इतने अधिक धर्म क्यों हैं? क्या सभी धर्म परमेश्‍वर की ओर मार्गदर्शन करते हैं?



प्रश्न: इतने अधिक धर्म क्यों हैं? क्या सभी धर्म परमेश्‍वर की ओर मार्गदर्शन करते हैं?

उत्तर:
इतने अधिक धर्मों का विद्यमान होना और यह दावा करना कि सभी धर्म परमेश्‍वर की ओर मार्गदर्शन कर रहे हैं, ऐसे कई लोगों को बिना किसी उलझन के साथ प्रश्‍न में डाल देता है, जो बहुत अधिक गम्भीरता के साथ परमेश्‍वर के सत्य के बारे में खोज कर रहे हैं, कि वे इस विषय के पूर्ण सत्य तक पहुँचने के अन्त में कुछ निराशा को ही पाएँगे। या फिर वे सार्वभौमिक उद्धारवादी दावे अपनाते हुए समाप्त करते हैं, कि सभी धर्म परमेश्‍वर की ओर जा रहे हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं है, कि सन्देहवादी, भी कई धर्मों के अस्तित्व होने लिए इस प्रमाण की ओर संकेत देते हैं, कि या तो आप परमेश्‍वर को नहीं जान सकते हैं या फिर परमेश्‍वर अस्तित्व में ही नहीं है।

रोमियों 1:19-21 उस बाइबल आधारित स्पष्टीकरण को उद्धृत करता है, क्यों इतने अधिक धर्म अस्तित्व में हैं। परमेश्‍वर का सत्य प्रत्येक मनुष्य के द्वारा सत्य देखा और जाना जा सकता है, क्योंकि परमेश्‍वर ने इसे ऐसे ही रचा है। परमेश्‍वर के सत्य को स्वीकार करने और उसके अधीन हो जाने की अपेक्षा, बहुत से मनुष्यों ने इसे अस्वीकार कर दिया और परमेश्‍वर को समझने के लिए अपने ही समझ का सहारा लेने लगे। परन्तु यह परमेश्‍वर के सम्बन्ध में आत्मजागृति नहीं है, अपितु सोच की व्यर्थता है। यहाँ पर हम "कई धर्मों" के अस्तित्व में होने के आधार को पाते हैं।

बहुत से धर्म ऐसे परमेश्‍वर में विश्‍वास नहीं करना चाहते, जो धार्मिकता और नैतिकता की मांग करता है, इसलिए उन्होंने अपने स्वयं के ईश्‍वर को आविष्कृत कर लिया है, जो इस तरह की शर्तों की मांग नहीं करता है। लोग ऐसे परमेश्‍वर में विश्‍वास नहीं करना चाहते हैं, जो यह घोषणा करता है, कि स्वर्ग को मनुष्य स्वयं के तरीकों से कमा नहीं सकता है। इसलिए उन्होंने स्वयं के लिए ऐसे ईश्‍वर को आविष्कृत कर लिया है, जो लोगों को स्वर्ग में स्वीकृत करता है, चाहे उन्होंने कम से कम अपने सर्वोत्तम क्षमता के अनुसार निश्चित कदमों को पूरा किया है या नहीं, निश्चित नियमों का पालन किया है या नहीं, और/या निश्चित व्यवस्था की आज्ञा पालन की है या नहीं। बहुत से लोग ऐसे परमेश्‍वर के साथ सम्बन्ध में नहीं आना चाहते हैं, जो सर्वोच्च और सर्वसामर्थी है। इसलिए, वे परमेश्‍वर को एक व्यक्तिगत् और सर्वोच्च शासक की अपेक्षा एक रहस्यमयी शक्ति होने के रूप में कल्पना करते हैं।

परमेश्‍वर के अस्तित्व के विरूद्ध कई धर्मों का विद्यमान होना किसी तरह का कोई तर्क नहीं है, या फिर ऐसा तर्क नहीं है, कि परमेश्‍वर के बारे में सच्चाई स्पष्ट नहीं है। इसकी अपेक्षा, कई धर्मों का विद्यमान होना मनुष्य के द्वारा एक सच्चे परमेश्‍वर को अस्वीकार कर देने का प्रदर्शन है। मनुष्य ने परमेश्‍वर को देवताओं में परिवर्तित कर दिया है, जो उनकी मन की पसन्द के अनुसार हैं। यह एक खतरनाक उद्यम है। अपने स्वयं के स्वरूप में ईश्‍वर की रचना करने की इच्छा हमारे भीतर वास कर रहे पाप की ओर से आती है — यह एक ऐसा स्वभाव है, जो अन्त में "विनाश की कटनी" को काटेगा (गलातियों 6:7-8)।

क्या सभी धर्म परमेश्‍वर की ओर ले चलते हैं? नहीं, बिल्कुल भी नहीं। सभी लोगों को — चाहे वे धार्मिक हों या न हों — को एक दिन परमेश्‍वर के सामने खड़ा होना पड़ेगा (इब्रानियों 9:27), और न ही धार्मिक मान्यता कुछ ऐसी बात है, जो आपकी शाश्‍वतकालीन गंतव्य को निर्धारित करती है। केवल यीशु मसीह में विश्‍वास ही आपको बचा सकता है। "जिसके पास पुत्र है, उसके पास जीवन है; और जिसके पास परमेश्‍वर का पुत्र नहीं, उसके पास जीवन भी नहीं है" (1 यूहन्ना 5:12)। इसे समझना बहुत ही आसान है। केवल मसीही विश्‍वास ही — अर्थात् यीशु मसीह की मृत्यु और पुनरुत्थान में विश्‍वास ही — परमेश्‍वर की क्षमा और शाश्‍वतकाल के जीवन के लिए मार्गदर्शन दे सकता है। बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता है (यूहन्ना 14:6)। आपके द्वारा किया जाने वाला विश्‍वास भिन्नता लाता है। यीशु मसीह के सत्य को अपनाने के बारे में निर्णय लेना महत्वपूर्ण है। शाश्‍वतकाल एक बहुत लम्बे समय तक डर उत्पन्न करती हुई भय योग्य बात रही है।



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