क्रूस के मार्ग पर आने वाले विश्राम स्थल क्या हैं, और हम उनसे क्या सीख सकते हैं?"


प्रश्न: क्रूस के मार्ग पर आने वाले विश्राम स्थल क्या हैं, और हम उनसे क्या सीख सकते हैं?"

उत्तर:
स के विश्राम स्थलों को वाया डोलारोसा के नाम से भी जाना जाता है, यह पृथ्वी पर यीशु मसीह के जीवन के अन्तिम झणों की कहानी है, जो निरन्तर प्रत्येक मसीही विश्‍वासी को आत्मिक दृढ़ता और हमारे जीवनों के लिए निहितार्थों को प्रदान करती है। क्रूस के विश्राम स्थल बड़े ही विनम्र तरीके से एक साधारण अनुस्मारक के रूप में कार्य करते हैं, जिसमें यीशु अपने बलिदान को देने के माध्यम से उद्धार का रास्ता प्रदान करने के लिए स्वयं के ईश्‍वरीय विशेषाधिकार को एक ओर रखने के लिए तैयार हो गया था।

उन अन्तिम क्षणों का वर्णन करने वाले कई व्यापक रूप से स्वीकृत संस्करण हैं, एक बाइबल आधारित है और दूसरे यीशु के अन्तिम क्षणों की घटनाओं को दर्शाने के लिए अधिक परम्परागत हैं। क्रूस के पथ पर आने वाले विश्राम स्थल पारम्परिक रूप से निम्नानुसार है:
1. यीशु को मृत्यु दण्ड सुनाया जाता है।
2. यीशु को उसका क्रूस दिया जाता है।
3. यीशु प्रथम बार नीचे गिरता है।
4. यीशु की मुलाकात उसकी माता मरियम से होती है।
5. उसका क्रूस उठाने के लिए कुरेनी शमौन मजबूर किया जाता है।
6. विरोनिका यीशु के चेहरे से लहू को साफ करती है।
7. यीशु दूसरी बार नीचे गिरता है।
8. यीशु यरूशलेम की स्त्रियों से मुलाकात करता है।
9. यीशु तीसरी बार नीचे गिरता है।
10. यीशु के कपड़ों को उतार दिया जाता है।
11. यीशु को क्रूस — पर कीलों के द्वारा क्रूसित कर दिया जाता है।
12. यीशु क्रूस पर मर जाता है।
13. यीशु के शरीर को क्रूस पर से हटा दिया जाता है — उतारना और विलाप किया जाना।
14. यीशु के शरीर को कब्र में रख दिया जाता है।

क्रूस के मार्ग के पारम्परिक विश्राम स्थलों में, तथापि, विश्राम स्थल 3, 4, 6, 7, और 9 स्पष्ट रीति से बाइबल आधारित नहीं है। परिणाम स्वरूप, "क्रूस के पवित्रशास्त्रीय मार्ग" को विकसित किया गया है। नीचे क्रूस के बाइबल आधारित 14 विश्राम स्थलों का विवरण दिया गया है और प्रत्येक के निहितार्थों को जीवन में लागू करने के लिए दिया गया है।

क्रूस के मार्ग का 1ला विश्राम स्थल : जैतून के पहाड़ पर यीशु (लूका 22:39-46)।
यीशु ने जैतून के पहाड पर अपने पिता से इस प्याले के हटा लेने के लिए प्रार्थना की थी, जिसका अर्थ उसकी क्रूस पर होने वाली मृत्यु से था; इसने यीशु की मानवता को प्रदर्शित किया (लूका 22:39-46)। यह कल्पना करना कठिन नहीं है कि आने वाली घटनाओं का सामना करने का उसका पूर्वानुमान कितना अधिक कठिनाई से भरा रहा होगा, जो बहुत ही अधिक निकट थीं। सभी मसीही विश्‍वासियों के जीवन में ऐसा समय आता है, जब उन्हें भी परमेश्‍वर की इच्छा और स्वयं की इच्छा के मध्य में चुनाव करना होता है, और वह चुनाव, जैसा कि यीशु का चुनाव था, परमेश्‍वर के प्रति समर्पण और आज्ञाकारिता के स्तर, साथ ही साथ मन की सच्ची अवस्था को प्रदर्शित करता है। यद्यपि यीशु अपने भाग्य के बारे में जानता था, जिसका वह सामना करने वाला था, जब उसने परमेश्‍वर से आने वाली घटनाओं में परिवर्तन के लिए जैतून के पहाड़ पर प्रार्थना की, तब उसकी प्रार्थना यह थी, कि चाहे उसके भविष्य में कुछ भी क्यों न रखा हो, तथापि पिता ही की इच्छा पूरी होनी चाहिए। यहाँ तक कि क्रूस के ऊपर कीलों से जड़ दिए जाने के पश्चात् अपने जीवन की साँस को उसने दे दिया था, तब भी यीशु हमें परमेश्‍वर के वचन के प्रति आज्ञाकारिता के महत्व और प्रत्येक स्थिति में उसके पर विश्‍वास करने के महत्व को सिखा रहा था।

क्रूस के मार्ग का 2रा विश्राम स्थल : यहूदा के द्वारा यीशु का विश्‍वासघात किया जाना और पकड़ लिया जाना (लूका 22:47-48)।
यहूदा न केवल इतिहास में एक सबसे अधिक तुच्छ पात्र बन गया, जिसने यीशु के साथ विश्‍वासघात किया, परन्तु साथ ही वह प्रत्येक मसीही विश्‍वासी के लिए एक डरावना अनुस्मारक बन गया कि उनके जीवन में ऐसे समय रहे हैं, जब वे पाप की परीक्षा में गिरे थे। क्योंकि मसीही विश्‍वासियों के लिए, पाप में ठोकर खाना, ऐसा है जैसे कि मानो उसके साथ विश्‍वासघात करना है, जिसने उनके लिए स्वयं के जीवन को दिया है। उस समय विश्‍वासघात कितना अधिक बड़ा होगा जब पाप एक चुनाव किया हुया व्यवहार होता है, अर्थात् जानबूझकर पवित्रशास्त्र आधारित निश्चय से मुड़ जाना (लूका 22:47-48)? यहूदा यीशु के साथ रहता था उसके चरणों पर बैठ कर उसने वर्षों तक उससे शिक्षा को प्राप्त किया था। परन्तु क्योंकि उसका मन वास्तव में पवित्र आत्मा की सामर्थ्य के द्वारा रूपान्तरित नहीं हुआ था, वह तब गिर गया जब शैतान ने उसे परीक्षा में डाला। मसीही विश्‍वासी होने के नाते, हमें "स्वयं की जाँच" यह देखने के लिए करने के लिए कही गई है कि हम सच में विश्‍वास में हैं या नहीं (2 कुरिन्थियों 13:5)।

क्रूस के मार्ग का 2रा विश्राम स्थल : यीशु को यहूदी न्यायालय अर्थात् सेन्हेद्रीन के द्वार दोषी ठहरा दिया गया (लूका 22:66-71)।
सेन्हेद्रीन की महासभा, सत्तर याजकों और शास्त्रियों और एक महायाजक के द्वारा मिलकर बनी हुई थी, जिसने यह मांग की कि पिलातुस यीशु को मृत्युदण्ड दे। यह घटना सभी मसीही विश्‍वासियों के लिए चेतावनी का कार्य करती है, कि वे अन्यों की जाँच स्वयं की धार्मिकता के साथ न करते हुए स्वयं को उच्च ठहराने के प्रति सतर्क रहें। बाइबल का ज्ञान और इस संसार के उच्च पद पवित्र पूर्णता की तुलना में महिमा रहित हैं, और घमण्ड से भरी हुई सोच यहाँ तक कि सभी लोगों के मध्य में सबसे अधिक धर्मी व्यक्ति के लिए भी आसानी से गिरने का कारण बन जाती है। बाइबल हमें उच्च पद पर नियुक्त अधिकारियों का सम्मान करने की शिक्षा देती है, परन्तु अन्तत: यह परमेश्‍वर की इच्छा और परमेश्‍वर का वचन ही है, जो हमारे जीवन में प्रभुत्व के साथ शासन करना चाहिए। मसीही विश्‍वासी परमेश्‍वर के पवित्र आत्मा के बपितस्मा का उपहार पाए हुए प्रत्येक परिस्थिति में एक दूसरे को सांत्वना, शिक्षा और मार्गदर्शन देने वाले लोग होते हैं, जो उन्हें परमेश्‍वर की सिद्ध इच्छानुसार प्रत्येक निर्णय को लेने में, अनिवार्य रूप से सेन्हेद्रीन जैसे धार्मिक शासक के प्रति एक व्यक्ति की आवश्यकता का इन्कार करने में सहायता प्रदान करता है। यहूदियों की सर्वोच्च धार्मिक अधिकारों वाली सेन्हेद्रीन महासभा सेन्हेद्रीन के याजकों और शास्त्रियों के मध्य में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने का कारण बन गया और जब यीशु ने ऐसे धर्मसिद्धान्त की शिक्षा देनी आरम्भ की जिसने उनके अधिकार को कम आँका, तब उन्होंने उसके विरुद्ध षड्यंत्र रचने का प्रयास किया, और अन्तत: उन्होंने रोमी सरकार से उसके लिए क्रूस की मांग की (लूका 22:66-71)।

क्रूस के मार्ग का 4था विश्राम स्थल : पतरस यीशु का इन्कार करता है (लूका 22:54-62)।
जब यीशु को पकड़ लिया गया, तब उस समय वहाँ उपस्थित कुछ लोगों ने पतरस को यीशु का अनुयायी होने का दोष लगाया (लूका 22:54-62)। जैसा कि यीशु के द्वारा पहले से ही भविष्यद्वाणी कर दी गई थी, पतरस ने यीशु को जानने का तीन बार इन्कार किया। पतरस यीशु का सबसे प्रिय और भरोसेयोग्य शिष्य था, जिसने अपनी आँखों से यीशु के असँख्य आश्चर्यकर्मों को देखा था, यहाँ तक कि वह यीशु के साथ पानी पर भी चला था (मत्ती 14:29-31)। इतना होने पर भी, पतरस ने भी स्वयं के पकड़े जाने के डर के कारण यीशु का इन्कार करने के द्वारा मानवीय कमजोरी को प्रदर्शित किया। पूरे संसार में मसीही विश्‍वासी अभी भी सताव और उत्पीड़न को समाज में अविश्‍वासियों के द्वारा सामना करते हैं, यह सताव मौखिक दुर्व्यवहार से मारने पीटने और मृत्यु तक होता है। यदि लोग यीशु के साथ उसके सम्बन्ध का पता लगा लेते तो रोमी उसके साथ क्या करते के डर और यीशु को इन्कार के कारण हो सकता है कि लोग पतरस का न्याय स्वयं-की-धार्मिकता पर आधारित हो कर करें, परन्तु कितने बाइबल-में-विश्‍वास करने वाले मसीही विश्‍वासी ऐसा कह सकते हैं कि वे सार्वजनिक और व्यक्तिगत् रूप से होने वाले पक्षपात का सामना होने पर अपने विश्‍वास के प्रति कभी भी मौन नहीं रहे हैं? इस तरह का मौन मानवता की कमजोरी को प्रदर्शित करता है। पतरस का विश्‍वास सिद्धरहित विश्‍वास था, मूल रूप से इसलिए क्योंकि उस समय उसके भीतर पवित्र आत्मा का वास नहीं था। पिन्तेकुस्त के दिन पवित्र आत्मा के उतरने के पश्चात् से वह विश्‍वासियों के मनों के भीतर वास कर रहा है (प्रेरितों के काम 2), पतरस विश्‍वास का एक साहसी सिंह था, वह फिर कभी भी अपने प्रभु के लिए प्रचार करने के लिए नहीं डरा।

क्रूस के मार्ग का 5वां विश्राम स्थल : यीशु की जाँच पेन्तियुस पीलातुस के द्वारा की जाती है (लूका 23:13-25)।
आज के वैधानिक मापदण्डों के अनुसार, यह सम्भव नहीं है कि यीशु को किसी भी न्यायालय में दोषी ठहराया जा सकता है, विशेषकर क्योंकि उसके विरूद्ध कोई वास्तविक साक्ष्य नहीं मिलता है। पेन्तियुस पिलातुस ने यीशु के किसी भी कार्य में कोई दोष नहीं पाया और इसलिए वह उसे छोड़ देना चाहता था (लूका 23:13-24), परन्तु सेन्हेद्रीन ने पिलातुस से उसके क्रूसीकरण की मांग की। सेन्हेद्रीन, जो मूसा की कठोर व्यवस्था और परम्परा के अनुसार शासन करती थी, ने यीशु को यहूदियों के ऊपर शासन करने में अधिकार के प्रति यीशु को एक मुख्य खतरे के रूप में माना था। यीशु ने लोगों को शिक्षा दी थी कि उद्धार परमेश्‍वर के अनुग्रह से मिलता है और सेन्हेद्रीन के द्वारा निर्धारित किए गए कई व्यवस्थाओं का पालन करने से नहीं मिलता है, और इस तरह की शिक्षा ने धार्मिक अगुवों के अधिकार को कम मूल्यांकित किया था, परन्तु इसने साथ ही उनके व्यवसाय को गम्भीर खतरे में डाल दिया था। यहाँ तक आज भी, स्वयं के प्रयास से नहीं, अपितु परमेश्‍वर के चुनाव और सामर्थ्य के द्वारा उद्धार का सन्देश लोकप्रिय नहीं है। अपने पतित स्वभाव में मनुष्य सदैव स्वयं से ही अपने उद्धार को पाना चाहते हैं, या फिर कम से कम इसके अंश को, ताकि हम कम से कम महिमा के एक अंश का दावा कर सकें। परन्तु उद्धार परमेश्‍वर का है, जो अपनी महिमा को किसी और के साथ साझा नहीं करता है (यशायाह 42:8)।

क्रूस के मार्ग का 6ला विश्राम स्थल : यीशु को कोड़ों से मारा जाता और काँटों का मुकुट पहनाया जाता है (लूका 23:63-65)।
इस प्रंसग में उद्धृत चंगाई आत्मिक चंगाई या पाप से प्राप्त होने वाली चंगाई है। पापों की क्षमा और परमेश्‍वर की कृपा में पुनर्स्थापना अर्थात् बहाली, चंगाई के कार्य के रूप में निरन्तर प्रस्तुत होती है। मरियम के द्वारा यीशु को जन्म दिए जाने से पाँच सौ वर्षों पहले, यशायाह ने भविष्यद्वाणी की थी कि यीशु को हमारे अपराधों के लिए घायल किया जाएगा (यशायाह 53:3-6) और उसे हमारे ही अधर्मों के कारण कुचला जाएगा और उसके कोड़े खाने से हम लोग चंगे हो जाएँगे।

क्रूस के मार्ग का 7वां विश्राम स्थल : यीशु अपने क्रूस को उठा लेता है (मरकुस 15:20)।
जब यीशु ने अपने ऊपर क्रूस को उठाया, तब वह एक लकड़ी से कहीं ज्यादा को उठा कर चल रहा था। उस दिन बहुत से तमाशा देखने वालों से अज्ञात्, यीशु मानवजाति के उस दण्ड को उठाया, जो उनके पापों का परिणाम था, जिसके कारण वह मनुष्य के स्थान पर दु:ख को प्राप्त करने वाला था। यीशु हमें मत्ती 16:24 में उपदेश देते हैं, "यदि कोई मेरे पीछे आना चाहे, तो अपने आप का इन्कार करे और अपना क्रूस उठाए और मेरे पीछे हो ले।" वह साथ ही प्रगट करता है कि यह कोई एक विकल्प नहीं है : "....और जो अपना क्रूस लेकर मेरे पीछे न चले वह मेरे योग्य नहीं" (मत्ती 10:38)। अपने स्वयं के क्रूस को उठाना, जो कि मृत्यु का एक साधन है, का अर्थ पूरी तरह से नई सृष्टि के रूप में मसीह की सेवा और आज्ञाकारिता में जीवन यापन करने के लिए स्वयं के प्रति मरना है (2 कुरिन्थियों 5:17)। इसका अर्थ स्वयं की इच्छा, स्वयं के लगाव, स्वयं की महत्वाकांक्षा और स्वयं की इच्छाओं को परमेश्‍वर को समर्पित करना है। हमें स्वयं के लिए प्रसन्नता की खोज सर्वोच्च उद्देश्य के रूप में नहीं करनी, अपितु सब कुछ को त्यागने और साथ ही स्वयं के जीवन को यदि आवश्यकता पड़े तो दे देने की इच्छा होनी चाहिए।

क्रूस के मार्ग का 8वां विश्राम स्थल : कुरेनी शमौन यीशु को क्रूस उठाने में सहायता देता है (लूका 23:26)।
कुरेनी शमौन को परिस्थितियों का शिकार माना जा सकता है। उसके यरूशलेम में आने की सम्भावना फसह के त्योहार में सम्मिलित होने की थी और कदाचित् वह थोड़ी सी कार्यवाही को जानता था। हमें कुरेनी शमौन के बारे में बहुत कम पता है क्योंकि उस क्रूस को उठाने में यीशु को सहायता देने के पश्चात् जिस पर यीशु को कीलों से जड़ा था, उसके बारे में बाइबल में अधिक उल्लेख नहीं मिलता है (लूका 23:26)। रोमी सैनिकों के द्वारा सहायता देने का आदेश दिए जाने के पश्चात्, शमौन विरोध न करना, उस समय की परिस्थितियों के आलोक में स्वयं के जीवन के प्रति डर के कारण की अधिक सम्भावना से भरा हुआ है। यीशु के विपरीत, जिसने अपने क्रूस को स्वेच्छा से उठाया, कुरेनी शमौन को इसे उठा कर ले चलने के लिए जबरदस्ती या "मजबूर" किया गया था। मसीही विश्‍वासी होने के नाते, हमें यीशु के साथ उसके दु:खों में स्वेच्छा से भाग लेना चाहिए, जैसे पौलुस हमें उपदेश देता है, "इसलिये हमारे प्रभु की गवाही से, और मुझ से जो उसका कैदी हूँ, लज्जित न हो, पर उस परमेश्‍वर की सामर्थ्य के अनुसार सुसमाचार के लिए मेरे साथ दु:ख उठा" (2 तीमुथियुस 1:8)।

क्रूस के मार्ग का 9वां विश्राम स्थल : यीशु यरूशलेम की स्त्रियों से मुलाकात करता है (लूका 23:27-31)।
जब यीशु का सामना क्रूस के मार्ग पर उसके कुछ शिष्यों और विलाप करती हुई स्त्रियों से होता है, तब वह उन्हें सावधान करता है कि उन्हें उसके लिए नहीं रोना चाहिए, अपितु उन्हें अपने स्वयं के लिए और अपने बच्चों के लिए, पूरे यरूशलेम में बढ़ती हुई बुराई को ध्यान में रखते हुए रोना चाहिए (लूका 23:27-31)। यहाँ तक कि अत्यधिक पीड़ा और व्यक्तिगत् अपमान से दु:ख उठाते हुए भी, यीशु स्वयं की चिन्ता की अपेक्षा दूसरों के जीवनों और उन लोगों के प्राणों की चिन्ता करता है, जो अपने जीवन में अपने पापों के कारण अनन्तकालीन दण्ड के खतरे का सामना करने पर थे। यही चेतावनी आज के मसीही विश्‍वासियों के लिए भी है कि हमें परमेश्‍वर के प्रति अपनी भक्ति और आज्ञाकारिता में इस संसार की चिन्ताओं को आने देने के प्रति सतर्क रहना चाहिए। यीशु ने कहा है, "मेरा राज्य इस संसार का नहीं है" (यूहन्ना 18:36), और स्वर्ग के नागरिकों को अपने ध्यान और मन को वहाँ पर केन्द्रित करना चाहिए।

क्रूस के मार्ग का 10वां विश्राम स्थल : यीशु को क्रूसित कर दिया गया (लूका 23:33-47)।
दो हजार वर्षों पहले, उस क्षण के घिनौने कार्य की कल्पना करना ही अत्यन्त कठिन है, क्योंकि तब जो यीशु के अति घनिष्ठता में रहने वाले थे, स्वयं को असहाय पा रहे थे जब कीलों को उसके हाथों और पैरों में ठोकते हुए लकड़ी में जड़ा जा रहा था, जो उसके मानवीय स्वरूप से उसके अन्तिम श्‍वास को लेने वाले थे (लूका 23:44-46)। उसके प्रिय और उसके शिष्य उस समय जो कुछ घटित हो रहा था, उसके अर्थ को पूरी तरह समझने के लिए योग्य नहीं थे। वे अभी भी इस बात को समझने के लिए सक्षम नहीं थे, कि मनुष्य का यह बुरा कार्य ईश्‍वरीय प्रयोजन का परिणाम और उन सभों के लिए उद्धार की योजना थी जो मसीह में विश्‍वास करेंगे। क्योंकि आज, "हम लोग ऐसे बड़े उद्धार से निश्चिन्त रहकर कैसे बच सकते हैं?" (इब्रानियों 2:3)। "किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं; क्योंकि स्वर्ग के नीच मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिसके द्वारा हम उद्धार पा सकें" (प्रेरितों के काम 4:12)।

क्रूस के मार्ग का 11वां विश्राम स्थल : यीशु विश्‍वास करने वाले चोर को अपने राज्य में आने की प्रतिज्ञा देता है (लूका 23:43)।
यह सम्भव है कि जिस चोर को यीशु के साथ लटकाया गया था, वह जीवन की अवधारणा को आत्मसात् करने के लिए सक्षम हुआ कि जीवन यीशु के लिए अन्त नहीं होने वाला था, परन्तु वह भौतिक संसार से शाश्‍वतकालीन प्रतिज्ञा की ओर स्थानान्तरित हो रहा था, जहाँ से वह इसे मनुष्य को देने के लिए आया था। चोर यीशु मसीह में विश्‍वास के द्वारा अनुग्रह से स्वर्गलोक में प्रवेश करने वाला पहला व्यक्ति बन गया (इफिसियों 2:8-9)। यीशु ने चोर से कहा कि वह उसके साथ उसी दिन स्वर्गलोक में होगा क्योंकि उसने परमेश्‍वर के पुत्र को स्वीकार किया और उस पर विश्‍वास किया था। स्पष्ट रूप से, यह एक ऐसा उदाहरण है, कि एक व्यक्ति विश्‍वास के द्वारा अनुग्रह से ही बचाया जाता है, न कि कामों के द्वारा, जैसा कि लोग जिन्होंने यीशु को सताया और दण्डित किया था, ने लोगों को विश्‍वास दिलाया था।

क्रूस के मार्ग का 12वां विश्राम स्थल : क्रूस के ऊपर से यीशु अपनी माता और शिष्यों से बात करता है (लूका 23:48-49)।
यीशु, मरते क्षणों में भी स्वयं की आवश्यकताओं की अपेक्षा दूसरों की आवश्यकताओं की चिन्ता कर रहा था जैसा कि उसने निस्वार्थ हो अपनी माता को अपने प्रिय शिष्य यूहन्ना के हाथों में देखभाल के लिए सौंप दिया (यूहन्ना 19:27)। उसका पूरा जीवन, जिसमें उसकी मृत्यु भी सम्मिलित है, उदाहरण के द्वारा शिक्षा देती है, कि हमें अपनी आवश्यकताओं की अपेक्षा दूसरों की आवश्यकताओं को अपने से आगे रखते हुए, सब कुछ को परमेश्‍वर की सिद्ध इच्छा के हाथों में दे देना है। उसके वचन में बने रहने की इच्छा और प्रतिकूल परिस्थिति में दूसरों के लिए विश्‍वासयोग्यता से स्वंय के बलिदान से भरे हुए कार्यों के साथ प्रदर्शन का किया जाना, सच्चे मसीही जीवन के गुणों को परिभाषित करते हैं।

क्रूस के मार्ग का 13वां विश्राम स्थल : यीशु क्रूस पर मर जाता है (लूका 23:44-46)।
यीशु की मृत्यु के समय, मन्दिर का परदा, जिसने मनुष्य को महा पवित्र स्थान से अलग कर दिया, ऊपर से नीचे की ओर फट गया। यह सभी यहूदियों के लिए एक डरावनी बात थी, जिन्होंने इस घटना को घटित होते हुए देखा था, जिन्होंने इस बात का बोध प्राप्त नहीं हुआ कि इसने पुराने नियम की वाचा का अन्त कर दिया है और नई वाचा का आरम्भ हो गया है। अब और अधिक मनुष्य को उसके पाप के कारण परमेश्‍वर से पृथकता होने का दु:ख नहीं उठाना पड़ेगा, परन्तु हम अब अपने पापों की क्षमा के लिए बड़े हियाव के साथ अनुग्रह के सिंहासन के निकट पहुँचने के लिए सक्षम हो गए हैं। यीशु का जीवन और बलिदानात्मक मृत्यु ने पाप की बाधा को हटाते हुए, अनुग्रह के द्वारा उद्धार की प्राप्ति को मनुष्य के लिए सम्भव बना दिया है।

क्रूस के मार्ग का 14वां विश्राम स्थल : यीशु को कब्र में लिटा दिया गया (लूका 23:50-54)।
यीशु की मृत्यु के पश्चात् और उसे क्रूस पर से उतार लिए जाने के पश्चात्, उसे एक कब्र में लिटा दिया गया था, जिसका प्रबन्ध यूसुफ नाम के एक व्यक्ति के द्वारा किया गया था, जो अरिमतिया नामक एक यहूदी शहर का वासी था (लूका 23:50-54)। यूसुफ सेन्हेद्रीन का एक सदस्य भी था, परन्तु वह यीशु की जाँच और उसके क्रूसीकरण के विरूद्ध था। यूसुफ गुप्त में विश्‍वास करता था कि यीशु ही पवित्र शास्त्र के अनुसार मसीह था, परन्तु अपने विश्‍वास को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करने के परिणामों से डरता था (यूहन्ना 19:38)। यीशु की मृत्यु उपरान्त, वह गुप्त में पिलातुस के पास गया और उससे यीशु के शरीर की मांग की ताकि वह उसे सही रीति से गाड़ सके।

यीशु का दिया हुआ महान् बलिदान न केवल मनुष्य के पापों के लिए प्रायश्चित बन गया, अपितु साथ ही यह ऐसी विजय बन गया जिसने मृत्यु को हरा दिया और उसके ऊपर विजय को प्राप्त किया, जो अन्यथा सभी मनुष्यों के लिए अनिवार्य गंतव्य होता, जो पाप के श्राप के अधीन उत्पन्न हुए हैं। पाप अपनी स्वयं के अनिवार्य दण्ड को लाता है, और यह दण्ड मृत्यु है। हमारा सृष्टिकर्ता न्यायी और पक्षपात रहित है और इसलिए उसने यह मांग की कि पाप के दण्ड को अवश्य दिया जाना चाहिए। क्योंकि परमेश्‍वर न्यायी होने के साथ साथ प्रेमी और दयालु भी है, इसलिए उसने अपने एकलौते पुत्र को हमारे पापों के दण्ड के मूल्य को चुकाने के लिए भेज दिया, यह जानते हुए कि अन्यथा हम सभी शाश्‍वतकाल के लिए नरक के दण्ड के भागी थे (यूहन्ना 3:16)। परमेश्‍वर का प्रेम और दया यीशु के शब्दों में बड़ी महानता के साथ प्रदर्शित हुई जो क्रूस के ऊपर लटका हुआ तब मर रहा था जब उसने परमेश्‍वर से प्रार्थना की वह लोगों को क्षमा कर दे क्योंकि वे नहीं जानते कि वे अपनी अज्ञानता में क्या कर रहे हैं (लूका 23:34)। इसे सारांशित करना आसान है कि परमेश्‍वर के वचन और उसकी व्यवस्था के प्रति मनुष्य के द्वारा समर्पित और आज्ञाकारी होने की अनिच्छा इसलिए है, क्योंकि उसमें ज्ञान और बुद्धि की कमी है। इस संकलन की विडम्बना यह है कि जिस दुर्घटना को इसने क्रूस पर यीशु के लिए उत्पन्न किया वही आत्मिक दुर्घटना उनके लिए बन जाती है, जो उसी अनभिज्ञता को दूर करने में असमर्थ है, जो आज भी अधिकांश मानवता पर बहुलता के साथ पाई जाती है। पापी मनुष्य जो उद्धार के उपहार को स्वीकार करने से इन्कार कर देता है, जिसे यीशु ने अपने बलिदान के द्वारा सम्भव किया, निश्चित रूप से विद्रोही अज्ञानता और पाप के वश में है, जो मनुष्य को परमेश्‍वर के ज्ञान से पृथक कर देता है।

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क्रूस के मार्ग पर आने वाले विश्राम स्थल क्या हैं, और हम उनसे क्या सीख सकते हैं?"