क्या झूठ बोलना सही है?


प्रश्न: क्या झूठ बोलना सही है?

उत्तर:
बाइबल कहीं पर एक भी ऐसा उदाहरण प्रस्तुत नहीं करती है, जहाँ झूठ बोलने को सही काम माना गया है। नौवें आदेश में झूठी गवाही देने का निषेध पाया जाता है (निर्गमन 20:16)। नीतिवचन 6:16-19 में "झूठ बोलनेवाली जीभ" और "झूठ बोलने वाले साक्षी" को यहोवा परमेश्‍वर ने घृणा की सात बातों में से दो के रूप में सूचीबद्ध किया है। प्रेम "सत्य से आनन्दित" होता है (1 कुरिन्थियों 13:6)। पवित्रशास्त्र के अन्य वचन जो झूठ बोलने के प्रति नकारात्मक रूप से बात करते हैं, देखें भजन संहिता 119:29, 163; 120:2; नीतिवचन 12:22; 13:5; इफिसियों 4:25; कुलुस्सियों 3:9; और प्रकाशितवाक्य 21:8 इत्यादि हैं। पवित्रशास्त्र में झूठ बोलने के कई उदाहरण, उत्पत्ति 27 में याकूब के धोखा से लेकर प्रेरितों के काम अध्याय 5 में हनन्याह और सफीरा के द्वारा बहाना बनाया जाना इत्यादि हैं। समय-समय पर, हम देखते हैं कि झूठ दुःख, हानि और न्याय की ओर ले जाता है।

बाइबल में कम से कम दो उदाहरण ऐसे पाए जाते हैं, जहाँ झूठ बोलने के अनुकूल परिणाम सामने आए थे। उदाहरण के लिए पर, इब्रानी दाईयाँ फ़िरौन से झूठ बोलती हैं कि उन पर परमेश्‍वर की आशीष के परिणाम प्रगट होते हैं (निर्गमन 1:15-21), और कदाचित् इसने कई इब्रानी बच्चों के जीवन को बचाया था। यहोशू 2:5 में इस्राएली जासूसों की रक्षा करने के लिए राहाब का झूठ एक और उदाहरण है। यद्यपि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि परमेश्‍वर कभी भी इन झूठों को स्वीकार नहीं करता है। इन झूठों के "सकारात्मक" परिणाम के पश्‍चात् भी, बाइबल कहीं भी झूठ की प्रशंसा नहीं करती है। बाइबल कहीं भी नहीं कहती है कि ऐसे कई उदाहरण हैं, जहाँ झूठ बोलना सही बात है। साथ ही, बाइबल यह घोषणा नहीं करती है कि कोई भी ऐसा संभावित उदाहरण नहीं है, जिसमें झूठ बोलना एक स्वीकार्य विकल्प पाया गया है।

प्रश्‍न तब भी हमारे सामने वैसे ही बना हुआ है: क्या कभी ऐसा समय आता है, जब झूठ बोलना सही बात होती है? इस दुविधा का सबसे सामान्य उदाहरण नाजियों के अधीन हॉलैंड में 'कोरी टेन बूम' के जीवन से आता है। अनिवार्य रूप से, कहानी यह है: कोरी टेन बूम अपने घर में नाज़ियों से बचाने के लिए यहूदियों को छुपा रही थी। नाजी सैनिक उसके घर आते हैं और उससे पूछते हैं कि क्या वह जानती है कि यहूदी कहाँ छिप रहे थे। अब उसे क्या करना चाहिए था? क्या उसे सच्चाई बतानी चाहिए थी और नाज़ियों को यहूदियों को पकड़ने की अनुमति देनी चाहिए, जबकि वह उनकी रक्षा करने का प्रयास कर रही थी? या, क्या उसे झूठ बोलना चाहिए और इनकार करना चाहिए कि वह उनके बारे में कुछ भी नहीं जानती है?

इस तरह के एक उदाहरण में, जहाँ एक भयानक बुराई को रोकने के लिए झूठ बोलना ही एकमात्र सम्भव तरीका हो सकता है, कदाचित् झूठ बोलना एक स्वीकार्य बात होगी। इस तरह की घटना कुछ सीमा तक इब्रानी दाइयों और राहाब के झूठ के जैसी है। एक बुरे संसार में, और एक हताश परिस्थिति में, बहुत अधिक बुराई को रोकने के लिए, कम बुरे झूठ को बोलना सही बात हो सकती है। तथापि, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि ऐसी घटनाएँ अत्यधिक दुर्लभ पाई जाती हैं। यह सम्भावना अधिक है कि मानवीय इतिहास में अधिकांश लोगों ने कभी ऐसी स्थिति का सामना न किया है, जिसमें झूठ बोलना सही था।

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