यदि यीशु ने हमारे पापों का मूल्य चुका दिया है, तब हम क्यों अभी भी हमारे पापों के परिणामों को भुगतते हैं?


प्रश्न: यदि यीशु ने हमारे पापों का मूल्य चुका दिया है, तब हम क्यों अभी भी हमारे पापों के परिणामों को भुगतते हैं?

उत्तर:
पवित्र शास्त्र कहता है, "क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है, परन्तु परमेश्‍वर का वरदान हमारे प्रभु यीशु मसीह में अनन्त जीवन है" (रोमियों 6:23)। मसीह ने हमारे पापों के दण्ड को चुका दिया है। हम सभी तो मृत्यु प्राप्ति के योग्य हैं, जो पाप के लिए अन्तिम दण्ड है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने पापों के दण्ड को चुकाना होगा, यदि वह मसीह के पास नहीं आता है, जिसने हमारे पापों के दण्ड के मूल्य को अपने लहू से चुकाया है। आदम और हव्वा का वाटिका से निष्कासन उनके द्वारा किए हुए पाप के दण्ड का परिणाम था। "परिणाम," की अपेक्षा हमें इसके बारे में "अनुशासन" के रूप में सोचना चाहिए। इब्रानियों का लेखक इसे अनुशासन और उद्देश्य सहित होने के रूप में लिखता है: "और तुम उस उपदेश को, जो तुम को पुत्रों के समान दिया जाता है, भूल गए हो, 'हे मेरे पुत्र, प्रभु की ताड़ना को हल्की बात न जान, और जब वह तुझे घुड़के तो साहस न छोड़। क्योंकि प्रभु जिससे प्रेम करता है, उसकी ताड़ना भी करता है; और जिसे पुत्र बना लेता है, उस को कोड़े भी लगाता है।' तुम दु:ख को ताड़ना समझकर सह लो: परमेश्‍वर तुम्हें पुत्र जानकर तुम्हारे साथ बर्ताव करता है, वह कौन सा पुत्र है, जिस की ताड़ना पिता नहीं करता? यदि वह ताड़ना जिसके भागी सब होते हैं, तुम्हारी नहीं हुई, तो तुम पुत्र नहीं, पर व्यभिचार की सन्तान ठहरे! फिर जब कि हमारे शारीरिक पिता भी हमारी ताड़ना किया करते थे, तो क्या आत्माओं के पिता के और भी आधीन न रहें जिससे जीवित रहें। वे तो अपनी-अपनी समझ के अनुसार थोड़े दिनों के लिये ताड़ना करते थे, पर यह तो हमारे लाभ के लिये करता है, कि हम भी उस की पवित्रता के भागी हो जाएँ। और वर्तमान में हर प्रकार की ताड़ना — आनन्द की नहीं, पर शोक ही की बात दिखाई पड़ती है, तौभी जो उस को सहते सहते पक्के हो गए हैं, पीछे उन्हें चैन के साथ धर्म का प्रतिफल मिलता है" (इब्रानियों 12:5-11)।

परमेश्‍वर हमें सुधारने और/या अनुशासन का उपयोग वहाँ लाने के लिए करता है, जहाँ वह होना चाहता है, कि हमें होना चाहिए। एक अच्छा पिता उस समय क्या करता है, जब वह उसकी सन्तान को सही मार्ग से भटकता हुआ देखता है? वह अनुशासन के द्वारा उसे सही मार्ग के ऊपर वापस लाता है। अपराध की गम्भीरता के अनुसार अनुशासन कई रूपों में आ सकता है। यदि एक बच्चा कभी भी अनुशासित नहीं होता या यदि उसे उसके द्वारा किए हुए गलत कार्यों के लिए किसी परिणाम को कभी नहीं भुगतना पड़ता है, तो वह कभी भी नहीं सीखेगा कि सही क्या है।

इसलिए, परमेश्‍वर अपने प्रेम में होकर उन्हें अनुशासित करता है, जो उसके अपने हैं। यदि आप कभी भी आपके द्वारा किए हुए पापों के परिणाम को नहीं भुगतते हैं, तो आप कैसे जानेंगे कि आप कब सही हैं और कब गलत हैं? भजनकार कहता है, "क्या उन सब अनर्थकारियों को कुछ भी ज्ञान नहीं, जो मेरे लोगों को ऐसे खाते हैं जैसे रोटी और परमेश्‍वर का नाम नहीं लेते हैं" (भजन संहिता 53:4)। भजन संहिता 10:11 को भी देखें, " वह अपने मन में सोचता है, 'ईश्‍वर भूल गया है, वह अपना मुँह छिपाता है; वह कभी नहीं देखेगा!'" यदि परमेश्‍वर हमारे सामने हमारे परिणामों को नहीं लाता है, तो हम कभी भी यह नहीं सीखेंगे कि गलत क्या है और कभी भी अपने मार्गों में परिवर्तन नहीं करेंगे। परमेश्‍वर केवल उसे ही अनुशासित करता है, जो उसके हैं और वह ऐसा हमें नुक्सान पहुँचाने के लिए नहीं या हमें फाड़ डालने के लिए नहीं अपितु हमारे लिए उसके प्रेम में होकर करता है। यह परमेश्‍वर के कहने का तरीका है, "मेरे बच्चे, तू गलत मार्ग पर चल रहा है और अब तेरे लिए समय आ गया है कि तू यहीं से मुड़े और वही करे जो सही है।" जब हम गलत होते हैं, और तब यदि हमारा सुधार नहीं होता है, तो हम निरन्तर गलत ही करते चले जाएँगे।

परमेश्‍वर ने हमारे पापों के दण्ड को चुका दिया है, ताकि हमें दूसरी मृत्यु का सामना न करना पड़े, जो कि नरक है (प्रकाशितवाक्य 20:14)। अपने प्रेम में होकर, वह हमें अनुशासित करता है और वह हमें उसके साथ उस सम्बन्ध में ले आता है, जिसकी वह इच्छा करता है। इसलिए जब आप अगली बार अपने पापों के परिणामों से दु:ख उठा रहे हैं, तो स्मरण रखें कि परमेश्‍वर अपने प्रेम में होकर हमें अनुशासित कर रहा है।

अन्त में, परमेश्‍वर की व्यवस्था की अवज्ञा के कार्यों के परिणामस्वरूप अक्सर अस्थायी परिणामों में निकलेंगे, जिनका परमेश्‍वर के अनुशासन से कोई लेना-देना नहीं होता है। उदाहरण के लिए, एक हत्यारा जो मसीह को ग्रहण करता है और अपने सभी पापों से पश्चाताप करता है, शाश्‍वतकालीन अर्थों में परमेश्‍वर की क्षमा प्राप्त करेगा, और वह स्वर्ग में अनन्त काल के लिए ईश्‍वर के साथ पूर्ण संगति के आनन्द को प्राप्त करेगा। यद्यपि, जिस समाज में वह रहता है, वह अभी भी माँग करेगा कि वह उसके द्वारा किए हुए अपराध के लिए एक अस्थायी अर्थों में दण्ड को चुकाए। हो सकता है कि उसे अपने पूरे जीवन भर कैद में ही व्यतीत करना पड़े या हो सकता है कि उसे उसके अपराध के कारण मृत्युदण्ड दे दिया जाए। परन्तु इन परिस्थितियों में भी, वह परमेश्‍वर के द्वारा अत्यधिक रूप से उपयोग किया जा सकता है, जबकि वह अपने अन्तिम छुटकारे और अनन्त आनन्द की प्रतीक्षा कर रहा था।

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यदि यीशु ने हमारे पापों का मूल्य चुका दिया है, तब हम क्यों अभी भी हमारे पापों के परिणामों को भुगतते हैं?