क्या धर्म क्या अधिकांश युद्धों का कारण है?


प्रश्न: क्या धर्म क्या अधिकांश युद्धों का कारण है?

उत्तर:
यह सुनिश्चित करने के लिए कि अभी तक के इतिहास में प्रकट रूप से कई युद्ध के होने के पीछे धार्मिक कारण रहे हैं, जिसमें कई भिन्न धर्म सम्मिलित थे। उदाहरण के लिए, मसीही विश्‍वास उनमें से एक है, जिसके कारण कई युद्ध हुए हैं (कुछ एक का नाम यहाँ नीचे दिया गया है):

• धर्मयुद्ध — 11वीं से लेकर 13 वीं शताब्दियों तक मुस्लिम आक्रमणकारियों से पवित्र भूमि को फिर से वापस प्राप्त करने और बैन्जटाईन साम्राज्य की सहायता के लिए किए जाने वाले अभियानों की एक श्रृंखला को धर्मयुद्ध कहा गया।

• धर्म के ऊपर फ्रेंच युद्ध — कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट हुगुएनेट के मध्य 16वीं शताब्दी के मध्य फ़्रांस में होने वाले युद्ध

• युद्ध के तीस वर्ष — कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट के मध्य 17वीं शताब्दी के मध्य में उस स्थान पर होने वाला एक और युद्ध जिसे अब जर्मन कहा जाता है।

यह सूची किसी भी प्रकार से पूर्ण नहीं है। इसके अतिरिक्त, एक व्यक्ति उत्तरी आयरलैंड में होने वाली परेशानियों और ताइपिंग विद्रोह को जोड़ सकता है। मसीही विश्‍वास निश्चित रूप से अपने 2,000 वर्षों के इतिहास में कई संघर्षों में एक कारक रहा है।

इस्लाम में, हम जिहाद या "पवित्र युद्ध" की अवधारणा को देखते हैं। जिहाद शब्द का शाब्दिक अर्थ "संघर्ष" से है, परन्तु इस अवधारणा का उपयोग इस्लाम आधारित क्षेत्र के विस्तार और इस्लाम आधारित क्षेत्रों के बचाव में युद्ध के वर्णन के लिए किया गया है। मध्य पूर्व में लगभग आधी शताब्दियों तक निरन्तर युद्ध ने ही निश्चित रूप से इस विचार में योगदान दिया है कि धर्म कई युद्धों का कारण है। संयुक्त राज्य अमेरिका में 11 सितम्बर का आक्रमण अमेरिका नामक "महान शैतान" के विरूद्ध जिहाद के रूप में देखा गया है, जो मुसलमानों की आँखों में मसीही विश्‍वास के लगभग समानार्थी शब्द है। यहूदी धर्म में, यहूदियों ने परमेश्‍वर के आदेश पर पुराने नियम में (विशेष रूप से यहोशू की पुस्तक) में लिखित विजय के युद्ध ने प्रतिज्ञा किए गए देश पर विजय प्राप्त किया था।

यह विषय स्पष्ट होना चाहिए कि धर्म ने निश्चित रूप से मानवीय इतिहास में युद्ध के अधिकांश भाग में भूमिका को अदा किया है। यद्यपि, क्या यह धर्म के आलोचकों द्वारा निर्मित दृष्टिकोण को प्रमाणित करता है कि धर्म स्वयं ही युद्ध का कारण है? जवाब हाँ और नहीं दोनों में है।" एक अर्थ में "हाँ" क्योंकि यह धर्म के रूप में एक द्वितीय कारण है, कम से कम सतही रूप में, धर्म बहुत अधिक संघर्ष के पीछे गतिमान रहा है। यद्यपि, उत्तर "नहीं" इस अर्थ में है कि धर्म कभी युद्ध का प्राथमिक कारण नहीं रहा है।

इस दृष्टिकोण को प्रदर्शित करने के लिए, आइए 20वीं शताब्दी की ओर देखें। सभी वृतान्तों के अनुसार, मानवीय इतिहास में 20वीं शताब्दी अभी तक की सबसे अधिक खून बहाए जाने वाली शताब्दियों से अधिक खूनी रही है। दो विश्‍व युद्ध, जिसका धर्म, यहूदियों के नरसंहार, और रूस, चीन, दक्षिण पूर्व एशिया और क्यूबा में कम्यूनिस्ट अर्थात् साम्यवादी क्रान्तियों के होने से कुछ लेना देना नहीं था, 50-70 करोड़ लोगों की मृत्यु (कुछ 100 करोड़ से ऊपर का अनुमान लगाते हैं) के लिए उत्तरदायी हैं। संघर्ष और जनसंहार में एक बात सामान्य तथ्य यह है कि वे अपने स्वभाव में धार्मिक नहीं अपितु वैचारिक थे। हम इस वाद को आसानी से निर्मित कर सकते हैं कि धर्म की तुलना में विचारधारा के कारण मानवीय इतिहास में अधिक लोगों की मृत्यु हुई है। कम्यूनिस्ट विचारधारा दूसरों के ऊपर शासन करना अनिवार्य समझती है। नाजी विचारधारा को "कमजोर" नस्ल को समाप्त कर देने की आवश्यकता पर जोर देती है। ये अकेली दो विचारधाराएँ ही लाखों लोगों की मृत्यु का कारण बनी हैं, और इनके साथ धर्म का कोई लेना देना नहीं था। वास्तव में, साम्यवाद अपनी परिभाषा के अनुरूप एक नास्तिक विचारधारा है।

धर्म और विचारधारा दोनों ही युद्ध के एक द्वितीय कारक हैं। तथापि, सभी युद्धों का प्राथमिक कारण पाप है। नीचे दिए हुए पवित्रशास्त्र के सन्दर्भों के ऊपर विचार करें:

"तुम में लड़ाइयाँ और झगड़े कहाँ से आ गए? क्या उन सुख-विलासों से नहीं जो तुम्हारे अंगों में लड़ते- भिड़ते हैं? तुम लालसा रखते हो, और तुम्हें मिलता नहीं; इसलिए तुम हत्या करते हो। तुम डाह करते हो, और कुछ प्राप्त नहीं कर पाते; तो तुम झगड़ते और लड़ते हो। तुम्हें इसलिये नहीं मिलता कि माँगते नहीं। तुम माँगते हो और पाते नहीं, इसलिये कि बुरी इच्छा से माँगते हो, ताकि अपने भोग विलास में उड़ा दो" (याकूब 4:1-3)।

"क्योंकि बुरे विचार, हत्या, परस्त्रीगमन, व्यभिचार, चोरी, झूठी गवाही और निन्दा मन ही से निकलती है" (मत्ती 15:19)।

"मन तो सब वस्तुओं से अधिक धोखा देनेवाला होता है, उस में असाध्य रोग लगा है, उसका भेद कौन समझ सकता है" (यिर्मयाह 17:9)।

"यहोवा ने देखा कि मनुष्य की बुराई पृथ्वी पर बढ़ गई है, और उसके मन के विचार में जो कुछ उत्पन्न होता है, वह निरन्तर बुरा ही होता है" (उत्पत्ति 6:5)।

युद्ध के प्राथमिक कारणों के सम्बन्ध में पवित्रशास्त्र की गवाही क्या है? यह हमारा दुष्ट मन है। धर्म और विचारधाराएँ तो मात्र ऐसे साधन हैं, जिसके माध्यम से हम अपने मन की दुष्टता का प्रयोग करते हैं। इस बात पर विचार करना, जैसा कि बहुत से मुखर नास्तिक कहते हैं, यदि हम किसी भी तरह से "धर्म की हमारी अव्यावहारिक आवश्यकता को दूर कर सकते हैं," तो हम किसी भी तरह से एक अधिक शान्तिपूर्ण समाज निर्मित कर सकते हैं, मनुष्य के स्वभाव के बारे में एक गलत दृष्टिकोण होगा। मनुष्य के इतिहास की गवाही यह है कि यदि हम धर्म को हटा देते हैं, तो इसके स्थान पर कोई और बात आ जाएगी, और यह बात कभी भी सकारात्मक नहीं होगी। वास्तविकता यह है कि सच्चा धर्म पतित मनुष्य की जाँच करता रहता है; अन्यथा, जिसके बिना दुष्टता और पाप अपनी सर्वोच्चता में शासन करेंगे।

यहाँ तक कि सच्चे धर्म, मसीही विश्‍वास, के प्रभाव के साथ, हम इस वर्तमान युग में कभी भी शान्ति को नहीं देखेंगे। संसार में ऐसा कोई दिन नहीं होता जब कहीं पर कोई कोई संघर्ष न हो। युद्ध का एकमात्र समाधान शान्ति का राजकुमार, यीशु मसीह है! जब मसीह अपनी प्रतिज्ञा अनुसार वापस आएगा, तो वह इस वर्तमान युग को समाप्त कर देगा और शाश्‍वतकालीन शान्ति को स्थापित करेगा:

"वह जाति जाति का न्याय करेगा, और देश देश के लोगों के झगड़ों को मिटाएगा; और वे अपनी तलवारें पीटकर हल के फाल और भालों को हँसियाँ बनाएँगे; तब एक जाति दूसरी जाति के विरूद्ध फिर तलवार न चलाएगी, न लोग भविष्य में युद्ध की विद्या सीखेंगे" (यशायाह 2:4)।

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