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प्रश्न

क्या एक विवाहित जोड़े के द्वारा मात्र आनन्द प्राप्ति के लिए यौन सम्पर्क स्थापित करना गलत है?

उत्तर


लगभग पूरे पुराने नियम की पुस्तक आनन्द प्राप्ति के विषय के लिए वासना और यौन सम्पर्क स्थापित के विषय के प्रति समर्पित है। सुलैमान रचित श्रेष्ठगीत विवाह में यौन सुख के आशय से इतना अधिक विस्तृत रूप में लिखा गया है कि इसके अर्थों को देने के लिए रूपकों का उपयोग किया गया था, और इसे इब्रानी लड़कों को तब तक नहीं पढ़ाया जाता था जब तक कि वे 12 वर्ष के नहीं हो जाते थे, जब वे पुरुष बन जाते थे। परमेश्‍वर ने स्पष्टता के साथ विवाह में यौन को आनन्त प्राप्ति के लिए रचा है। पहला कुरिन्थियों 7:3-5 विवाह में यौन सम्पर्क से दूर रहने के विषय पर बात करता है: "पति अपनी पत्नी का हक्क पूरा करे; और वैसे ही पत्नी भी अपने पति का। पत्नी को अपनी देह पर अधिकार नहीं पर उसके पति का अधिकार है; वैसे ही पति को भी अपनी देह पर अधिकार नहीं, परन्तु पत्नी को। तुम एक दूसरे से अलग न रहो; परन्तु केवल कुछ समय तक आपस की सम्मति से कि प्रार्थना के लिये अवकाश मिले और फिर एक साथ रहो; ऐसा न हो, कि तुम्हारे असंयम के कारण शैतान तुम्हें परखे।"

यौन सम्पर्क के समय होने वाले यौन इच्छाओं और आनन्द प्राप्ति की भावनाओं को परमेश्‍वर के द्वारा ही निर्मित किया गया है और इसलिए ही विवाह को रचा गया है, ताकि इन इच्छाओं की पूर्ति हो सके। पौलुस जो कुछ कह रहा है, वह यह है कि इन भावनाओं को अपने पति या पत्नी की ओर निर्देशित करें न कि किसी अन्य की ओर नहीं और यह सुनिश्चित करें कि इनकी पूर्ति आपके वैवाहिक सम्बन्ध में पूरी हों, न कि यह उसके बाहर। ध्यान दें कि पौलुस कहता है कि यदि एक साथी अपने पति या पत्नी की अपेक्षाओं के अनुसार जीवन व्यतीत नहीं कर रहा है, यह चाहे आनन्द प्राप्ति या समय ही क्यों न हो, तब दोनों के द्वारा इस विषय को परमेश्‍वर के सामने लाने की आवश्यकता है, ताकि जीवन साथी में किसी को इसे वैवाहिक सम्बन्धों से बाहर पूरा करने का प्रयास न करना पड़े। वर्षों के व्यतीत होने के साथ चलचित्र के माध्यम से मिलने वाली अश्लील सामग्री और यौन सम्बन्धों में भ्रष्टता के कारण, कई लोग (विशेष रूप से मसीही विश्‍वासी) इस विचार को पाते हैं कि आनन्द देने वाला यौन सम्पर्क गलत है। हम कई बार यह भूल जाते हैं कि परमेश्‍वर ने ही हमारे लिए यौन सम्बन्ध की रचना की है और इसे पूरा करने के लिए ऐसी भावनाओं की भी रचना की है; जिसमें आनन्द की प्राप्ति होती है। हमें शैतान और उसके झूठ के कारण अपने जीवन साथी से आनन्द की प्राप्ति को नहीं रोकना चाहिए, और हमें सेक्स अर्थात् यौन सम्बन्धों के नकली आनन्द में नहीं गिर जाना चाहिए, जिसे यह संसार प्रदान करता है। परमेश्‍वर का आनन्द ही वास्तविक और संतोषजनक आनन्द है; शैतान का आनन्द नकली और व्यर्थ है।

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