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प्रश्न

यौन शुद्धता महत्वपूर्ण क्यों है?

उत्तर


परमेश्‍वर ने पुरुष और स्त्री को विवाह की सीमाओं के भीतर यौन सम्बन्धों का आनन्द और सुख प्रदान किया है, और बाइबल पति और पत्नी के बीच उस एकता की सीमाओं के भीतर यौन शुद्धता को बनाए रखने के महत्व के बारे में स्पष्ट है (इफिसियों 5:31)। मनुष्य परमेश्‍वर से इस उपहार के सुखद प्रभाव के बारे में अच्छी तरह से जानता है, परन्तु उसने विवाह की सीमा से बाहर और लगभग प्रत्येक परिस्थिति में इसे विस्तारित किया है। सांसारिकता से भरे हुए संसार का दर्शन में "यदि यह अच्छा लगता है, तो यह इस कर लें" वाली संस्कृतियाँ फैली हुईं हैं, विशेष रूप से पश्‍चिम सभ्यता में, जहाँ पर यौन शुद्धता को प्राचीन और अनावश्यक माना जाता है।

फिर भी देखें कि यौन शुद्धता के बारे में परमेश्‍वर क्या कहता है। "क्योंकि परमेश्‍वर की इच्छा यह है कि तुम पवित्र बनो : अर्थात् व्यभिचार से बचे रहो, और तुम में से हर एक पवित्रता और आदर के साथ अपनी पत्नी को प्राप्‍त करना जाने, और यह काम अभिलाषा से नहीं, और न उन जातियों के समान जो परमेश्‍वर को नहीं जानतीं... क्योंकि परमेश्‍वर ने हमें अशुद्ध होने के लिये नहीं, परन्तु पवित्र होने के लिये बुलाया है।"(1 थिस्सलुनीकियों 4:3-5, 7)। यह सन्दर्भ उसकी सन्तानों को अपने जीवनों में यौन शुद्धता के लिए बुलाए जाने के परमेश्‍वर के कारणों की रूपरेखा को बताता है।

सबसे पहले, हमें "पवित्र" रहना है, और इसी कारण से हमें यौन अनैतिकता से बचना है। शब्द "पवित्र" का अनुवाद जिस यूनानी शब्द से किया गया है, उसका शाब्दिक रूप "[परमेश्‍वर के लिए] शुद्ध, पवित्र किया गया है" से है। मसीही विश्‍वासी होने के नाते, हमें शुद्ध जीवन यापन करना है, क्योंकि हमें क्रूस के ऊपर मसीह की धार्मिकता को देते हुए और हमारे पापों को लेते हुए पवित्र बनाया गया और मसीह में पूरी तरह से नई सृष्टि के रूप में रच दिया गया है (2 कुरिन्थियों 5:17-21)। हमारे पुराने स्वभाव की उसकी सारी अशुद्धियों, यौन और अन्य सभी बातों की मृत्यु हो गई है, और अब हम जिस जीवन को यापन करते हैं, हम उस व्यक्ति में विश्‍वास करने के द्वारा यापन करते हैं, जो हमारे लिए मर गया है (गलातियों 2:20)। यौन अशुद्धता (व्यभिचार) में बने रहना इसे अस्वीकार करना है, और वास्तव में, यह प्रश्‍न पूछने के लिए वैध कारण यह भी है कि क्या हमारा वास्तव में नया जन्म हुआ है या नहीं। पवित्रीकरण वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा हम अधिक से अधिक मसीह के जैसा बनते चले जाते हैं, यह हमारे उद्धार की वास्तविकता का एक आवश्यक प्रमाण है।

हम 1 थिस्सलुनीकियों 4:3-5 में भी अपने शरीर को नियन्त्रित करने की आवश्यकता को देखते हैं। जब हम यौन अनैतिकता में स्वयं को दे देते हैं, तो हम यह प्रमाण देते हैं कि पवित्र आत्मा हम में वास नहीं कर रहा है, क्योंकि हमारे पास आत्मा का फल आत्म-संयम नहीं होता हैं। सभी विश्‍वासियों को आत्मा का फल (गलातियों 5:22-23) अधिक या कम मात्रा में प्रदर्शित करना होता है, जो इस पर निर्भर करता है कि हम आत्मा को हमारे ऊपर नियन्त्रण रखने की अनुमति दे रहे हैं या नहीं। अनियन्त्रित "भावुकता से भरी हुई वासना" शरीर का कार्य है (गलातियों 5:19), आत्मा का नहीं। इसलिए अपनी वासनाओं को नियन्त्रित करना और यौन शुद्धता वाले जीवन को यापन करना उस व्यक्ति के लिए आवश्यक है, जो मसीह को जानने का दावा करता है। ऐसा करने के द्वारा, हम अपने शरीर के द्वारा परमेश्‍वर का सम्मान करते हैं (1 कुरिन्थियों 6:18-20)।

हम जानते हैं कि परमेश्‍वर के नियम और अनुशासन हमारे लिए उसके प्रेम को दर्शाते हैं। वह जो कहता है, उसका अनुसरण करना पृथ्वी पर हमारे रहने के दिनों में हमारी सहायता कर सकता है। विवाह से पहले यौन शुद्धता बनाए रखने से, हम भावनात्मक रूप से जान बूझकर फँसने से बचते हैं, जो भविष्य के सम्बन्ध और विवाह को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है। इसके अतिरिक्त, विवाह के विछौना को शुद्ध रखकर (इब्रानियों 13:4), हम अपने साथी के लिए अनारक्षित प्रेम का अनुभव कर सकते हैं, जो केवल हमारे लिए परमेश्‍वर के विशाल प्रेम में ही सुरक्षित पाया जाता है।

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