प्रायश्‍चित क्या है?


प्रश्न: प्रायश्‍चित क्या है?

उत्तर:
शब्द प्रायश्‍चित में विशेष रूप से परमेश्‍वर की तुष्टि या सन्तुष्टि का मूल विचार पाया जाता है। प्रायश्‍चित एक दो-पक्षीय गतिविधि है, जिसमें एक ठेस खाए हुए व्यक्ति के क्रोध को तुष्टि करना और उसके साथ मेल-मिलाप कर लेना सम्मिलित है।

परमेश्‍वर को तुष्ट करने की आवश्यकता कुछ धर्मों में सामान्य रूप से पाई जाती है। प्राचीन मूर्तिपूजक धर्मों के साथ-साथ आज भी कई धर्मों में, इस विचार की शिक्षा दी जाती है कि मनुष्य विभिन्न उपहारों या बलि चढ़ाने के द्वारा परमेश्‍वर को प्रसन्न अर्थात् तुष्टि करता है। तथापि, बाइबल सिखाती है कि परमेश्‍वर ने स्वयं ही एकमात्र साधन प्रदान किया है, जिसके माध्यम से उसका क्रोध तुष्ट हो सकता है और पापी मनुष्य उसके साथ मेल-मिलाप कर सकता है। नए नियम में, प्रायश्‍चित का कार्य सदैव परमेश्‍वर के काम को सन्दर्भित करता है, न कि मनुष्यों द्वारा दिए गए बलिदान या उपहार को। इसका कारण यह है कि मनुष्य नरक में अनन्त काल के जीवन को व्यतीत करने को छोड़कर स्वयं से परमेश्‍वर के न्याय को सन्तुष्ट करने में पूरी तरह से अक्षम है। कोई सेवा, बलिदान या उपहार नहीं है जो मनुष्य परमेश्‍वर को प्रस्तुत कर सकता है, जिस से यह परमेश्‍वर के पवित्र क्रोध को तुष्ट करे या उसके पूर्ण धार्मिकता को सन्तुष्ट कर दे। एकमात्र सन्तुष्टि, या प्रायश्‍चित ही है, जो परमेश्‍वर को स्वीकार्य हो सकती है और जो मनुष्य को उसके साथ मेल-मिलाप करा सकती है, जिसे परमेश्‍वर के द्वारा निर्मित किया जाना था। इस कारण से परमेश्‍वर के पुत्र, यीशु मसीह, मानवीय शरीर में संसार में पाप के लिए सही बलिदान और प्रायश्‍चित्त को दिया या "लोगों के पापों के लिए प्रायश्‍चित" बनने के लिए इस संसार में आ गया (इब्रानियों 2:17)।

शब्द प्रायश्‍चित को कई वचनों में प्रयोग किया गया है, ताकि यह समझ प्राप्त हो सके कि यीशु ने क्रूस पर अपनी मृत्यु के माध्यम से क्या किया है। उदाहरण के लिए, रोमियों 3:24-25 में मसीह में विश्‍वासियों को "परन्तु उसके अनुग्रह से उस छुटकारे के द्वारा जो मसीह यीशु में है, सेंतमेंत धर्मी ठहराए जाते हैं। उसे परमेश्‍वर ने उसके लहू के कारण एक ऐसा प्रायश्‍चित ठहराया, जो विश्‍वास करने से कार्यकारी होता है, कि जो पाप पहले किए गए और जिन पर परमेश्‍वर ने अपनी सहनशीलता के कारण ध्यान नहीं दिया। उनके विषय में वह अपनी धार्मिकता प्रगट करे।" रोमियों की पुस्तक में पौलुस के तर्क में पाए जाने वाले ये वचन एक महत्वपूर्ण बिन्दु हैं और वास्तव में सुसमाचार सन्देश के केन्द्र में हैं।

रोमियों के पहले तीन अध्यायों में, पौलुस ने तर्क दिया कि हर कोई, यहूदी और गैर-यहूदी समान रूप से, परमेश्‍वर के दण्ड और उसके क्रोध के योग्य के अधीन है (रोमियों 1:18)। हर किसी ने पाप किया है और परमेश्‍वर की महिमा से रहित है (रोमियों 3:23)। हम सभी उसके क्रोध और दण्ड के योग्य हैं। ईश्‍वर ने अपनी अनन्त कृपा और दया में एक तरीके को प्रदान किया है कि उसका क्रोध तुष्ट हो सकता है और हम उसके साथ मेल-मिलाप कर सकें। यह तरीका पापों के दण्ड के भुगतान के रूप में, उसके पुत्र, यीशु मसीह की बलिदान की मृत्यु के माध्यम से है। यह यीशु मसीह में परमेश्‍वर के पूर्ण बलिदान के रूप में विश्‍वास के माध्यम से होता है कि हमारा मेल-मिलाप परमेश्‍वर से होता है। यह केवल क्रूस के ऊपर मसीह की मृत्यु और तीसरे दिन उसके पुनरुत्थान के कारण है कि एक खोया हुआ पापी, जो नरक की प्राप्ति के योग्य था, पवित्र परमेश्‍वर के साथ मेल-मिलाप कर सकता है। सुसमाचार का अद्भुत सत्य यह है कि मसीही विश्‍वासियों को परमेश्‍वर के क्रोध से बचाया जाता है और परमेश्‍वर से इसलिए मेल-मिलाप नहीं किया जाता है, क्योंकि "प्रेम इस में नहीं कि हम ने परमेश्‍वर से प्रेम किया, पर इस में है कि उसने हम से प्रेम किया और हमारे पापों के प्रायश्‍चित के लिये अपने पुत्र को भेजा" (1 यूहन्ना 4:10)।

यीशु ने कहा है कि, "मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता" (यूहन्ना 14:6)। पापी मनुष्य के विरूद्ध परमेश्‍वर के क्रोध को शान्त करना ही एकमात्र तरीका है और हमारे लिए परमेश्‍वर से मेल-मिलाप करना यीशु मसीह के माध्यम से है। और कोई मार्ग ही नहीं है। यह सत्य 1 यूहन्ना 2:2 में भी सूचित किया गया है, "और वही हमारे पापों का प्रायश्‍चित है, और केवल हमारे ही नहीं वरन् सारे जगत के पापों का भी।" मसीह के बचाए जाने के काम का एक महत्वपूर्ण भाग परमेश्‍वर के क्रोध से छुटकारा है; क्रूस पर यीशु का किया गया प्रायश्‍चित ही केवल एक ऐसी बात है, जो पाप के प्रति परमेश्‍वर के ईश्‍वरीय दण्ड को दूर कर सकती है। जो लोग मसीह को अपने उद्धारकर्ता के रूप में अस्वीकार करते हैं और उस पर विश्‍वास करने से इन्कार करते हैं, उनके पास उद्धार की कोई आशा नहीं है। वे केवल परमेश्‍वर के क्रोध का सामना करने की ओर आगे बढ़ रहे हैं, जिसे उन्होंने न्याय के दिन के लिए इकट्ठा कर लिया है (रोमियों 2:5)। उनके पापों के लिए कोई दूसरा प्रायश्‍चित या बलिदान नहीं दिया जा सकता है।

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