क्या बाइबल दूसरे विवाह को सफल बनाने के बारे में कुछ कहती है?


प्रश्न: क्या बाइबल दूसरे विवाह को सफल बनाने के बारे में कुछ कहती है?

उत्तर:
अब्राहम ही केवल बाइबल में एकमात्र ऐसा व्यक्ति मिलता है, जिसे विशेष रूप से अपने जीवन साथी की मृत्यु के बाद पुनर्विवाह करने के रूप में वर्णित किया गया है (उत्पत्ति 25:1), परन्तु बाइबल कहीं भी यह वर्णन नहीं करती कि अब्राहम का दूसरा विवाह कैसा था। बाइबल कहीं भी तलाक के बाद पुनर्विवाह करने वाले व्यक्ति का वर्णन नहीं करती है। परन्तु, चाहे दूसरा विवाह तलाक या जीवन साथी की मृत्यु के कारण ही क्यों न हुआ है, बाइबल के सिद्धान्त पाए जाते हैं, जिन्हें निश्‍चित रूप से दूसरे विवाह को सफल बनाने के ऊपर लागू किया जा सकता है।

चाहे यह पहला, दूसरा, या तीसरा विवाह ही क्यों न हो, पतियों को अपनी पत्नियों को बलिदान से भरे हुए प्रेम से प्रेम करना है (इफिसियों 5:25) और पत्नियों को अनुग्रहपूर्वक अपने पतियों के अधीन होना है (इफिसियों 5:22)। एक पति और उसकी पत्नी को जब तक मृत्यु न आए तब तक विवाह को स्थाई और न टूटने वाले रूप में देखना है (मत्ती 19:6)। पति और पत्नियों को एक-दूसरे से प्रेम करना, एक दूसरे को क्षमा करना, और एक दूसरे का सम्मान करना और एक-दूसरे को समझना है (इफिसियों 5:33; 1 पतरस 3:7)।

दूसरा विवाह अक्सर मिश्रित परिवारों के परिणामस्वरूप होता है, और यह स्वयं में ही बहुत अधिक तनाव को उत्पन्न कर सकता है। छोड़ना और एक शरीर होने का सिद्धान्त अति महत्वपूर्ण है। विवाह को अन्य सभी पारिवारिक सम्बन्धों में प्राथमिकता लेनी है, क्योंकि केवल विवाह में ही दो लोग एक शरीर होते हैं। एक मिश्रित परिवार के भीतर अक्सर उत्पन्न होने वाले संघर्षों को एकता से निपटाया जाना चाहिए।

यह बहुत ही अधिक महत्वपूर्ण है कि दूसरे विवाह में पति और पत्नियाँ अपने पूर्व के जीवन साथी की तुलना अपने नए जीवन साथी के साथ न करें। ऐसा करने से कड़वाहट, ईर्ष्या और अवास्तविक अपेक्षाओं के अतिरिक्त और कुछ भी प्राप्त नहीं होता है। एक नया जीवन साथी पूर्व के जीवन साथी के जैसा व्यक्ति नहीं है और इसलिए उस से वैसा होने की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। चाहे पूर्व विवाह अद्भुत या भयानक था, इसकी भावनाओं और पीड़ाओं को दूसरे विवाह में स्थानांतरित नहीं किया जाना चाहिए।

सबसे बड़ी बात, दूसरे विवाह को सफल बनाने की कुँजी विवाह को परमेश्‍वर के प्रति समर्पित करना और उसके अनुग्रह और सामर्थ्य के लिए उस पर भरोसा करने की है। एक विवाह का उद्देश्य मसीह और कलीसिया को चित्रित करना होता है (इफिसियों 5:29-32)। केवल मसीह के माध्यम से एक विवाह वैसा हो सकता है, जैसा परमेश्‍वर इसे चाहता है। साथ ही, किसी भी विवाह में, जब कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, तो जोड़ों को पास्टर और/या मसीही परामर्शदाता से बुद्धिमानी से भरे हुए परामर्श को लेना चाहिए (नीतिवचन 15:22)। विवाह के बारे में परमेश्‍वर क्या कहता है, इसे समझना और इसे परमेश्‍वर को समर्पित करना ही किसी भी विवाह को सफल बनाने की कुँजी है।

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