बाइबल एक मसीही विश्‍वासी के जीवन पर्यन्त अकेले रहने के बारे में क्या कहती है?



प्रश्न: बाइबल एक मसीही विश्‍वासी के जीवन पर्यन्त अकेले रहने के बारे में क्या कहती है?

उत्तर:
एक मसीही विश्‍वासी का अकेले रहने का प्रश्न और बाइबल उन विश्‍वासियों के बारे में जो विवाह कभी नहीं करते को अक्सर गलत समझ लिया गया है। 1 कुरिन्थियों 7:7-8 में पौलुस ऐसे कहता है : “मैं यह चाहता हूँ कि जैसा मैं हूँ, वैसे ही सब मनुष्य हों; परन्तु हर एक को परमेश्‍वर की ओर से विशेष विशेष वरदान मिले हैं; किसी को किसी प्रकार का, और किसी को किसी और प्रकार का। परन्तु मैं अविवाहितों और विधवाओं के विषय में कहता हूँ कि उनके लिये ऐसा ही रहना अच्छा है, जैसा मैं हूँ।" ध्यान दें कि वह यह कहता है, कि कुछ लोगों के पास अकेले रहने का वरदान होता है और कुछ के पास विवाह करने का वरदान होता है। यद्यपि ऐसा आभासित होता है, कि लगभग प्रत्येक व्यक्ति विवाह करता है, यह आवश्यक नहीं है, कि परमेश्‍वर की ऐसी इच्छा सभों के लिए हो। उदाहरण के लिए, पौलुस को किसी भी तरह अतिरिक्त समस्या और तनाव के बारे में चिन्ता करने की कोई आवश्यकता नहीं थी, जो विवाह और/या परिवार के द्वारा आता है। उनसे अपने पूरे जीवन को परमेश्‍वर के वचन के फैलाने में समर्पित कर दिया। यदि वह विवाहित होता तो इतना अधिक उपयोगी सन्देशवाहक कभी नहीं होता।

दूसरी ओर, कुछ लोग एक समूह में अर्थात् एक दम्पत्ति या एक परिवार के रूप में अच्छी रीति से कार्य करते हुए परमेश्‍वर की सेवा करते हैं। दोनों ही तरह के लोग बराबरी के साथ महत्वपूर्ण हैं। अकेले रहना, यहाँ तक की जीवन पर्यन्त अकेले रहना किसी भी तरह से कोई पाप नहीं है। जीवन में सबसे महत्वपूर्ण बात एक साथी का होना या बच्चों का होना नहीं अपितु परमेश्‍वर की सेवा करना है। हमें स्वयं को परमेश्‍वर के वचन का पठन् करते हुए बाइबल और प्रार्थना के द्वारा शिक्षित करना चाहिए। यदि हम परमेश्‍वर से प्रार्थना करते हैं, कि वह स्वयं को हम पर प्रकाशित करे, तब वह हमें प्रत्युत्तर देगा (मत्ती 7:7), और यदि हम उससे उसके भले कार्यों को पूर्ण करने के लिए उपयोग करने के लिए प्रार्थना करें, तब वह ऐसा ही करेगा। "इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारे मन के नए हो जाने से तुम्हारा चाल चलन भी बदलता जाए जिससे तुम परमेश्‍वर की - भली, और भावती और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो।" (रोमियों 12:2)।

अकेले रहने को कभी भी एक शाप के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए या इस संकेत के रूप में कि किसी अकेले स्त्री या पुरूष के साथ कहीं "कुछ गड़बड़" है। जबकि अधिकांश लोग विवाह करते हैं, और जबकि बाइबल भी अधिकांश लोगों को विवाह करने के लिए परमेश्‍वर की इच्छा को प्रगट करने का संकेत देती है, एक अकेला मसीही विश्‍वासी किसी भी अर्थ में "द्वितीय श्रेणी" का नहीं है। जैसा कि 1 कुरिन्थियों 7 संकेत देता है, कि अकेले रहना, यदि कुछ है तो, यह एक उच्च बुलाहट है। जैसा कि जीवन में किसी भी अन्य बात के साथ है, हमें परमेश्‍वर से विवाह के सम्बन्ध में भी बुद्धि (याकूब 1:5) की मांग करनी चाहिए। परमेश्‍वर की योजना का अनुसरण करना, चाहे वह विवाह में हो या फिर अकेले रहने में ही क्यों न हो, ऐसी उत्पादकता और हर्ष का परिणाम देगी जिसे परमेश्‍वर हमारे लिए चाहता है।



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