आज धर्म के प्रति सन्देहवाद इतनी अधिक प्रचलित क्यों है?


प्रश्न: आज धर्म के प्रति सन्देहवाद इतनी अधिक प्रचलित क्यों है?

उत्तर:
धार्मिक सन्देहवाद को पूरी तरह नास्तिकतावाद या अधर्म के साथ भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए, यद्यपि नास्तिकों को एक प्रकार का धार्मिक सन्देही माना जा सकता है। धार्मिक सन्देही केवल ऐसा व्यक्ति ही हो सकता है, जिसके पास गम्भीर सन्देह हो या जो धर्म के प्रति समर्पित न हो। वास्तव में, धार्मिक सन्देहवाद नया नहीं है। प्रसिद्ध सन्देहवादी नतनएल (यूहन्ना 1: 45-47) और थोमा (यूहन्ना 20:25) यीशु के शिष्य थे, जिनके अपने सन्देह थे। फिर भी वर्तमान में ऐसा प्रतीत होता है कि धार्मिक सन्देहवाद और अधिक प्रचलित होता जा है।

धार्मिक सन्देहवाद के उदय में कई बातों ने योगदान दिया है। व्यापक रूप से संस्कृति एक कारण है। एक शताब्दी से अधिक, पश्‍चिमी संस्कृति का स्वभाव "मसीही" रहा; अर्थात्, यहूदी-मसीही वैश्‍विक दृष्टिकोण को सम्मान दिया जाता और शिक्षा दी जाती थी, चाहे इसके अनुसार सदैव जीवन यापन नहीं किया जाता था। 1700 के दशक के आरम्भ में ज्ञानोदय (जिसे तर्क का युग भी कहा जाता है) के समय में परिवर्तन होना आरम्भ हुआ और औद्योगिक युग, एक ऐसा समय जब मनुष्य के पास किसी तरह की कोई बाधा नहीं थी, के समय तक चलता रहा। सांस्कृतिक परिवर्तन आधुनिक और अब उत्तरआधुनिक युग में, कई भिन्न संस्कृतियों और सोच के तरीकों के प्रवाह के कारण, शीघ्रता से आगे की ओर बढ़ने लगी।

बर्ना समूह के अध्यक्ष डेविड किनामान ने अपनी पुस्तक गैरमसीहियत: मसीही विश्‍वास के बारे में वास्तव में नई पीढ़ी क्या सोचती है... और क्या महत्वपूर्ण है, में ऐसे लिखते हैं कि "कई युवा अमेरिकियों का कहना है कि जीवन जटिल प्रतीत होता है — यह जानना कठिन है कि सूचना, वैश्‍विक दृष्टिकोण और विकल्पों के ऊपर होने वाले आक्रमणों के साथ कैसे रहना है, जिनके साथ प्रत्येक दिन सामना करना पड़ता है। मसीही विश्‍वास के बारे में युवा वयस्कों की विशेष आलोचनाओं में से एक यह है कि यह एक जटिल संस्कृति में जीवन के गहरे, विचारशील या चुनौतीपूर्ण उत्तरों को प्रस्तुत नहीं करता है।" दूसरे शब्दों में, वे सांस्कृतिक विषयों के बारे में बाइबल के उत्तरों को बहुत ही अधिक साधारण रूप में देखते हैं। बाइबल के "पुरानी-विचारधारा" वाले आचार-विचार के ऊपर ध्यान देने के लिए समाज बहुत ही अधिक "जटिल" है। वे मूलभूत उत्तरों को अस्वीकार कर दिया जैसे कि "बाइबल ऐसा कहती है," और वे देखने में असफल हो जाते हैं कि – कदाचित् उन्हें कभी भी नहीं सिखाया गया है कि — बाइबल के आदेशों के मूल में गहरे तर्क पाए जाते हैं।

आज के धार्मिक सन्देहवाद के लिए एक और कारण का सरोकार धर्म के अभ्याकर्ताओं के साथ है। दु:ख की बात है कि कुछ धार्मिक लोग अनैतिक, बेईमान, या यहाँ तक कि स्वार्थी हैं। कुछ सन्देहवादियों को अतीत में धर्म के साथ बुरे अनुभव प्राप्त हुए हैं। बर्ना समूह के अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका में सहस्त्राब्दिवादियों (1985 और 2002 के मध्य जन्म लेने वाले लोग) के मध्य धार्मिक सन्देह के बढ़ने का सबसे बड़ा कारण "मसीहियों" के साथ व्यक्तिगत् वार्तालाप के ऊपर निर्भर करता है, जो वास्तव में गैर-मसीही थे। धार्मिक पाखण्ड ने कइयों को विश्‍वास से भ्रमित और गैर-संलग्न कर दिया जो किसी समय पश्‍चिमी संसार को दृढ़ता प्रदान कर रहे थे।

विश्‍वासियों के मध्य में मसीह जैसे दृष्टिकोण और कार्यों की कोई कमी का होना व्यक्तिगत् परिवर्तन की कमी को इंगित करता है। हमें मसीह के जैसे कहा जाता है। परन्तु कई मसीही अपने मनों में स्व-धार्मिकता की तुलना में संस्कृति में पाई जाने वाली अधार्मिकता के ऊपर अधिक ध्यान केन्द्रित करते हैं। वे गलातियों 2:20 की बात को खो देते हैं: "मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ, अब मैं जीवित न रहा, पर मसीह मुझ में जीवित है...।" क्रूसित जीवन पाखण्ड का सामना करता है।

आज धार्मिक सन्देहवाद के प्रति एक अन्य योगदान देने वाला कारक अनुभववाद पर अधिक निर्भरता का होना है। जो लोग सब कुछ को सन्देह से परे "प्रमाणित" होते हुए देखना चाहते हैं, वे स्वाभाविक रूप से आत्मिक सत्यों के ऊपर सन्देह करेंगे, जिनकी प्रयोगशाला में मात्रा निर्धारित करना, चीर-फाड़ या जाँच नहीं की जा सकती है। विडम्बना यह है कि, कई धार्मिक सन्देहवादी सुसमाचार के सत्य को प्राकृतिक विकास के सिद्धान्त के रूप में स्वीकार करते हैं, जो कि कभी भी प्रमाणित नहीं हुए हैं, जबकि सुसमाचार में यीशु के दिए हुए आश्‍चर्यकर्मों के प्रत्यक्षदर्शी विवरणों को इन्कार कर देते हैं।

धार्मिक सन्देहवाद सभी धार्मिक मान्यताओं पर उचित विचार देने की इच्छा के कारण भी हो सकता है — और विरोधाभासी मान्यताओं से उलझा हुआ होने के कारण विभिन्न धार्मिक पद्धतियों का पालन किया जाता है। एक समूह यीशु के बारे में एक बात कहता है, और दूसरा समूह इसके विपरीत कहता है। अन्य समूह पूरी तरह से एक मंत्रमुग्ध कर देने वाला गुरु या एक दिमागी दर्शनशास्त्र को देने वाला या एक असाधारण आकार की चट्टान के पक्ष में यीशु के प्रति अपने विचारों को साझा करता है। किसी को भी थोड़ा सा सन्देही बनाने के लिए यह पर्याप्त है। इसके साथ भ्रम को आधुनिकतावादी सापेक्षता की व्यापक स्वीकृति में जोड़ दें, और आप पाएंगे कि यह कोई आश्‍चर्य की बात नहीं है कि आज इतने सारे धार्मिक सन्देह क्यों पाए जाते हैं।

बौद्धिक रूप से आधारित धार्मिक सन्देहवाद, स्वयं में, बुरा नहीं है। वास्तव में, स्वस्थ सन्देहवाद एक अच्छी बात है — हमें झूठी शिक्षा से सावधान रहना चाहिए, और हमें "... हर एक आत्मा की प्रतीति करो, वरन् आत्माओं को परखो कि वे परमेश्‍वर की ओर से हैं कि नहीं" (1 यूहन्ना 4:1) के लिए कहा गया है। एक स्वस्थ, स्थायी विश्‍वास में प्रश्‍न पूछने और उत्तर प्राप्त करने की अनुमति सम्मिलित है। परमेश्‍वर हमारी जाँच का सामना कर सकता है, और सन्देह को अविश्‍वास के तुल्य नहीं माना जाता है। परमेश्‍वर हमें उसके साथ "वादविवाद करने... के लिए बुलाता है" (यशायाह 1:18)।

हमें "बाहर वालों के साथ [बुद्धिमान] से व्यवहार करने" की आवश्यकता है (कुलुस्सियों 4:5; 1 थिस्सलुनीकियों 4:12 और 1 तीमुथियुस 3:7 को भी देखें), और हम सच्चाई की ओर मार्गदर्शन देने के लिए वार्तालाव में सन्देहियों को सम्मिलित कर सकते हैं। प्रेरित पतरस कहता है कि, "... जो कोई तुम से तुम्हारी आशा के विषय में कुछ पूछे, उसे उत्तर देने के लिये सर्वदा तैयार रहो, पर नम्रता और भय के साथ" (1 पतरस 3:15)। वह तुरन्त निर्देश के साथ दिए गए आदेश का पालन करता है कि कैसे प्रश्‍नकर्ता को वार्तालाप में सम्मिलित करना है: "और विवेक भी शुद्ध रखो, इसलिये कि जिन बातों के विषय में तुम्हारी बदनामी होती है उनके विषय में वे, जो मसीह में तुम्हारे अच्छे चालचलन का अपमान करते हैं, लज्जित हों" (1 पतरस 3:15-16)। हमारे उत्तरआधुनिक युग में सन्देहवादियों से निपटने के लिए विनम्रता और सम्मान महत्वपूर्ण बातें हैं।

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