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प्रश्न

बाइबल के अनुसार नवजीवन क्या है?

उत्तर


नवजीवन या पुनरुज्जीवन के लिए एक और शब्द फिर से जन्म लेना है, जो कि बाइबल के वाक्यांश "नए जन्म" से सम्बन्धित है। हमारा फिर से जन्म लेना हमारे पहले लिए हुए जन्म से भिन्न है, जब हमने शारीरिक रूप से गर्भ धारण किया था और हमने अपने भीतर पाप के स्वभाव को विरासत में पाया था। नया जन्म आत्मिक, पवित्र और स्वर्गीय जन्म होता है, जिसके परिणामस्वरूप हमें आत्मिक रूप से जीवित बनाया जाता है। जब तक मनुष्य मसीह के द्वारा "जीवित" (पुनरुज्जीवित) नहीं किया जाता, तब तक मनुष्य अपनी स्वाभाविक अवस्था में अपने "अपराधों और पापों में मरा" हुआ है। ऐसा तब होता है, जब वह मसीह में अपना विश्‍वास रखता है (इफिसियों 2:1)।

नवजीवन एक क्रान्तिकारक परिवर्तन है। ठीक वैसे ही जैसे हमारे शारीरिक जन्म ने हमें पृथ्वी के क्षेत्र में प्रवेश कराने का कारण बना वैसे ही हमारे आत्मिक जन्म के परिणामस्वरूप हम स्वर्गीय क्षेत्र में प्रवेश करने वाले एक नए व्यक्ति बन गए हैं (इफिसियों 2:6)। नवजीवन की प्राप्ति के पश्‍चात्, हम ईश्‍वरीय बातों को देखने और सुनने और खोजने को आरम्भ करते हैं; हम विश्‍वास और पवित्रता के जीवन को जीना आरम्भ करते हैं। अब मसीह हमारे मन में आकार लेता है; नई सृष्टि बनाए जाने के कारण हम अब ईश्‍वरीय स्वभाव में सहभागी होते हैं,(2 कुरिन्थियों 5:17)। मनुष्य नहीं अपितु परमेश्‍वर इस परिवर्तन का स्रोत होता है (इफिसियों 2:1, 8)। परमेश्‍वर का महान प्रेम और मुफ्त उपहार, उसका समृद्ध अनुग्रह और बहुतायत वाली दया, नवजीवन का कारण हैं। परमेश्‍वर की शक्तिशाली सामर्थ्य — ऐसी सामर्थ्य जो मसीह को मरे हुओं में से जी उठाती है — पापियों के नवजीवन और मन परिवर्तन में प्रदर्शित होती है (इफिसियों 1:19-20)।

नवजीवन को प्राप्त करना आवश्यक है। पाप से भरा हुआ शरीर परमेश्‍वर की उपस्थिति में खड़ा नहीं हो सकता है। निकुदेमुस के साथ बातचीत में, यीशु ने दो बार कहा है कि परमेश्‍वर के राज्य को देखने के लिए एक व्यक्ति को फिर से जन्म लेना चाहिए (यूहन्ना 3:3, 7)। नवजीवन वैकल्पिक नहीं है, क्योंकि "जो शरीर से जन्मा है, वह शरीर है, जो आत्मा से जन्मा है, वह आत्मा है" (यूहन्ना 3:6)। शारीरिक जन्म हमें पृथ्वी पर रहने के अनुरूप बनाता है; आत्मिक नवजीवन हमें स्वर्ग में रहने के अनुरूप बनाता है। इफिसियों 2:1 को देखें; 1 पतरस 1:23; यूहन्ना 1:13; 1 यूहन्ना 3:9; 4:7; 5:1, 4, 18.

जो कुछ उद्धार के क्षण में परमेश्‍वर हमारे भीतर करता है, नवजीवन उसका भाग है, जिसमें छाप लगाना (इफिसियों 1:14), गोद लेना (गलतियों 4:5), मेल-मिलाप (2 कुरिन्थियों 5:18-20), आदि भी सम्मिलित हैं। नवजीवन में परमेश्‍वर यीशु मसीह में विश्‍वास के करने के परिणामस्वरूप एक व्यक्ति को आत्मिक रूप से जीवित व्यक्ति बनाता है। उद्धार से पहले हम परमेश्‍वर की सन्तान नहीं थे (यूहन्ना 1:12-13); अपितु, हम क्रोध की सन्तान थे (इफिसियों 2:3; रोमियों 5:18-20)। उद्धार से पहले, हम दूषित थे; उद्धार के पश्‍चात् हमने नवजीन को प्राप्त कर लिया है। नवजीवन का परिणाम परमेश्‍वर के साथ शान्ति है (रोमियों 5:1), नया जीवन है (तीतुस 3:5; 2 कुरिन्थियों 5:17), और शाश्‍वतकालीन पुत्रत्वपन है (यूहन्ना 1:12-13; गलतियों 3:26)। नवजीवन ने पवित्रता की प्रक्रिया को आरम्भ कर दिया है, जिसमें हम उस तरह के लोग बन जाते हैं, जैसा बनने की इच्छा परमेश्‍वर रखता है (रोमियों 8:28-30)।

नवजीवन की प्राप्ति का एकमात्र साधन क्रूस पर मसीह के समाप्त हुए काम में विश्‍वास से है। अच्छे कामों या व्यवस्था की कितनी भी मात्रा एक नवीनीकृत मन को उत्पन्न नहीं कर सकती है। "क्योंकि व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी उसके सामने धर्मी नहीं ठहरेगा, इसलिये कि व्यवस्था के द्वारा पाप की पहिचान होती है।" (रोमियों 3:20)। केवल मसीह ही मानव मन की पूर्ण भ्रष्टता की चंगाई को प्रदान करता है। हमें नवीनीकरण या सुधार या पुनर्गठन की आवश्यकता नहीं है; हमें नवजीवन या पुनरुज्जीवन की आवश्यकता है।

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