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प्रश्न

परमेश्वर की खोज करना क्यों महत्वपूर्ण है?

उत्तर


रोम की कलीसिया को लिखे हुए अपने पत्र में, पौलुस ने भजन संहिता के एक आश्चर्यजनक कथन को उद्धृत किया है: "कोई समझदार नहीं; कोई परमेश्‍वर का खोजनेवाला नहीं" (रोमियों 3:11)। कैसे पौलुस और दाऊद तो उससे भी पहले, इस तरह की व्यापक घोषणा कर सकते हैं? अभी तक जीवित रहने वालों में से, एक भी व्यक्ति ने परमेश्वर की खोज नहीं की? यहाँ यह प्रश्न नहीं है कि अरबों लोगों में ने किसी एक ने तो एक देवता की खोज की होगी, परन्तु उन्होंने सदैव सच्चे परमेश्वर की खोज नहीं की है।

यह तथ्य सीधे रूप में आदम और हव्वा के पाप से जुड़ा है जो शैतान के धोखे से प्रेरित हुए थे। मानव जाति के इतिहास में, शैतान द्वारा प्रचारित विश्वासघात इतना अधिक गहरा है कि स्वाभाविक मनुष्य केवल परमेश्वर के बारे में वास्तविक सच्चाई को इधर या उधर टुकड़े को ही देख सकता है। परिणामस्वरूप, परमेश्वर के बारे में हमारी धारणाएँ धुँधली हो जाती हैं। यह केवल तभी सम्भव होता है जब परमेश्वर स्वयं हमें यह बताने के लिए चुनता है कि जब हमारी आँखें खुलती हैं तो कई टुकड़े एक साथ इकट्टे होने लगते हैं। तब, वास्तव में परमेश्वर की खोज सम्भव हो जाती है।

यीशु ने यूहन्ना 17:3 में हमसे कहा है कि, "अनन्त जीवन यह है कि वे तुझ एकमात्र सच्‍चे परमेश्‍वर को और यीशु मसीह को, जिसे तू ने भेजा है, जानें।" यहाँ यीशु हमें बता रहा है कि हमें परमेश्वर की खोज करते रहना, उसे और अधिक जानना, सच्चे जीवन, शाश्वत जीवन का सार है। हमारे मनों को मनोरंजन करने वाले सबसे महत्वपूर्ण विचार परमेश्वर के विचार होते हैं, क्योंकि वे जीवन की गुणवत्ता और दिशा को निर्धारित करते हैं। इस कारण, परमेश्वर की खोज करना सभी मसीही विश्वासियों के लिए एक बने रहने वाला दायित्व और विशेषाधिकार है।

परन्तु हम यह भी जानते हैं कि परमेश्वर की खोज करना सदैव आसान काम नहीं होता है, इसलिए नहीं कि परमेश्वर पहुँच में नहीं आनेवाला है, अपितु इसलिए क्योंकि हमारे मन शैतान के द्वारा लाई हुई गलत धारणाओं और धोखे से भरे हुए हैं और हम संस्कृति द्वारा प्रभावित होते हैं, इसका उल्लेख किए बिना कि यह हमारे स्वयं के पापी स्वभाव और पाप के सामान्य धोखे से भी भरे हुए होते हैं। इसमें मन और पाप की सामान्य धोखेबाज़ी पाई जाती है (यिर्मयाह 17:9; याकूब 1:13-15)। परन्तु शुभ सन्देश यह है कि इन गलत धारणाओं को दूर किया जाता है ताकि परमेश्वर का पता चल सके और उसके साथ हमारा सम्बन्ध विकसित हो सके। यह तब आरम्भ होता है जब हम उसके पास उद्धार के लिए जाते हैं और यीशु मसीह पर अपना भरोसा रखते हैं। जब हमारा उद्धार हो जाता है, तो हम उस पवित्र आत्मा को हम में वास करने के लिए प्राप्त करते हैं जो हमें परमेश्वर को जानने में सहायता करता है और यहाँ तक कि हमारे मनों को भी परिवर्तित करना चाहता है (इफिसियों 1:13-14; फिलिप्पियों 1:6; 2:12–13; रोमियों 8:26-30)। रोमियों 12:2 परामर्श देता है कि, "इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारे मन के नए हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए, जिससे तुम परमेश्‍वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो।" हम परमेश्वर के बारे में सच्चाई को सीखते हैं और उसका वचन (बाइबल) पढ़कर उसकी खोज करते हैं। हम प्रार्थना के माध्यम से और आराधना के समय में भी परमेश्वर की खोज करते हैं। हम व्यक्तिगत् और सामूहिक दोनों तरह से परमेश्वर की खोज करते हैं। यीशु में पाए जाने वाले अन्य विश्वासियों के साथ समय बिताना, जो परमेश्वर की खोज कर रहे हैं, हमें उनकी खोज को चलाए रखने में सहायता के लिए महत्वपूर्ण है (इब्रानियों 10:24-25)।

दूसरा इतिहास 15:2–4 हमारे लिए शिक्षाप्रद है। यह सन्दर्भ दो हज़ार वर्षों पहले हमारे जैसे ही लोगों के लिए ही लिखा गया था: "वह आसा [अजर्याह भविष्यद्वक्ता] से भेंट करने निकला, और उससे कहा, 'हे आसा, और हे सारे यहूदा और बिन्यामीन, मेरी सुनो, जब तक तुम यहोवा के संग रहोगे तब तक वह तुम्हारे संग रहेगा; और यदि तुम उसकी खोज में लगे रहो, तब तो वह तुम से मिला करेगा, परन्तु यदि तुम उसको त्याग दोगे तो वह भी तुम को त्याग देगा। बहुत दिन इस्राएल बिना सत्य परमेश्‍वर के और बिना सिखानेवाले याजक के और बिना व्यवस्था के रहा। परन्तु जब जब वे संकट में पड़कर इस्राएल के परमेश्‍वर यहोवा की ओर फिरे और उसको ढूँढ़ा, तब तब वह उनको मिला।'''

उनके निर्देश सरल थे: जब वे गम्भीरता से परमेश्वर की खोज करते हैं, तो बातें उनके लिए अच्छी तरह से घटित होती थीं, परन्तु जब उनकी खोज करने की इच्छा खत्म हो जाती थी और अन्त में पूरी तरह से समाप्त हो जाती थी, तो उनका संसार उलट-पुलट हो हो जाता था। पाप बढ़ गया, नैतिकता में गिरावट आई, परमेश्वर से सम्पर्क समाप्त हो गया। उस समय के लिए दी गई परमेश्वर की सन्तान के लिए चेतावनियाँ आज के लिए भी स्पष्ट हैं: "यदि तुम उसकी खोज में लगे रहो, तब तो वह तुम से मिला करेगा।" यह गम्भीर सिद्धान्त पूरे पवित्रशास्त्र में दोहराया गया है (व्यवस्थाविवरण 4:29; यिर्मयाह 29:13; मत्ती 7:7; प्रेरितों के काम 17:27; याकूब 4:8)। विचार यह पाया जाता है कि, जब हम परमेश्वर के निकट आते हैं, तो वह हम पर स्वयं को प्रकट करता है। परमेश्वर स्वयं को एक खोजने वाले मन से नहीं छिपाता है।

"परन्तु वहाँ भी यदि तुम अपने परमेश्‍वर यहोवा को ढूँढ़ोगे, तो वह तुम को मिल जाएगा, शर्त यह है कि तुम अपने पूरे मन से और अपने सारे प्राण से उसे ढूँढ़ो।" (व्यवस्थाविवरण 4:29)

"तुम मुझे ढूँढ़ोगे और पाओगे भी; क्योंकि तुम अपने सम्पूर्ण मन से मेरे पास आओगे।" (यिर्मयाह 29:13)

"माँगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूँढ़ो तो तुम पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा।" (मत्ती 7:7)

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