बाइबल में सबसे प्रसिद्ध/महत्वपूर्ण प्रश्‍न कौन सा है?


प्रश्न: बाइबल में सबसे प्रसिद्ध/महत्वपूर्ण प्रश्‍न कौन सा है?

उत्तर:
बाइबल में बहुत सारे प्रश्‍न पाए जाते हैं। एक सटीक सँख्या देना कठिन है क्योंकि प्राचीन इब्रानी और कोइने यूनानी में विराम चिह्न का उपयोग नहीं किया जाता था- हम मात्र मृत सागर कुण्डल पत्रों को ही नहीं ले सकते हैं और प्रश्‍न चिह्नों की गणना नहीं कर सकते हैं! अक्सर, यह जानना कठिन होता है कि क्या वास्तव में एक वाक्य को प्रश्‍न के रूप में लिखा गया है। परन्तु बाइबल के विद्वानों का अनुमान है कि बाइबल में लगभग 3,300 प्रश्‍न हैं।

बाइबल में प्रश्नों की यह सूची निश्‍चित रूप से पूर्ण नहीं है। यहाँ पर बाइबल में कुछ सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण प्रश्नों का एक सरल सा सर्वेक्षण दिया गया है।

"क्या सच है कि परमेश्‍वर ने कहा...?" (उत्पत्ति 3:1)
यह बाइबल में दिया गया सबसे पहला प्रश्‍न है और पहला उदाहरण जो किसी के द्वारा परमेश्‍वर के वचन पर प्रश्‍न को पूछने के बारे में है। शैतान परमेश्‍वर के वचन पर सन्देह करने के लिए हव्वा को परीक्षा में डाल देता है। हव्वा परमेश्‍वर के वचन के साथ जोड़ते हुए उत्तर देती है: "और न उसको छूना।" परमेश्‍वर ने कहा है कि उस वृक्ष से नहीं खाना है। उसने यह नहीं कहा कि वे उस वृक्ष या उसके फल को छू नहीं सकते थे। आदम और हव्वा ने परमेश्‍वर के वचन की आज्ञा की अवहेलना करके शैतान के प्रश्‍न का उत्तर दिया। इसका आरम्भ एक छोटे से प्रश्‍न के साथ हुआ।

"तू कहाँ है?" (उत्पत्ति 3:9)
बाइबल में परमेश्‍वर के द्वारा पूछा गया यह सबसे पहला प्रश्‍न है। नि:सन्देह, परमेश्‍वर को पता था कि आदम और हव्वा शारीरिक रूप से उपस्थित थे। तथापि प्रश्‍न उनके लाभ के लिए ही था। परमेश्‍वर अनिवार्य रूप से पूछ रहा था, "तुमने मेरी आज्ञा अवहेलना की। क्या बातें वैसे ही घटित हुईं जैसे तुम चाहते थे या वैसी घटित हुई जैसी मैंने भविष्यद्वाणी की थी? "यह प्रश्‍न परमेश्‍वर के मन को भी दिखाता है, जिसके पास चरवाहे का मन है, ताकि खोई हुई भेड़ों को ढूँढने के लिए आया उन्हें अपने खत्ते में वापस ला सके। बाद में यीशु "खोए हुओं को ढूँढने और उनका उद्धार करने" आएगा (लूका 19:10)।

"क्या मैं अपने भाई का रखवाला हूँ?" (उत्पत्ति 4:9)
यह कैन के द्वारा परमेश्‍वर के द्वारा हाबिल कहाँ है प्रश्‍न के प्रत्युत्तर में दिया गया उत्तर था। इस तथ्य से परे कि कैन ने अभी अपने भाई की हत्या कर दी थी, कैन उस भावना को व्यक्त कर रहा था, जो हम सभों में पाई जाती है, जब हम दूसरे लोगों की देखभाल नहीं करना चाहते हैं। क्या हम अपने भाई के रखवाले हैं? हाँ हम हैं। क्या इसका अर्थ यह है कि हमें यह जानना है कि वे कहाँ हैं और वे हर समय क्या कर रहे हैं? नहीं, परन्तु जब हमें कुछ गलत प्रतीत होता है, तो हमें अन्य लोगों में पर्याप्त निवेश को करना चाहिए। यदि आवश्यक हो, तो हमें हस्तक्षेप करने के द्वारा उनकी पर्याप्त देखभाल करनी चाहिए।

"क्या सारी पृथ्वी का न्यायी न्याय न करे?" (उत्पत्ति 18:25)
हाँ, पृथ्वी का न्यायी सदैव सही ही करता है। अब्राहम ने इस प्रश्‍न को पूछने के द्वारा परमेश्‍वर से आग्रह किया कि वह धर्मी को छोड़ दे और उन्हें न्याय से बचाए। यदि परमेश्‍वर कुछ करता है तो यदि यह अन्यायपूर्ण जान पड़ता है, तो हम इसे गलत समझ रहे हैं। जब हम परमेश्‍वर के न्याय पर प्रश्‍न करते हैं, तो ऐसा इसलिए होता है क्योंकि न्याय की हमारी भावना विकृत हो चुकी है। जब हम कहते हैं, "मुझे समझ में नहीं आता कि कैसे एक अच्छा और न्यायी परमेश्‍वर इसके होने की अनुमति दे सकता है, "ऐसा इसलिए है क्योंकि हम सही ढंग से समझ नहीं पाए हैं इसका अर्थ क्या है कि अच्छा और न्यायी परमेश्‍वर कौन है। बहुत से लोग सोचते हैं कि उन्हें परमेश्‍वर की तुलना में न्याय की समझ अधिक है।

"क्या तू अब भी अपनी खराई पर बना है? परमेश्‍वर की निन्दा कर, और चाहे मर जाए तो मर जा!" (अय्यूब 2:9)
अय्यूब की पूरी पुस्तक में अय्यूब की पत्नी के द्वारा किया हुआ यह प्रश्‍न गूँजता रहता है। इसके माध्यम से, अय्यूब ने अपनी निष्ठा को बनाए रखा। अय्यूब के "मित्र" बार-बार कहते हैं, "अय्यूब, तूने परमेश्‍वर के विरूद्ध वास्तव में अवश्य ही कुछ बुरा किया होगा।" परमेश्‍वर अय्यूब के मित्रों को अय्यूब के ऊपर आक्रमण करने के लिए ताड़ना देता और परमेश्‍वर की प्रभुता सम्पन्न इच्छा पर कल्पना करने के लिए अय्यूब के मित्रों को दण्डित करता है। तब परमेश्‍वर उसे स्मरण दिलाकर अय्यूब को दण्डित करता है कि केवल परमेश्‍वर ही उसके सभी तरीकों से परिपूर्ण है। परमेश्‍वर की महानता की प्रस्तुति में सम्मिलित कई प्रश्‍न पाए जाए हैं जैसे: "जब मैं ने पृथ्वी की नींव डाली, तब तू कहाँ था?" (अय्यूब 38:4)।

"यदि मनुष्य मर जाए तो क्या वह फिर जीवित होगा?" (अय्यूब 14:14, हिन्दी बाइबल)
हमारे जीवनकाल में मसीह की वापसी को छोड़कर, हम सभी किसी दिन भी मर जाएंगे। क्या मृत्यु के बाद जीवन है? अपने जीवन के किसी बिन्दु पर इस प्रश्‍न के बारे में सभी लोग आश्‍चर्य करते हैं। हाँ, मृत्यु के पश्‍चात् जीवन है, और हर कोई इसका अनुभव करेगा। यह केवल एक सरल सी बात है कि हम कहाँ विद्यमान होंगे। क्या सभी मार्ग परमेश्‍वर की ओर ले जाते हैं? एक तरह से, हाँ। मरने के पश्‍चात् हम सभी परमेश्‍वर के सामने खड़े होंगे (इब्रानियों 9:27)। यह बात कोई अर्थ नहीं रखती है कि आप कौन से मार्ग पर चलना चुनते हैं, आपकी मुलाकात मृत्यु उपरान्त परमेश्‍वर के साथ होगी । "जो भूमि के नीचे सोए रहेंगे उन में से बहुत से लोग जाग उठेंगे, कितने तो सदा के जीवन के लिये, और कितने अपनी नामधराई और सदा तक अत्यन्त घिनौने ठहरने के लिये" (दानिय्येल 12:2)।

"जवान अपनी चाल को किस उपाय से शुद्ध रखे? तेरे वचन के अनुसार सावधान रहने से?" (भजन संहिता 119:9)
उत्तर: परमेश्‍वर के वचन के अनुसार जीवन यापन करने के द्वारा। जब हम अपने मन में परमेश्‍वर के वचन को "छिपा" हैं, तो वचन हमें पाप से बचाता है (भजन संहिता 119:11)। बाइबल हमें सब कुछ नहीं बताती है। इसमें प्रत्येक प्रश्‍न का उत्तर नहीं है। परन्तु बाइबल हमें मसीही जीवन को जीने के लिए जो कुछ जानने की आवश्यकता है उसे अवश्य बताती है (2 पतरस 1:3)। परमेश्‍वर का वचन हमें अपना उद्देश्य बताता है और हमें उस उद्देश्य को पूरा करने का निर्देश देता है। बाइबल हमें साधन और अन्त भी प्रदान करती है। परमेश्‍वर का वचन "उपदेश, और समझाने, और सुधारने, और धार्मिकता की शिक्षा के लिये लाभदायक है, ताकि परमेश्‍वर का जन सिद्ध बने, और हर एक भले काम के लिये तत्पर हो जाए।" (2 तीमुथियुस 3:16-17)।

"मैं किसको भेजूँ, और हमारी ओर से कौन जाएगा?" (यशायाह 6:8)
सही उत्तर को यशायाह के द्वारा बोला गया है: "मैं यहाँ हूँ! मुझे भेज!" बहुत बार, हमारा उत्तर, "मैं यहाँ हूँ — परन्तु किसी और को भेज" होता है। यशायाह 6:8 विश्‍वव्यापी मिशन के सम्बन्ध में उपयोग किए जाने वाला एक लोकप्रिय वचन है। परन्तु, अपने सन्दर्भ में, परमेश्‍वर किसी को दूसरे ग्रह की ओर यात्रा करने के लिए नहीं कह रहा था। परमेश्‍वर किसी को इस्राएलियों को अपना सन्देश देने के लिए कह रहा था। परमेश्‍वर चाहता था कि यशायाह उन लोगों को सच्चाई घोषित करे जिसे वह हर दिन, अपने लोगों, अपने परिवार, पड़ोसियों, अपने मित्रों के रूप में देखता था।

"हे प्रभु, यदि मेरा भाई अपराध करता रहे, तो मैं कितनी बार उसे क्षमा करूँ? क्या सात बार तक?" (मत्ती 18:21)
क्षमा देना कठिन होता है। सात-गुना बार क्षमा के लिए पतरस का सुझाव कदाचित् उसे, अत्यधिक अनुग्रहकारी, दयालु होने जैसा प्रतीत हो रहा होगा। यीशु के उत्तर से पता चला कि हमारी क्षमा कितनी कमजोर है। हमें क्षमा करना है क्योंकि परमेश्‍वर ने हमें बहुत अधिक क्षमा किया है (कुलुस्सियों 3:13)। हम क्षमा इसलिए नहीं करते क्योंकि एक व्यक्ति इसकी प्राप्ति के योग्य होता है। "योग्य" का अनुग्रह से कोई लेना देना नहीं है। हम क्षमा इसलिए करते हैं क्योंकि ऐसा करना सही बात है। वह व्यक्ति हमारी क्षमा के योग्य नहीं हो सकता है, परन्तु हम भी तो परमेश्‍वर की क्षमा के योग्य नहीं थे, और परमेश्‍वर ने हमें ऐसे ही क्षमा कर दिया।

"फिर यीशु के साथ मैं क्या करूँ?" (मत्ती 27:22)
यीशु के मुकदमे के लिए इकट्ठी हुई भीड़ से पिलातुस ने यह प्रश्‍न पूछा था। उनका उत्तर: "उसे क्रूस पर चढ़ा दे!" कुछ दिन पहले उनका चिल्लाना अलग था: "दाऊद के सन्तान को होशाना, धन्य है वह जो प्रभु के नाम से आता है, आकाश में होशाना! "(मत्ती 21:9)। यह आश्‍चर्यजनक है कि कैसे न पूरी हुई अपेक्षाएँ और साथियों का दबाव सार्वजनिक सोच को परिवर्तित कर सकता है। पहली-शताब्दी में यरूशलेम में, जिन लोगों में यीशु और उसके मिशन के बारे में गलत विचार था, उन्होंने उसका अस्वीकार कर दिया था; इसलिए, आज भी, जो लोग मसीही विश्‍वास में इस गलत समझ के साथ आते हैं, कि मसीह कौन है, वे अन्ततः उससे दूर चले जाएंगे। हमें यह सुनिश्‍चित करना होगा कि हम सटीक रूप से यह प्रस्तुत करें कि यीशु कौन है और जब हम अपना विश्‍वास साझा करते हैं तो मसीही विश्‍वास क्या है।

"परन्तु तुम मुझे क्या कहते हो?" (मत्ती 16:15)
यीशु की ओर से आने वाला यह प्रश्‍न सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नों में एक है कि एक व्यक्ति इसका क्या उत्तर देगा। अधिकांश लोगों के लिए, वह एक अच्छा शिक्षक है। कुछ के लिए वह एक भविष्यद्वक्ता है। दूसरों के लिए वह एक किंवदन्ती मात्र है। पतरस का उत्तर, "तू जीवते परमेश्‍वर का पुत्र मसीह है," ही सही उत्तर है (मत्ती 16:16)।

"यदि मनुष्य सारे जगत को प्राप्‍त करे और अपने प्राण की हानि उठाए, तो उसे क्या लाभ होगा?" (मरकुस 8:36)
यदि एक व्यक्ति को अपने प्राणों की हानि उठानी पड़ती है — तब जो कुछ प्राप्त किया गया है — यहाँ तक कि पूरा संसार भी — तो उसके लिए कुछ भी लाभ की बात नहीं है। दु:ख की बात है, "कुछ भी नहीं" ही वह बात है, जिसके लिए लोगों की विशाल बहुमत — इस संसार की वस्तुओं की खोज के लिए प्रयासरत् है। एक व्यक्ति के द्वारा अपने प्राणों की हानि उठाने के दो अर्थ हैं। सबसे पहले, अधिक स्पष्ट अर्थ यह है कि कोई अपनी आत्मा को अनन्तकाल के लिए ही खो देता है, नरक में अनन्त मृत्यु का अनुभव करता है। यद्यपि, पूरी संसार को प्राप्त करने की आपकी खोज आपको अपनी आत्मा को एक भिन्न तरीके से खो देने का कारण बन जाएगी। आप यीशु मसीह के माध्यम से उपलब्ध बहुतायात के जीवन का अनुभव कभी नहीं करेंगे (यूहन्ना 10:10)। सुलैमान ने इस संसार के आनन्द का पीछा किया और स्वयं के लिए सब कुछ का इन्कार कर दिया, तौभी भी उसने ऐसे कहा है कि, "सब कुछ व्यर्थ और वायु को पकड़ना है, और संसार में कोई लाभ नहीं" (सभोपदेशक 2:10-11)।

"हे उत्तम गुरु, अनन्त जीवन का अधिकारी होने के लिये मैं क्या करूँ?" ( लूका 18:18) और "उद्धार पाने के लिये मैं क्या करूँ?" (प्रेरितों के काम 16:30)
यीशु और पौलुस के द्वारा दी गई भिन्न प्रतिक्रियाओं को जो कि एक ही जैसे महत्वपूर्ण प्रश्‍न के लिए है, अत्यन्त रूचिपूर्ण था। यीशु, धनी युवा सरदार की स्वय-को-धर्मी ठहराने वाली मानसिकता को जानते हुए, आज्ञाओं का पालन करने के लिए कहता है। उस जवान ने सोचा कि वह धर्मी था; यीशु जानता था कि भौतिकवाद और लालच उस व्यक्ति को उद्धार की खोज करने से रोक रहा था। उस जवान को सबसे पहले यह समझने की आवश्यकता थी कि वह एक ऐसा पापी था जिसे उद्धारकर्ता की आवश्यकता थी। पौलुस, यह जानते हुए कि फिलप्पियों की जेल का दरोगा बचाया जाने के लिए तैयार था, ऐसे घोषित करता है कि, "प्रभु यीशु मसीह पर विश्‍वास कर, तो तू और तेरा घराना उद्धार पाएगा।" दरोगा का मानना था, और उसके परिवार ने यीशु को उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करने में उसका अनुसरण किया। इसलिए, यह पहचानते हुए कि कोई व्यक्ति अपनी आत्मिक यात्रा में कहाँ है, इस बात को प्रभावित करता है कि हम किसी के प्रश्नों का उत्तर कैसे दे सकते हैं और सुसमाचार की हमारी प्रस्तुति में आरम्भिक बिन्दु को परिवर्तित कर सकते हैं।

"मनुष्य जब बूढ़ा हो गया, तो कैसे जन्म ले सकता है? क्या वह अपनी माता के गर्भ में दूसरी बार प्रवेश करके जन्म ले सकता है!" (यूहन्ना 3:4)
यह प्रश्‍न निकुदेमुस की ओर से आया था जब यीशु ने उसे बताया कि उसे फिर से जन्म लेने की आवयकता के बारे में बताया। लोग आज भी गलत समझते हैं कि फिर से जन्म लेने का अर्थ क्या है। अधिकांश लोग समझते हैं कि फिर से जन्म लेना दूसरी बार शारीरिक रूप से जन्म लेने का सन्दर्भ नहीं है। यद्यपि, अधिकांश इस शब्द के पूर्ण निहितार्थ को समझने में असफल रहते हैं। एक मसीही विश्‍वासी बनना — नया जन्म लेना — एक पूरी तरह से नए जीवन का आरम्भ करना है। यह आत्मिक मृत्यु की अवस्था से आत्मिक जीवन की अवस्था की ओर जाना है (यूहन्ना 5:24)। यह एक नई सृष्टि बनना है (2 कुरिन्थियों 5:17)। नए जन्म को लेना का अर्थ आपके वर्तमान जीवन में कुछ नहीं जोड़ने से है; यह मूल रूप से आपके वर्तमान जीवन को उग्र सुधारवादी जीवन में बदलने से है।

"तो हम क्या कहें? क्या हम पाप करते रहें कि अनुग्रह बहुत हो?" (रोमियों 6:1)
हम अनुग्रह से बचाए जाते हैं (इफिसियों 6:8)। जब हम यीशु मसीह में अपना विश्‍वास रखते हैं, तो हमारे सभी पाप क्षमा हो जाते हैं और हमें स्वर्ग में अनन्त जीवन को पाने की गारंटी मिलती है। मुक्ति परमेश्‍वर के अनुग्रह का उपहार है। क्या इसका अर्थ यह है कि एक मसीही विश्‍वासी जो भी चाहे वह करे तौभी वह बचा हुआ बना रह सकता है? हाँ, ऐसा ही है। परन्तु एक सच्चा मसीही विश्‍वासी ऐसे नहीं जीएगा "यद्यपि वह ऐसा जीना चाहता है।" एक मसीही विश्‍वासी के पास अब एक नया स्वामी है और वह स्वयं की सेवा अब आगे के लिए नहीं करता है। । एक मसीही विश्‍वासी आत्मिक, प्रगतिशील रूप से, नए जीवन में आगे की ओर बढ़ेगा जिसे परमेश्‍वर ने उसे दिया है। अनुग्रह पाप करने के लिए अनुशंसा पत्र अर्थात् लाइसेंस नहीं है। एक व्यक्ति के जीवन में स्वेच्छा से, न पश्‍चाताप किया हुआ पाप अनुग्रह को ठट्ठों में उड़ाने जैसा है और यह उस व्यक्ति के उद्धार के होने पर सन्देह व्यक्त करता है (1 यूहन्ना 3:6)। हाँ, एक मसीही विश्‍वासी के जीवन में विफलता और विद्रोह के समय होते हैं। और इस ओर की महिमा के लिए पापहीन पूर्णता को प्राप्त करना सम्भव नहीं है। परन्तु मसीही विश्‍वासी परमेश्‍वर के अनुग्रह के प्रति कृतज्ञता से जीवन यापन करता है, वह परमेश्‍वर के अनुग्रह को व्यर्थ में नहीं लेता है। व्यभिचार में पकडी गई स्त्री को बोले गए यीशु के शब्दों में संतुलन मिलता है। उसने उसे दोषी ठहराने से इन्कार करने के बाद, उससे कहा, "जा, अब फिर पाप न करना" (यूहन्ना 8:11)।

"यदि परमेश्‍वर हमारी ओर है, तो हमारा विरोधी कौन हो सकता है?" (रोमियों 8:31)
परमेश्‍वर की सन्तान इस संसार में विरोध का सामना करेगी (यूहन्ना 15:18)। शैतान और उसकी दुष्टात्माएँ हमारा विरोध करती हैं। संसार में कई लोग हमारा विरोध करते हैं। संसार के दर्शन सिद्धान्त, मूल्य और प्राथमिकताएँ हमारे विरोध में खड़ी हैं। हमारे सांसारिक जीवन के सन्दर्भ में, हम जयवन्त, पराजित, यहाँ तक कि मारे भी जा सकते हैं। परन्तु, अनन्त काल के विषय में, परमेश्‍वर की प्रतिज्ञा यह है कि हम जयवन्त होंगे (1 यूहन्ना 5:4)। इस संसार में कदाचित् ऐसी कौन सी बुरी बात हमारे साथ घटित हो सकती है? कदाचित् मृत्यु। उन लोगों के लिए जिन्हेंने परमेश्‍वर से जन्म लिया है, उनके लिए मृत्यु के पश्‍चात् क्या होता है? कल्पना की जाने वाली सबसे महिमामयी स्थान उनके लिए अनन्त काल का जीवन है।

बाइबल में कई अन्य बड़े प्रश्‍न पाए जाते हैं। सत्य की खोज करने वालों की ओर से प्रश्‍न, बातों को उपहास में उड़ाने वालों की ओर से प्रश्‍न, निराश हो चुके विश्‍वासियों की ओर से प्रश्‍न, और परमेश्‍वर की ओर से आने वाले प्रश्‍न हो सकते हैं। प्रश्‍न पूछने से न डरें, परन्तु जब उत्तर आता है तो परमेश्‍वर के उत्तर को स्वीकार करने के लिए तैयार रहें।

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