कर्मों के द्वारा उद्धार क्यों एक मुख्य दृष्टिकोण के रूप में पाया जाता है?


प्रश्न: कर्मों के द्वारा उद्धार क्यों एक मुख्य दृष्टिकोण के रूप में पाया जाता है?

उत्तर:
इसका सरल उत्तर यह है कि कर्मों के द्वारा उद्धार मनुष्य को उसकी दृष्टि में सही जान पड़ता है। मनुष्य की मूल इच्छाओं में से एक स्वयं के गंतव्य को नियन्त्रण में लेने की है, और इसमें उसकी शाश्‍वतकालीन गंतव्य अर्थात् मंजिल भी सम्मिलित है। कर्मों के द्वारा उद्घार मनुष्य के घमण्ड और सब कुछ को अपने नियन्त्रण में रखने की इच्छा के सन्तुष्ट करता है। कर्मों के द्वारा बचाया जाना एकमात्र विश्‍वास के द्वारा बचाए जाने के विचार की तुलना में अधिक सन्तुष्टि प्रदान करने वाली इच्छा है। इसके अतिरिक्त, मनुष्य में न्याय की अन्तर्निहित भावना है। यहाँ तक कि सबसे अधिक उत्साही नास्तिक भी किसी न किसी प्रकार के न्याय में विश्‍वास करता है और उसके पास सही और गलत की सोच होती है, चाहे उसके पास ऐसे निर्णय लेने के लिए कोई नैतिक आधार न हो। सही और गलत के प्रति हमारी अन्तर्निहित भावना ही है जो यह मांग करती है कि यदि हमें बचाया जाना है, तो हमारे "अच्छे काम" को हमारे "बुरे कामों" से अधिक होना चाहिए। इसलिए, यह स्वाभाविक है कि जब मनुष्य एक धर्म को बनाता है, तब इसमें कार्यों के द्वारा किसी प्रकार से उद्धार की प्राप्ति सम्मिलित होती है।

क्योंकि कर्मों के द्वारा उद्धार मनुष्य के पापी स्वभाव को सन्तुष्टि प्रदान करता है, इसलिए यह बाइबल की मसीहियत को छोड़ लगभग प्रत्येक धर्म का आधार बनाता है। नीतिवचन 14:12 हमें बताता है कि "ऐसा मार्ग है, जो मनुष्य को ठीक जान पड़ता है, परन्तु उसके अन्त में मृत्यु ही मिलती है।" कर्मों से उद्धार मनुष्यों को सही जान पड़ता है, यही कारण है कि इसे मुख्य दृष्टिकोण के रूप में स्वीकार किया जाता है। यही कारण है कि बाइबल की मसीहियत क्यों अन्य सभी धर्मों से भिन्न हो जाती — यही एकमात्र धर्म है जो उद्धार के लिए यह शिक्षा देता है कि यह परमेश्‍वर का वरदान है और कामों पर आधारित नहीं है। "क्योंकि विश्‍वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है; और यह तुम्हारी ओर से नहीं, वरन् परमेश्‍वर का दान है — और न कर्मों के कारण — ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे" (इफिसियों 2:8–9)।

एक अन्य कारण है कि क्यों कर्मों के द्वारा उद्धार मुख्य रूप माना जाने वाला दृष्टिकोण है, वह यह है कि स्वाभाविक या नवजीवन न पाया हुआ व्यक्ति अपने पापपूर्ण स्वभाव या परमेश्‍वर की पवित्रता की सीमा को पूरी तरह समझ नहीं पाता है। मनुष्य का मन "तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देनेवाला होता है, उस में असाध्य रोग लगा है" (यिर्मयाह 17:9), और परमेश्‍वर असीमित रूप से पवित्र है (यशायाह 6:3)। हमारे मन का धोखा वह वस्तु है जो उस धोखे की सीमा के बारे में हमारी धारणा को बिगाड़ देती है और यही वह है जो हमें अपनी सच्ची अवस्था में परमेश्‍वर को देखने से रोकती है जिसकी पवित्रता हम पूरी तरह से समझने में असमर्थ हैं। परन्तु सच्चाई यह है कि हमारे पापी स्वभाव और ईश्‍वर की पवित्रता एक पवित्र परमेश्‍वर के सामने जाने के लिए "गंदे चिथड़ों" के रूप में हमारे सर्वोत्तम प्रयास के रूप में मिलती है (यशायाह 64:6; की तुलना 6:1-5 से करें)।

यह विचार कि मनुष्य के अच्छे काम किसी समय उसके बुरे कामों को सन्तुलित कर सकते हैं, पूरी तरह से बाइबल के विपरीत पाई जाने वाली धारणा है। इतना ही नहीं, परन्तु बाइबल यह भी सिखाती है कि परमेश्‍वर का मापदण्ड 100 प्रतिशत से कम पूर्णता वाला नहीं है। यदि हम परमेश्‍वर की धार्मिक व्यवस्था के केवल एक ही अंश को पूरा रखने में असफल हो जाते हैं, तो हम दोषी हैं कि मानो हमने पूरी व्यवस्था को तोड़ दिया (याकूब 2:10)। इसलिए, यदि उद्धार वास्तव में कामों पर निर्भर होता तो हम कभी भी बच नहीं सकते थे।

एक और कारण है कि क्यों कर्मों के द्वारा उद्धार ऐसे पंथों में घुस आया है, जो स्वयं को मसीही होने दावा करते हैं या कहते हैं कि वे भी बाइबल में विश्‍वास करते हैं, यह है कि वे याकूब 2:24 जैसे सन्दर्भों को गलत रूप में समझते हैं: "इस प्रकार तुम ने देख लिया कि मनुष्य केवल विश्‍वास से ही नहीं, वरन् कर्मों से भी धर्मी ठहरता है" (याकूब 2:14-26), यह स्पष्ट हो जाता है कि याकूब यह नहीं कह रहा है कि हमारे काम हमें परमेश्‍वर के सामने धर्मी बनाते हैं; इसकी अपेक्षा, वह यह स्पष्ट कर रहा है कि वास्तविक बचाने वाला विश्‍वास अच्छे कार्यों के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। वह व्यक्ति जो मसीही विश्‍वासी होने का दावा करता है, परन्तु मसीह के प्रति जानबूझकर अवज्ञा में रहता है, वह झूठा है या उसके पास "मृत" विश्‍वास है और बचाया हुआ नहीं है। याकूब दो भिन्न प्रकार के विश्‍वासों के मध्य में एक अन्तर बना रहा है, ऐसा विश्‍वास जो बचाता है और ऐसा विश्‍वास जो मरा हुआ है।

यहाँ पर बहुत सारे वचन ऐसे हैं, जो सिखाते हैं कि एक व्यक्ति किसी भी तरह से कर्मों के द्वारा नहीं बचाया जा सकता है, चाहे मसीही विश्‍वासी इसमें विश्‍वास करे या नहीं। तीतुस 3:4-5 ऐसे ही कई सन्दर्भों में से एक है: "पर जब हमारे उद्धारकर्ता परमेश्‍वर की कृपा और मनुष्यों पर उसका प्रेम प्रगट हुआ, तो उसने हमारा उद्धार किया; और यह धर्म के कामों के कारण नहीं, जो हम ने स्वयं किए, पर अपनी दया के अनुसार नए जन्म के स्‍नान और पवित्र आत्मा के हमें नया बनाने के द्वारा हुआ।" अच्छे काम उद्धार में कोई योगदान नहीं देते हैं, परन्तु वे सदैव के लिए एक ऐसे व्यक्ति की विशेषता रहेंगे जिसका नया जन्म हुआ है। अच्छे काम उद्धार का कारण नहीं हैं; वे इसके प्रमाण हैं।

जबकि कामों के द्वारा उद्धार मुख्य रूप से माना जाने वाला दृष्टिकोण हो सकता है, यह बाइबल के अनुसार सटीक नहीं है। बाइबल एकमात्र मसीह में ही विश्‍वास के द्वारा केवल अनुग्रह से उद्धार की प्राप्ति के होने का प्रमाण देती है (इफिसियों 2:8-9)।

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