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प्रश्न

1000-वर्षों के राज्य के पश्‍चात् परमेश्‍वर शैतान को क्यों छोड़ देगा?

उत्तर


प्रकाशितवाक्य 20:7–10, "जब हज़ार वर्ष पूरे हो चुकेंगे तो शैतान कैद से छोड़ दिया जाएगा। वह उन जातियों को जो पृथ्वी के चारों ओर होंगी, अर्थात् — गोग और मागोग — को जिनकी गिनती समुद्र की बालू के बराबर होगी, भरमाकर लड़ाई के लिये इकट्ठा करने को निकलेगा। वे सारी पृथ्वी पर फैल कर पवित्र लोगों की छावनी और प्रिय नगर को घेर लेंगी; और आग स्वर्ग से उतरकर उन्हें भस्म करेगी। उन का भरमानेवाला शैतान आग और गन्धक की उस झील में, जिसमें वह पशु और झूठा भविष्यद्वक्‍ता भी होगा, डाल दिया जाएगा; और वे रात दिन युगानुयुग पीड़ा में तड़पते रहेंगे। इस सन्दर्भ में बाइबल शैतान द्वारा प्रेरित एक अन्तिम विद्रोह और विद्रोह पर होने वाली निर्णायक जीत की भविष्यद्वाणी करती है।

सहस्राब्दी के आरम्भ में, केवल कुछ ही विश्‍वासी जीवित रहेंगे (प्रकाशितवाक्य 19:17-21) — जो क्लेशकाल के समय में भी जीवित रहते हैं और जो उसके दूसरे आगमन पर प्रभु के साथ के साथ उठा लिए जाते हैं। यह इतिहास में अद्वितीय शान्ति का समय होगा (यशायाह 2:4; योएल 3:10; मीका 4:3)। यीशु दाऊद के सिंहासन पर बैठेगा, अपनी सारी सृष्टि के ऊपर शासन करेगा। यीशु यह सुनिश्‍चित करेगा कि प्रत्येक व्यक्ति की प्रत्येक आवश्यकता पूरी हो और वह आज के समाज में प्रचलित पाप को सहन नहीं करेगा (भजन 2:7-12; प्रकाशितवाक्य 2:26-29; 19:11-16)। हम "पृथ्वी पर स्वर्ग" के ऐसे समय की कल्पना ही मात्र कर सकते हैं।

ऐसी सम्भावना है कि क्लेशकाल के समय रहने वाले विश्‍वासी नष्ट हो जाएंगे और सहस्राब्दी के राज्य के समय पृथ्वी की जनसँख्या फिर से भर जाएगी। पाप के विनाश के द्वारा जनसँख्या की कमी का होने के कारण, हम कल्पना कर सकते हैं कि सहस्राब्दी के समय जनसँख्या में बहुत बड़ी वृद्धि होगी। सहस्राब्दी के समय में जन्म लेने वाले सभी लोग पृथ्वी पर मसीह के शासन के लाभ और आशीष का आनन्द लेंगे। यद्यपि, वे अभी भी पापी स्वभाव के साथ ही जन्म लेंगे और उन्हें स्वतन्त्र रूप से पश्‍चाताप करना होगा और सुसमाचार पर विश्‍वास करना होगा, व्यक्तिगत रूप से मसीह को उद्धारकर्ता और प्रभु के रूप में उसे चुनना होगा।

सहस्राब्दी के अन्त में, शैतान को अथाह गड्ढे में से छोड़ दिया जाएगा। वह एक बार फिर से अन्तिम विद्रोह में उसके पीछे चलने के लिए एक विशाल भीड़ को धोखा दे देगा। ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे-जैसे क्लेशकाल का समय इतिहास में धुँधला पड़ता चला जाता है उतना ही अधिक मनुष्य अपने शान्तिपूर्ण जीवन के प्रति लापरवाह होता चला जाता है; कुछ तो यहाँ तक कि परमेश्‍वर की भलाई के बारे में भी सन्देह भी कर सकते हैं। यद्यपि शैतान के साथ विद्रोह करने वाली सँख्या को "समुद्र की बालू के बराबर" कहा जाता है (प्रकाशितवाक्य 20:8), तौभी वे विद्रोह नहीं करने वाली सँख्या की तुलना में बहुत कम हो सकती है।

क्योंकि परमेश्‍वर को पता है कि शैतान संसार में (फिर से) परेशानी का कारण बनता है, तौभी वह उसे क्यों छोड़ देता है? पवित्रशास्त्र इसके लिए एक निश्‍चित उत्तर नहीं देता है। यद्यपि, यह मनुष्य के ऊपर अन्तिम परीक्षा देने के कारणों में से एक कारण हो सकता है। 1,000 वर्षों तक, परीक्षा लेने वाले को बाँध दिया जाएगा और पृथ्वी पर अधिकांश प्राणियों को कभी भी आत्मिक क्षेत्र से बाहरी प्रलोभन का अनुभव नहीं होगा। परमेश्‍वर ने मनुष्य को स्वतन्त्र इच्छा के साथ बनाया है और वह अनुमति देता है कि इस इच्छा की परीक्षा की जाए। भविष्य में "सहस्राब्दी में जन्म लेने वाले" — अर्थात् जो सहस्राब्दी वाले राज्य के समय जन्म लेंगे — को अभी भी मसीह का पालन करने या शैतान का पालन करने के लिए एक सचेत विकल्प को चुनने की आवश्यकता होगी।

शैतान को परमेश्‍वर के द्वारा छोड़ दिए जाने का अन्य सम्भव कारण मनुष्य में अन्तर्निहित पाप के स्वभाव की सीमा का प्रदर्शन करना है (यिर्मयाह 17:9 को देखें)। पृथ्वी पर अलौकिक स्वप्नलोक के 1,000 वर्षों के पश्‍चात् भी मनुष्य में विद्रोह करने के लिए एक गुप्त क्षमता बनी रहेगी। शैतान को छोड़ दिए जाने का एक अन्य कारण हमें अभी भी यह शिक्षा दे सकता है कि हम कितनी आसानी से धोखा खा सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे आदम और हव्वा ने अदन की वाटिका में धोखा देने वाले के द्वारा कुछ ही शब्दों के कारण धोखा खा लिया था, वैसे ही आदम और हव्वा के वंशजों की भीड़ ने भी। हम शरीर और लहू हैं और हम धोखे खाने की प्रवृति को रखते हैं।

शैतान को गड्ढे से मुक्त करने में, परमेश्‍वर भी अपने स्वभाव के बारे में कुछ प्रकट करने की मंशा रख सकता है। 1,000 वर्षों तक, उसकी कृपा और भलाई निरन्तर दिखायी जाएगी, परन्तु इस समय के अन्त में, उसमें विद्रोह के प्रति सहनशीलता शून्य के जितनी ही होगी। उनका न्याय उण्डेल दिया जाएगा और वह उन लोगों को "दूसरा अवसर" नहीं देगा जो विद्रोह करना चुनते हैं।

सहस्राब्दी के अन्त में परमेश्‍वर की ओर से शैतान का छोड़ दिया जाना यह भी दिखाएगा कि शैतान सदैव से ही मनुष्य का शत्रु रहा है। जैसा कि परमेश्‍वर ने हमारे ऊपर अपने प्रेम को प्रगट किया है, शैतान में हमारे लिए एक विशेष घृणा है। शैतान के पतन के पश्‍चात् से ही (यशायाह 14, यहेजकेल 28) वह विश्‍वासियों का विरोधी रहा है और उसे उचित ही मनुष्य के लिए अन्तिम धोखेबाज के रूप में वर्णित किया गया है (यूहन्ना 8:44)। वह जो दे सकता है या प्रतिज्ञा करता है, वह केवल मृत्यु और विनाश ही है (यूहन्ना 10:10)। शैतान को प्रकाशितवाक्य 20 में भी वास्तव में पराजित शत्रु के रूप में दिखाया गया है और उसका और जो उसके पीछे चलते है, उनका अन्तिम विनाश निश्‍चित है। शैतान एक निर्मित प्राणी है, जो परमेश्‍वर के सामने शक्तिहीन है।

परमेश्‍वर ने 1000 वर्षों के अन्त में शैतान को क्यों छोड़ दिया? हम और अधिक आसानी से पूछ सकते थे कि परमेश्‍वर ने शैतान को किसी भी तरह की स्वतन्त्रता ही क्यों प्रदान की है, यहाँ तक अभी भी क्यों दी हुई है। इसका उत्तर अन्ततः परमेश्‍वर की प्रभुता सम्पन्न योजना में उसकी महिमा की पूर्णता को प्रकट करने में पाया जाना चाहिए। परमेश्‍वर की संप्रभुता शैतान तक विस्तारित है और परमेश्‍वर अपनी पवित्र योजना को पूर्णता में लाने के लिए यहाँ तक कि — शैतान के बुरे कर्मों — का भी उपयोग करने में सक्षम है (1 तीमुथियुस 1:20 और 1 कुरिन्थियों 5:5 को भी देखें)।

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