सुधारित धर्मविज्ञान क्या है?



प्रश्न: सुधारित धर्मविज्ञान क्या है? प्रार्थना करने की क्या आवश्यकता है जब परमेश्वर भविष्य को जानता है और सब कुछ उसके नियन्त्रण में है। यदि हम परमेश्वर के मन को परिवर्तित नहीं कर सकते हैं, तो हमें प्रार्थना क्यों करनी चाहिए?

उत्तर:
विस्तृत रूप में कहना, सुधारित धर्मविरज्ञान में ऐसी कोई भी विश्‍वास पद्धति सम्मिलित है, जो मूल रूप से 16वीं सदी के प्रोटेस्टेन्ट धर्मसुधार के ऊपर आधारित है। इसमें कोई सन्देह नहीं है, कि धर्मसुधारकों ने स्वयं अपने धर्मसिद्धान्तों को पवित्रशास्त्र से प्राप्त होना पाया, जैसा कि उनके विश्‍वास कथन "एकमात्र पवित्रशास्त्र" से इंगित होता है, इस प्रकार सुधारित धर्मविज्ञान एक "नई" विश्‍वास पद्धति नहीं है, अपितु यह प्रेरितों के धर्मसिद्धान्त को आगे बढ़ाने की लालसा रखती है।

सामान्यत:, सुधारित धर्मविज्ञान की मान्यता पवित्रशास्त्र के अधिकार, परमेश्‍वर की सर्वोच्चता, मसीह के द्वारा अनुग्रह से उद्धार, और उद्धार की आवश्यकता के ऊपर टिकी हुई है। इसे कई बार वाचा आधारित धर्मविज्ञान कह कर पुकारा जाता है, क्योंकि यह परमेश्‍वर के द्वारा आदम के साथ बाँधी हुई वाचा और उस नई वाचा के ऊपर जोर देती है, जो यीशु मसीह के द्वारा हम तक पहुँची (लूका 22:20)।

पवित्रशास्त्र का अधिकार — सुधारित धर्मविज्ञान यह शिक्षा देता है कि बाइबल परमेश्‍वर की प्रेरणा से रचा हुआ और अधिकारिक वचन, यह जीवन के सभी विषयों और व्यवहार में लागू किए जाने के लिए पर्याप्त है।

परमेश्‍वर की सर्वोच्चता — सुधारित धर्मविज्ञान शिक्षा देता है कि परमेश्‍वर पूरी सृष्टि को अपने पूर्ण नियंत्रण में लिए हुए इसके ऊपर शासन करता है। उसने सभी घटनाओं को पहले से ही ठहरा दिया है, और इसलिए वह किसी भी परिस्थिति के कारण कभी भी हताश नहीं होता है। ऐसा करना किसी भी रीति से सृजे हुए प्राणियों की इच्छा को सीमित नहीं करता है, न ही यह किसी भी रीति से परमेश्‍वर को पाप का लेखक बनाता है।

अनुग्रह के द्वारा उद्धार — सुधारित धर्मविज्ञान शिक्षा देता है कि परमेश्‍वर ने अपने अनुग्रह और दया में उसके निमित्त लोगों को छुटकारा प्रदान करने के लिए चुनते हुए, उन्हें पाप और मृत्यु से छुड़ा लिया है। उद्धार का सुधारित धर्मसिद्धान्त को सामान्य रूप से त्यूलीप अर्थात् पबसअस (जिन्हें केल्विनवाद की पाँच शिक्षाओं के नाम से भी जाना जाता है) अक्षरबद्ध शब्दों के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है:

प — पूर्ण भ्रष्टता — मनुष्य सामान्य रूप से अपनी पापपूर्ण अवस्था के कारण पूर्ण रीति से असहाय होते हुए, परमेश्‍वर के क्रोध के अधीन है और वह किसी भी तरह से परमेश्‍वर को प्रसन्न नहीं कर सकता है। पूर्ण भ्रष्टता का अर्थ यह भी है कि मनुष्य स्वाभाविक रीति से परमेश्‍वर की खोज तब तक नहीं कर सकता है जब तक परमेश्‍वर अपनी कृपालुता में उसे ऐसा करने का अवसर नहीं देता (उत्पत्ति 6:5; यिर्मयाह 17:9; रोमियों 3:10-18)।

ब — बिना शर्त के चुना जाना — अतीत के शाश्‍वकाल में ही परमेश्‍वर ने, पापियों के एक बहुत बड़ी भीड़ को उद्धार के निमित्त चुन लिया था, जिस की गिनती कोई मनुष्य नहीं कर सकता (रोमियों 8:29-30; 9:11; इफिसियों 1:4-6,11-12)।

स — सीमित प्रायश्चित — इसे साथ ही "विशेष छुटकारा" कह कर भी पुकारा जाता है। मसीह ने चुने हुओं के पापों के दण्ड को अपने ऊपर ले लिया और परिणामस्वरूप उनके जीवनों के बचाव के लिए अपनी मृत्यु के द्वारा जुर्माने की अदायगी कर दी। दूसरे शब्दों में, उसने ऐसे ही उद्धार को "सम्भव" नहीं कर दिया, उसने इसे वास्तव में उनके लिए प्राप्त कर लिया जिसको उसने चुना हुआ था (मत्ती 1:21; यूहन्ना 10:11; 17:9; प्रेरितों के काम 20:28; रोमियों 8:32; इफिसियों 5:25)।

अ- अनुग्रह की प्रबलता — अपनी पतित अवस्था में, मनुष्य परमेश्‍वर के प्रेम का विरोध करता है, परन्तु उसके हृदय में कार्य करता हुआ परमेश्‍वर का अनुग्रह उसमें उसी बात की इच्छा को उत्पन्न करता है, जिसका उसने पहले विरोध किया था। अर्थात्, परमेश्‍वर का अनुग्रह उसके चुनों हुओं के लिए बचाने के कार्य के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए असफल नहीं होगा (यूहन्ना 6:37,44; 10:16)।

स — सन्तों का दृढ़ बने रहना — परमेश्‍वर उसके सन्तों को पाप में गिरने से बचाता है; इस प्रकार उद्धार शाश्‍वतकालीन है (यूहन्ना 10:27-29; रोमियों 8:29-30; इफिसियों 1:3-14)।

सुसमाचार प्रचार की आवश्यकता — सुधारित धर्मविज्ञान शिक्षा देता है कि मसीही विश्‍वासी इस संसार में, सुसमाचार प्रचार के द्वारा आत्मिकता और समाज में पवित्र जीवन यापन करने और मानवता से भरे हुए कार्यों के द्वारा भिन्नता को लाने के लिए हैं।

सुधारित धर्मविज्ञान की अन्य विशेषताओं में सामान्य रूप से दो पवित्र संस्कारों (बपतिस्मा और प्रभु भोज) का पालन किया जाना, आत्मिक वरदानों के प्रति विरामवादी दृष्टिकोण (अर्थात् वरदान कलीसिया से आगे और अधिक विस्तारित नहीं किए गए हैं), पवित्रशास्त्र का गैर-युगवादी दृष्टिकोण इत्यादि का होना सम्मिलित है। सुधारित कलीसियाओं में जॉन कॉल्विन, जॉन नोक्स, उलरिच ज्विन्गली और मार्टिन लूथर के विचारों की बहुत अधिक मान्यता है। वेस्टमिंस्टर विश्‍वास कथन धर्मविज्ञान की सुधारित परम्परा का प्रतीक है। सुधारवादी परम्पराओं की आधुनिक कलीसियाओं में प्रेसबिटेरियन, कांग्रिगेशनलवादी और कुछ बैपटिस्ट इत्यादि सम्मिलित हैं।



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