क्या उद्धार के लिए सार्वजनिक अंगीकार आवश्यक है रोमियों 10:9-10?


प्रश्न: क्या उद्धार के लिए सार्वजनिक अंगीकार आवश्यक है रोमियों 10:9-10?

उत्तर:
रोमियों 10:9-10 का उपयोग मसीह में विश्‍वास करने के लिए किसी भी व्यक्ति के लिए सही-अर्थों वाले मसीहियों के द्वारा किया जाता है। "कि यदि तू अपने मुँह से 'यीशु को प्रभु' जानकर अंगीकार करे, और अपने मन से विश्‍वास करे कि परमेश्‍वर ने उसे मरे हुओं में से जिलाया, तो तू निश्‍चय उद्धार पाएगा। क्योंकि धार्मिकता के लिये मन से विश्‍वास किया जाता है, और उद्धार के लिये मुँह से अंगीकार किया जाता है।"

इस अनुच्छेद से हमें यह नहीं समझना चाहिए कि हम ऊँची आवाज वाले विश्‍वास के अंगीकार के द्वारा बचाए जाते हैं। हम जानते हैं कि उद्धार विश्‍वास के द्वारा अनुग्रह से आता है (इफिसियों 2:8-9), उद्धार के लिए अंगीकार के शब्दों को हम बोलते हैं, यह कामों से नहीं आता है। इसलिए, जैसा कि पवित्रशास्त्र के साथ है, यदि हम रोमियों 10 को सही तरीके से समझना चाहते हैं, तो सन्दर्भ विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है।

रोमियों की पुस्तक के लिखे जाने के समय, एक व्यक्ति के लिए मसीह को स्वीकार करने और उसे प्रभु के रूप में स्वीकार करना परिणाणस्वरूप उसके लिए सामान्य रूप से सताव और यहाँ तक मृत्यु को ले आता था। उस समय, मसीह को अपनाना और उसे प्रभु के रूप में स्वीकार करना इस जानकारी के साथ होता था, कि सताव का आना निश्‍चित था, जो कि सच्चे उद्धार और पवित्र आत्मा के कार्य का संकेत था। विश्‍वास के लिए मुँह से बोले गए बाहरी शब्द अत्यन्त दुर्लभ होते हैं, जब एक व्यक्ति का जीवन दाव पर लगा होता था, और ऐसा आरम्भिक कलीसिया की तुलना में कहीं और नहीं होता है। वाक्यांश "तू बचाया जाएगा" का उद्देश्य उद्धार के लिए विश्‍वास वचन में सार्वजनिक अंगीकार को किए जाने के शर्त को प्रगट करने की मंशा से नहीं था, अपितु यह एक निश्‍चित तथ्य है कि मृत्यु का सामना करने वाला कोई भी व्यक्ति मसीह को प्रभु के रूप में स्वीकार नहीं करेगा जब तक कि वह वास्तव में बचाया नहीं जाता है।

रोमियों 10:10 में, हम पढ़ते हैं कि, "क्योंकि धार्मिकता के लिये मन से विश्‍वास किया जाता है, और उद्धार के लिये मुँह से अंगीकार किया जाता है।" मूल यूनानी में मुँह के साथ "पुष्टि" किए जाने का विचार पाया गया है, जो कुछ मन में घटित हुआ है और जिसके लिए एक व्यक्ति आभारी है।

रोमियों 10:13 कहता है कि, "जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा।" यद्यपि, वचन 14 इंगित करता है कि परमेश्‍वर की बुलाहट उन लोगों के लिए सौभाग्य है, जिन्हें पहले से ही छुड़ा लिया गया है: "फिर जिस पर उन्होंने विश्‍वास नहीं किया, वे उसका नाम कैसे लें?" इसके पहले, वचन 12 में कहा गया है कि, "यहूदियों और यूनानियों में कुछ भेद नहीं, इसलिये कि वह सब का प्रभु है और अपने सब नाम करनेवालों के लिये उदार है। स्पष्ट है कि वाक्यांश "सब नाम करनेवालों के लिये उदार है" उद्धार की बात नहीं कर रहा है, क्योंकि जो लोग उसे "पुकारते" हैं, वे वचन 14 के अनुसार पहले से ही "विश्‍वास" करते हैं।

निष्कर्ष में, रोमियों 10:9-10 उद्धार के लिए एक शर्त के रूप में सार्वजनिक अंगीकार की स्थापना नहीं कर रहा है। इसकी अपेक्षा, इस बात पर जोर दे रहा है कि जब एक व्यक्ति मसीह पर भरोसा करता है और इसके परिणामस्वरूप उसे प्रभु के रूप में अंगीकार करता था तो यह उसके लिए सताव को ले आने को सुनिश्‍चित करता था, उस व्यक्ति ने वास्तविक रूप से उद्धार पाए जाने की गवाही को दिया था। जो लोग बचाए जाते हैं, वे मसीह को प्रभु के रूप में स्वीकार करेंगे, क्योंकि उन्होंने पहले से ही अपने मनों में विश्‍वास को उत्पन्न कर लिया है। बपतिस्मा और सभी अच्छे कामों के साथ, सार्वजनिक अंगीकार उद्धार प्राप्ति का साधन नहीं है; यह उद्धार के प्रमाण हैं।

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क्या उद्धार के लिए सार्वजनिक अंगीकार आवश्यक है रोमियों 10:9-10?