वे कौन से तरीके हैं जिनके द्वारा मुझे कलीसिया में सेवा करनी चाहिए/कर सकता हूँ?


प्रश्न: वे कौन से तरीके हैं जिनके द्वारा मुझे कलीसिया में सेवा करनी चाहिए/कर सकता हूँ?

उत्तर:
बाइबल के अनुसार, प्रत्येक मसीही विश्‍वासी को मसीह की देह में सेवा करने के लिए कम से कम एक आत्मिक वरदान तो अवश्य ही दिया गया है। "जिसको जो वरदान मिला है, वह उसे परमेश्‍वर के नाना प्रकार के अनुग्रह के भले भण्डारियों के समान एक दूसरे की सेवा में लगाए। यदि कोई बोले, तो ऐसा बोले मानो परमेश्‍वर का वचन है; यदि कोई सेवा करे, तो उस शक्‍ति से करे जो परमेश्‍वर देता है; जिससे सब बातों में यीशु मसीह के द्वारा — परमेश्‍वर की महिमा प्रगट हो। महिमा और साम्राज्य युगानुयुग उसी का है। आमीन" (1 पतरस 4:10–11; की तुलना इफिसियों 4:11–16 से करें)। इसलिए, कलीसिया में सर्वश्रेष्ठ रूप से सेवकाई करने को निर्धारित करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम यह जानना है कि हमारे आत्मिक वरदान क्या हैं। नि:सन्देह, हम यह नहीं जानते हैं कि कलीसिया में सम्मिलित होने से पहले हमारा वरदान क्या था। सच्चाई तो यह है, कि हम अक्सर सेवा करने की प्रक्रिया में अपने वरदान की खोज करते हैं। आत्मिक वरदान रोमियों 12:6-8 और 1 कुरिन्थियों 12:4-11, 28 में सूचीबद्ध हैं।

मसीह की देह के विश्‍वव्यापी (1 कुरिन्थियों 12:12-13) और स्थानीय दोनों के मध्य में एक अन्तर पाया जाता है, जिसमें मसीही विश्‍वासी सामूहिक रूप से भाग लेते हैं (इब्रानियों 10:25)। परन्तु इस बात में कोई भिन्नता नहीं पाई जाती है कि कैसे मसीही विश्‍वासियों को अपने आत्मिक वरदानों का उपयोग करना चाहिए, क्योंकि परमेश्‍वर की सेवा करना चौबीस-घण्टे-का प्रस्ताव है, न कि केवल रविवार का व्यवसाय। प्रत्येक स्थान पर सभी मसीही विश्‍वासियों को अपनी स्थानीय कलीसियाओं में परमेश्‍वर की सेवा करनी चाहिए और एक कलीसियाई भवन की दीवारों के बाहर भी सेवा करने के अवसरों की खोज करनी चाहिए (2 कुरिन्थियों 9:12-13)। यह जानना कठिन हो सकता है कि परमेश्‍वर ने आपको कौन से आत्मिक वरदान दिए हैं, परन्तु कहीं नहीं की अपेक्षा कहीं भी सेवा करना अधिक उत्तम है (रोमियों 12:11)। अक्सर, वरदानों की खोज करने से कार्य करना अधिक स्पष्ट हो जाता है – जब हम विभिन्न नौकरियों में कार्य करते हैं, हम सीखते हैं कि हम किन कामों को करने में अच्छे हैं और हमारे मन किन कामों को करने की ओर लगे हुए हैं (1 इतिहास 28:9)।

इच्छुक कार्यकर्ताओं की तुलना में आवश्यकताएँ सदैव अधिक होती हैं; यह मसीह के दिनों में सच था और आज भी सच है (मत्ती 9:37)। स्थानीय चर्च में आवश्यकता को खोजने में कभी भी कोई समस्या नहीं होती है। समुदाय को सुसमाचार देने से (जिसे करने की बुलाहट सभी मसीही विश्‍वासियों को दी गई है, प्रेरितों के काम 1:8) से लेकर बाथरूम की सफाई के लिए सदैव से ही करने के लिए बहुत सारे काम होते हैं। कलीसिया की आवश्यकताओं के सम्बन्ध में कलीसिया के अगुवे से जाँच करना अच्छा होता है। पास्टर और प्राचीनों के साथ बातचीत करें कि कौन से कार्य किए जाने हैं और वे आपके द्वारा किए जाने के लिए उपयुक्त हैं या नहीं।

स्थानीय मण्डलियों में सेवकाई के पदों के कुछ उदाहरण यहाँ दिए गए हैं:
• सन्डे स्कूल और बाइबल अध्ययन शिक्षक होना (एक सेवानिवृत्त व्यक्ति के रूप में)
• बच्चों के और युवाओं के अगुवे होना
• प्रशासक
• सचिव
•भवन और मैदानों की देखभाल करने के लिए चौकीदार और रखरखाव कार्यकर्ता
• बच्चों या अन्य लोगों के लाने ले जाने के लिए उनके लिए ड्राईवर का कार्य करना जो करने में असमर्थ हैं
• सुसमाचार प्रचार करने वाले कार्यकर्ता
• देने लेने वाले और स्वागत करने वाले कार्यकर्ता
• गाना बजाने वाले सदस्य और एकल गायक
• संगीतकार
• संगीत निर्देशक, गायन दल के अगुवे होना, इत्यादि।
• ऑडियो और वीडियो तकनीक कार्यकर्ता
• वेबसाइट प्रशासक और सोशल मीडिया समन्वयक
• खजाँची और लेखाकार
• रसोई में कार्य करने वाला कार्यकर्ता
• बगीचे में कार्य करने वाला कार्यकर्ता

प्रत्येक कलीसिया के प्रत्येक सदस्य को किसी न किसी तरह से सेवा करनी चाहिए और प्रभु के प्रत्येक सेवक को स्मरण रखना चाहिए कि बात दूसरों की सेवा करने से कहीं बढ़कर है; यह उन्हें प्रेम करना है: "प्रेम से एक दूसरे के दास बनो" (गलतियों 5:13)। कलीसिया में सेवा करने के कई रूप सामने आ सकते हैं: एक युवा जोड़े के लिए बच्चों की एक रात देखभाल करना, बीमारी से पीड़ित परिवार के लिए भोजन तैयार करना, बुजुर्गों, घर में रहने वाली विधवा से मुलाकात करने जाना या किसी के फोन पर बात करना कि, "मैं आज आपके बारे में ही सोच रहा था।" मसीही विश्‍वासी स्वयं को ऊपर सूचीबद्ध लोगों की तरह सेवा के कार्यों में व्यस्त कर सकते हैं, परन्तु प्रेम के बिना किए गए अन्तहीन कार्यों का प्रदर्शन व्यर्थ है (1 कुरिन्थियों 13:1-3)। जब हम परमेश्‍वर और दूसरों की सेवा करते हैं, तब आइए क्यों न हम इसे नम्रता और भाईचारे के प्रेम की भावना के साथ करें (फिलिप्पियों 2:1-4)।

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