मुझे परमेश्‍वर की सेवा क्यों करनी चाहिए?


प्रश्न: मुझे परमेश्‍वर की सेवा क्यों करनी चाहिए?

उत्तर:
यह सच्चाई कि हमें परमेश्‍वर की सेवा करनी चाहिए पवित्रशास्त्र में स्पष्टता के साथ पाई जाती है (लूका 4:8 को देखें)। हमें परमेश्‍वर की सेवा क्यों करनी चाहिए एक अधिक कठिन प्रश्‍न है। परमेश्‍वर की सेवा करने के विषय के बारे में प्रत्येक मसीही विश्‍वासी से पूछे जाने पर भिन्न कारण प्राप्त हो सकते हैं; भिन्न लोग भिन्न बातों से प्रेरित होते हैं। यद्यपि, बाइबल स्पष्ट करती है कि, जब कोई व्यक्ति परमेश्‍वर के साथ वास्तविक सम्बन्ध में होता है, तो वह परमेश्‍वर की सेवा करेगा। हमें परमेश्‍वर की सेवा इसलिए करना चाहिए क्योंकि हम उसे जानते हैं; उसे जानने का एक निहित भाग उसकी सेवा करने की इच्छा है।

परमेश्‍वर की यह इच्छा सदैव से रही है कि हम उसके पुत्र, यीशु के जैसे बन जाए (रोमियों 8:29)। जब हम यीशु के जीवन को देखते हैं, तो कोई इन्कार नहीं कर सकता कि वह दास था। यीशु का पूरा जीवन परमेश्‍वर की सेवा करने, शिक्षा देने, चँगा करने और राज्य की घोषणा करने के ऊपर केन्द्रित था (मत्ती 4:23)। वह इसलिए नहीं आया कि "उसकी सेवा टहल की जाए, परन्तु इसलिये आया कि आप सेवा टहल करे" (मत्ती 20:28)। तब, उसके पकड़वाए जाने की रात में, यीशु ने शिष्यों के पैरों को धोया, और उन्हें एक दूसरे की सेवा करने के लिए एक अन्तिम शिक्षा के साथ छोड़ा: "मैं ने तुम्हें नमूना दिखा दिया है कि जैसा मैं ने तुम्हारे साथ किया है, तुम भी वैसा ही किया करो" (यूहन्ना 13:12-17)। इसलिए, यदि यीशु का जीवन सेवा करने के बारे में ही सब कुछ है, और परमेश्‍वर हमें उसके जैसे बनाना चाहता है, तो यह स्पष्ट है कि हमारे जीवन को भी सेवा करने के बारे में ही सब कुछ होना चाहिए।

वास्तविक सेवा को प्रेम से अलग नहीं किया जा सकता है। हम परमेश्‍वर की सेवा करने की गतिविधियों को कर सकते हैं, परन्तु यदि हमारे मन इसमें नहीं हैं, तो हम मुख्य बात को ही खो रहे हैं। पहला कुरिन्थियों 13 यह स्पष्ट करता है कि, जब तक कि हमारी सेवा प्रेम में निहित नहीं है, यह अर्थहीन है। परमेश्‍वर की सेवा प्रेम में न होकर, दायित्व या कर्तव्य की भावना से होकर करना, वैसी सेवा नहीं है, जिसकी वह इच्छा रखता है। इसकी अपेक्षा, परमेश्‍वर की सेवा करना हमारे लिए स्वाभाविक, प्रेम से भरी हुई प्रतिक्रिया होनी चाहिए, क्योंकि उसने हम से पहले प्रेम किया है (1 यूहन्ना 4:9-11 को देखें)।

प्रेरित पौलुस मसीह के द्वारा परमेश्‍वर के साथ सम्बन्ध के विषय में एक बहुत बड़ा उदाहरण है, कि कैसे इसका परिणाम सेवा में निकलता है। अपने मन परिवर्तन से पहले, पौलुस ने मसीही विश्‍वासियों को सताया और उन्हें यह सोचते हुए मार भी डाला कि वह परमेश्‍वर की सेवा कर रहा था। परन्तु दमिश्क के मार्ग पर यीशु के साथ सामना हो जाने के पश्‍चात्, उसने तुरन्त अपने जीवन के शेष भाग को यीशु मसीह के सुसमाचार को फैलाने के द्वारा परमेश्‍वर की सेवा करने के लिए समर्पित कर दिया (प्रेरितों के काम 9:20 को देखें)। पौलुस 1 तीमुथियुस 1:12-14 में इस परिवर्तन का वर्णन करता है: "मैं अपने प्रभु मसीह यीशु का जिसने मुझे सामर्थ्य दी है, धन्यवाद करता हूँ कि उसने मुझे विश्‍वासयोग्य समझकर अपनी सेवा के लिये ठहराया। मैं तो पहले निन्दा करनेवाला, और सतानेवाला, और अन्धेर करनेवाला था; तौभी मुझ पर दया हुई, क्योंकि मैं ने अविश्‍वास की दशा में बिन समझे बूझे ये काम किये थे। और हमारे प्रभु का अनुग्रह उस विश्‍वास और प्रेम के साथ जो मसीह यीशु में है, बहुतायत से हुआ।" एक बार जब पौलुस को उसके प्रेम और अनुग्रह के बारे में पता चला, जिसे परमेश्‍वर ने उसे दिया था, तो उसकी प्रतिक्रिया परमेश्‍वर की सेवा करना था।

बाइबल हमें सेवा के लिए कई प्रेरणा प्रदान करती है। हम परमेश्‍वर की सेवा इसलिए करना चाहते हैं क्योंकि "इस कारण हम इस राज्य को पाकर जो हिलने का नहीं कृतज्ञ हों" (इब्रानियों 12:28), क्योंकि हमारी सेवा "परमेश्‍वर के लोगों की आवश्यकताओं" (2 कुरिन्थियों 9:12) की आपूर्ति करती है, क्योंकि हमारी सेवा हमारे विश्‍वास को प्रमाणित करती है और दूसरों के लिए परमेश्‍वर की स्तुति करने का कारण बनती है (2 कुरिन्थियों 9:13), और क्योंकि परमेश्‍वर हमारे प्रेम के परिश्रम को देखता और उसे प्रतिफल देता है (इब्रानियों 6:10)। इनमें से प्रत्येक परमेश्‍वर की सेवा करने का एक अच्छा कारण है।

हम केवल वही दे सकते हैं, जो हमने पहले प्राप्त किया है। परमेश्‍वर से प्रेम और सेवा करने का कारण यह है कि उसने सबसे पहले यीशु मसीह के माध्यम से हमें प्रेम किया और हमारी सेवा की है। जितना अधिक हम अपने जीवन में परमेश्‍वर के प्रेम से अवगत् होते और उसका अनुभव करते चले जाते हैं, उतना ही अधिक हम उसकी सेवा को करने के लिए प्रेम में होकर उत्तर देना चाहते हैं। यदि आप परमेश्‍वर की सेवा करना चाहते हैं, तो उसे जानना महत्वपूर्ण है! पवित्र आत्मा से प्रार्थना करें कि वह आपके ऊपर परमेश्‍वर को और अधिक प्रकट करे (यूहन्ना 16:13)। जब हम वास्तव में परमेश्‍वर को जानते हैं, जो प्रेमी है (1 यूहन्ना 4:8), तो हमारी स्वाभाविक प्रतिक्रिया उससे प्रेम करने की इच्छा और बदले में उसकी सेवा करने में होती है।

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