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प्रश्न

शान्त प्रार्थना — क्या यह बाइबल आधारित है?

उत्तर


हो सकता है कि बाइबल विशेष रूप से चुपचाप अर्थात् शान्त में प्रार्थना करने का उल्लेख न करती हो, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि यह ऊँची आवाज में की जाने वाली प्रार्थना से कम वैध है। परमेश्‍वर हमारे विचारों को उतनी ही आसानी से सुन सकता है जितनी आसानी से वह हमारे शब्दों को सुन सकता है (भजन संहिता 139:23; यिर्मयाह 12:3)। यीशु फरीसियों के बुरे विचारों को जानता था (मत्ती 12:24-26; लूका 11:17)। जो कुछ हम करते, कहते या सोचते हैं, उसमें से कुछ भी परमेश्‍वर से छिपा हुआ नहीं है, जिसे हमारे विचारों को जानने के लिए हमारे शब्दों को सुनने की आवश्यकता नहीं है। उसकी पहुँच उन सभी प्रार्थनाओं तक है जो उसकी ओर निर्देशित की जाती हैं, चाहे वे कहीं जाएँ या न कहीं जाएँ।

बाइबल एकान्त में प्रार्थना करने का उल्लेख करती है (मत्ती 6:6)। ऊँची आवाज में प्रार्थना करना और शान्त प्रार्थना को करने में क्या अन्तर होगा यदि आप स्वयं में ही खोए हुए हैं? कई बार ऐसी कुछ परिस्थितियाँ होती हैं जब शान्त प्रार्थना करना उचित होता है, उदाहरण के लिए, आपके और परमेश्‍वर के मध्य में की जाने वाली प्रार्थना, किसी के लिए प्रार्थना करना जो वहाँ पर उपस्थित है, इत्यादि। शान्त प्रार्थना करने में कुछ भी गलत नहीं है, जब तक हम इसे इसलिए नहीं कर रहे हैं क्योंकि हम अन्यों के द्वारा प्रार्थना करते हुए देखे जाने में परेशान हो जाते हैं।

न कहीं हुई प्रार्थनाओं की वैधता के संकेत के लिए सबसे सर्वोत्तम वचन 1 थिस्सलुनीकियों 5:17 है: "निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो।" निरन्तर प्रार्थना में लगे रहने का स्पष्टतया यह अर्थ बिल्कुल भी नहीं है कि हम सभी समय ऊँची आवाज में प्रार्थना करते रहें। इसकी अपेक्षा, इसका अर्थ यह है कि हमें परमेश्‍वर-चेतना की निरन्तर अवस्था में बने रहना है, जहाँ हम हमारे प्रत्येक विचार को उसकी अधीनता में ले आते हैं (2 कुरिन्थियों 10:5) और प्रत्येक परिस्थिति, योजना, भय या चिन्ता को उसके सिंहासन के सामने ले आते हैं। न रूकने वाली प्रार्थना का एक अंश ऐसी प्रार्थनाएँ होगीं जो कही गई, फुसफुसाई गई, चिल्लाई गई, गाई गई, और चुपचाप की गई होंगी जब हम हमारी स्तुति, विनती, याचना और धन्यवाद के विचारों को परमेश्‍वर की ओर निर्देशित करते हैं।

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