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प्रश्न

हमारे पुनरुत्थान किए हुए शरीर को कैसे हमारे वर्तमान शरीर से भिन्न किया जाएगा?

उत्तर


कुरिन्थ की कलीसिया को लिखे अपने पहले पत्र में, पौलुस हमारे सांसारिक शरीरों और हमारे पुनरुत्थान किए हुए शरीरों के बीच बड़ी भिन्नताओं की चर्चा करता है (देखें 1 कुरिन्थियों 15:35-57)। हमारे स्वर्गीय (पुनरुत्थित) शरीरों की महिमा के साथ हमारे सांसारिक शरीरों की तुलना में, पौलुस कहता है, "मुर्दों का जी उठना भी ऐसा ही है। शरीर नाशवान् दशा में बोया जाता है और अविनाशी रूप में जी उठता है। वह अनादर के साथ बोया जाता है, और तेज के साथ जी उठता है; निर्बलता के साथ बोया जाता है, और सामर्थ्य के साथ जी उठता है। स्वाभाविक देह बोई जाती है, और आत्मिक देह जी उठती है " (1 कुरिन्थियों 15:42-44, शब्दों को तिरछे लिखने के द्वारा अतिरिक्त जोर दिया गया है)। संक्षेप में, हमारे पुनरुत्थित शरीर आत्मिक, अविनाशी, और महिमा और सामर्थ्य में उठाए जाते हैं।

पहले आदम के माध्यम से, हमने अपने प्राकृतिक शरीरों को प्राप्त किया, जो पूरी तरह से पृथ्वी के पर्यावरण के अनुकूल है। यद्यपि, वे पतन के परिणामस्वरूप विनाशकारी हो गए हैं। अनाज्ञाकारिता के कारण, मानव जाति नाशवान बन गई है। आयु के बढ़ने से बुजुर्ग होना, शारीरिक अवनति, और अन्तिम मृत्यु अब हम सभों को प्रभावित करती है। मिट्टी से हम आए थे, और मिट्टी की ओर ही हम वापस चले जाएंगे (उत्पत्ति 3:19; सभोपदेशक 3:20)। दूसरी ओर, हमारे पुनरुत्थान किए हुए शरीर "अविनाशी रूप में जी उठेंगे।" वे कभी बीमारी, शारीरिक अवनति, सड़न या मृत्यु का अनुभव नहीं करेंगे। और "जब यह नाशवान् अविनाश को पहिन लेगा... तब वह वचन जो लिखा है पूरा हो जाएगा : 'जय ने मृत्यु को निगल लिया'" (1 कुरिन्थियों 15:54)।

पाप में पतन के परिणामस्वरूप, हमें "अनादर के साथ बोया जाता है।" हम मूल रूप से सिद्ध और परमेश्‍वर के स्वरूप में बने थे (उत्पत्ति 1:27), परन्तु पाप हमारे ऊपर अनादर को ले आया। तौभी विश्‍वासियों के पास यह प्रतिज्ञा है कि हमारे अपूर्ण और अनादर पाए हुए शरीर एक दिन महिमा अर्थात् तेज के साथ उठाए जाएंगे। पाप के द्वारा लगाए गए प्रतिबन्धों से मुक्त, हमारे पुनरुत्थित शरीर आदर और अनन्तकाल के लिए हमारे सृष्टिकर्ता को प्रसन्न करने के लिए पूरी तरह उपयुक्त होंगे।

हमारे वर्तमान शरीरों को कमजोरी और दुर्बलता से भी चिह्नित किया जाता है। हमारे सांसारिक "मन्दिर" निर्विवाद रूप से कमजोर हैं और मानव जाति को नष्ट करने वाली बीमारियों की बहुतायत के प्रति अतिसंवेदनशील हैं। हम पाप और प्रलोभन के कारण भी कमज़ोर हैं। एक दिन, यद्यपि, हमारे शरीर सामर्थ्य और महिमा में उठाए जाएंगे, और अब हम उन दोषों और कमजोरियों के अधीन नहीं रहेंगे, जो आज जीवन में व्यापक रूप से पाई जाती हैं।

अन्त में, पुनरुत्थित शरीर आत्मिक होगा। हमारे प्राकृतिक शरीर इस संसार में रहने के लिए उपयुक्त हैं, परन्तु यही एकमात्र क्षेत्र है, जिसमें हम रह सकते हैं। "मांस और लहू परमेश्‍वर के राज्य के अधिकारी नहीं हो सकते" हैं (1 कुरिन्थियों 15:50)। पुनरुत्थान के पश्‍चात् हमारे पास "आत्मिक शरीर" होगा, जो स्वर्ग में रहने के लिए पूरी तरह से उपयुक्त होगा। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम केवल आत्माएँ ही होंगे — आत्माओं के पास शरीर नहीं होता है — परन्तु यह कि हमारे पुनरुत्थित शरीरों को शारीरिक भरण-पोषण की आवश्यकता नहीं होगी या यह जीवन का समर्थन करने के लिए प्राकृतिक साधनों पर निर्भर नहीं होगा।

जब हम यीशु के उत्तोरत्तर-पुनरुत्थान के प्रगटीकरणों को स्मरण करते हैं, तो हमें एक पुनरुत्थान किए हुए शरीर के जैसी झलक मिलती है। उसके पास अभी भी दिखाई देने वाले घाव थे, और उसके शिष्य शारीरिक रूप से उसे स्पर्श कर सकते थे, तौभी वह बिना प्रयास किए यात्रा करने और अपनी इच्छा अनुसार प्रकट होने और लुप्त होने में सक्षम था। वह दीवारों और दरवाजों से आर-पार जा सकता था, तौभी वह भोजन खा सकता था और पानी को पी सकता था और बैठकर बात कर सकता था। पवित्रशास्त्र हमें सूचित करता है कि हमारे "दीन-हीन देह" ठीक उसकी "महिमा की देह" की तरह होंगे (फिलिप्पियों 3:21)। वास्तव में, पाप के द्वारा लगाई गई भौतिक सीमाएँ, जो पृथ्वी पर पूरी तरह से उसकी सेवा करने की हमारी क्षमता में बाधा डालती हैं, सदैव के लिए हमारे द्वारा स्तुति और सेवा करने और अनन्त काल तक महिमा करने के लिए स्वतन्त्र होगी।

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