में बने ही रहे। अन्त में, परमेश्‍वर इस्राएल के ऊपर राष्ट्र अश्शूर के द्वारा न्याय को ले लाया। अश्शूरियों ने अधिकांश इस्राएली लोगों को निर्वासित कर दिया, और यह उत्तरी राज्य का अन्त था (1 राजा 17:1; 2 राजा 2; 17)।

यहूदा के राज्य में भी बुरे राजाओं का अपना भाग था, परन्तु यह श्रृंखला कभी-कभी परमेश्‍वर का भय मानने वाले राजा के द्वारा टूट जाती थी, जो वास्तव में परमेश्‍वर से प्रेम करते थे और व्यवस्था के अनुसार शासन को चलाने का प्रयास करते थे। परमेश्‍वर अपनी प्रतिज्ञा के प्रति विश्‍वासयोग्य था और उसने उसकी आज्ञाओं का पालन करते समय लोगों को आशीष दी थी। देश को अश्शूरियों के आक्रमण के समय सुरक्षा प्रदान की गई थी और यह कई अन्य खतरों में भी बना रहा था। इस समय में, भविष्यद्वक्ता यशायाह ने यहूदा के पापों के विरूद्ध प्रचार किया और बेबीलोन के द्वारा होने वाले आक्रमण को पहले से ही बता दिया। यशायाह ने भी परमेश्‍वर के दास के आने की भविष्यद्वाणी की — कि वह उसके लोगों के पापों के लिए दु:ख उठाएगा और महिमा को पाएगा और दाऊद के सिंहासन पर विराजमान होगा। भविष्यद्वक्ता मीका ने भविष्यद्वाणी की थी कि प्रतिज्ञा किया हुआ जन बैतलेहम में जन्म लेगा (यशायाह 37; 53:5; मीका 5:2)।

अन्त में, यहूदा का राष्ट्र भी पूरी तरह से मूर्तिपूजा में गिर गया। परमेश्‍वर ने न्याय के रूप में यहूदा के विरुद्ध बेबीलोन के राष्ट्र को ले आया। भविष्यद्वक्ता यिर्मयाह ने यरूशलेम के पतन का अनुभव किया और भविष्यद्वाणी की कि बेबीलोन में यहूदी बन्धुओं को 70 वर्षों पश्‍चात् प्रतिज्ञा की हुई भूमि पर वापस आने को मिलेगा। यिर्मयाह ने भविष्य में होने वाली एक वाचा की भी भविष्यद्वाणी की जिसमें व्यवस्था पत्थर की पटियाओं पर नहीं लिखी जाएगी अपितु परमेश्‍वर के लोगों के मनों के ऊपर लिखी जाएगी। इस नए वाचा के परिणामस्वरूप पाप के लिए परमेश्‍वर की क्षमा उपलब्ध होगी (2 राजा 25:8-10; यिर्मयाह 29:10; 31:31-34)।

बेबीलोन की बन्धुवाई 70 वर्षों तक बनी रही। उस समय में भविष्यद्वक्ता दानिय्येल और यहेजकेल ने सेवा की। दानिय्येल ने कई देशों के उदय और पतन की भविष्यद्वाणी की। उसने मसीहा, या चुने हुए के आने की भी भविष्यद्वाणी की, जो दूसरों के लिए मारा जाएगा (दानिय्येल 2:36-45; 9:26)।

बेबीलोन का पतन फारसियों के द्वारा होने के पश्‍चात्, यहूदियों को यहूदा लौटने के लिए छोड़ दिया गया। कई यहूदी यरूशलेम और मन्दिर के पुनर्निर्माण के लिए घर वापस लौट आए। नहेम्याह और एज्रा ने उन प्रयासों का नेतृत्व किया, जिन्हें भविष्यद्वक्ता हाग्गै और जकर्याह ने उत्साह दिया। जकर्याह की भविष्यद्वाणियों में से एक भविष्य के राजा के विवरण का सम्मिलित होना है, जो एक गधे पर सवार होकर यरूशलेम में आएगा (नहेम्याह 6:15-16; एज्रा 6:14-15; जकर्याह 9: 9)।

यद्यपि, सभी यहूदी वापस नहीं लौटे थे। कई ने फारस में रहने का निर्णय किया था, जहाँ पर परमेश्‍वर की देखभाल अभी भी उनके ऊपर बनी हुई थी। एस्तेर नाम की एक यहूदिन यहूदी फारस की रानी के पद पर पहुँची और राज्य के सभी यहूदियों के जीवन को बचाने में सहायक रही (एस्तेर 8:1)।

मलाकी ने पुराने नियम की अन्तिम पुस्तक को लिखा है। उसने भविष्यद्वाणी की कि प्रभु उसके मन्दिर में आएगा, परन्तु, उसके आगमन से पहले, एक और दूत आकर प्रभु के लिए मार्ग को तैयार करेगा। यह दूत प्राचीन भविष्यद्वक्ता एलिय्याह की तरह होगा। मलाकी की भविष्यद्वाणी के पश्‍चात्, परमेश्‍वर को सीधे मनुष्य से बात करने के लिए और 400 वर्षों के समय लगा (मलाकी 3:1; 4:5)।

पुराना नियम मनुष्य के छुटकारे को लाने के लिए परमेश्‍वर की योजना की कहानी है। पुराने नियम के अन्त में, परमेश्‍वर के पास एक विशेष चुने हुए लोग हैं, जो लहू के बलिदान के महत्व को समझते हैं, जो अब्राहम और दाऊद के साथ की गई प्रतिज्ञा के ऊपर विश्‍वास करते हैं, और जो छुटकारे की प्रतीक्षा कर रहे हैं। संक्षेप में, वे उत्पत्ति के सांप के सिर को-कुचलने वाले, मूसा की जैसे एक भविष्यद्वक्ता, यशायाह के दु:खी दास, दाऊद के पुत्र, दानिय्येल के मसीहा और जकर्याह के विनम्र राजा को प्राप्त करने के लिए तैयार हैं — और यह सारे बातें एक ही व्यक्ति, यीशु मसीह में पाई जाती हैं।

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