क्या इसका क्या अर्थ है कि यीशु शान्ति का राजकुमार है (यशायाह 9:6)?


प्रश्न: क्या इसका क्या अर्थ है कि यीशु शान्ति का राजकुमार है (यशायाह 9:6)?

उत्तर:
यशायाह की भविष्यद्वाणी में आने वाले मसीह के बारे में कहा गया है, वह ऐसे कहता है कि:

"क्योंकि हमारे लिये एक बालक उत्पन्न हुआ, हमें एक पुत्र दिया गया है;

और प्रभुता उसके काँधे पर होगी,

और उसका नाम अद्भुत युक्‍ति करनेवाला पराक्रमी परमेश्‍वर, अनन्तकाल का पिता,

और शान्ति का राजकुमार रखा जाएगा" (यशायाह 9:6)।

युद्ध और हिंसा से भरे हुए इस संसार में, यह देखना कठिन है कि यीशु कैसे सर्व-सामर्थी परमेश्‍वर बन सकता है, जो मानवीय इतिहास में कार्य करता है और शान्ति का सार बनता है। परन्तु शारीरिक सुरक्षा और राजनीतिक सद्भावना का होना आवश्यक रूप से उस शान्ति को प्रदर्शित न करे जिसके बारे में बात की जा रही है (यूहन्ना 14:27)।

"शान्ति" के लिए इब्रानी शब्द शालोम अक्सर व्यक्तियों, समूहों और राष्ट्रों की निश्चिंतता और शान्तचित्तता के प्रगटीकरण को होने के सन्दर्भ में उपयोग किया जाता है। यूनानी शब्द ईरेन का अर्थ "एकता और समझौता" से है; पौलुस ने नए नियम की कलीसिया के उद्देश्य का वर्णन करने के लिए ईरेन शब्द का उपयोग किया है। परन्तु शान्ति का गहरा, अधिक आधारभूत अर्थ "परमेश्‍वर के साथ किसी व्यक्ति की पुनर्स्थापना में आने वाले आत्मिक सद्भावना के बारे में है।"

हम हमारी पापी अवस्था में, परमेश्‍वर के शत्रु हैं (रोमियों 5:10)। "परन्तु परमेश्‍वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा" (रोमियों 5:8)। मसीह के बलिदान के कारण, परमेश्‍वर का हमारे साथ शान्ति के सम्बन्ध को पुनर्स्थापित कर दिया जाता है (रोमियों 5:1)। यह हमारे मन और हमारे सृष्टिकर्ता के मध्य गहरी, स्थायी शान्ति है जिसे दूर नहीं किया जा सकता है (यूहन्ना 10:27-28) और "शान्ति के राजकुमार" के रूप में मसीह के काम की अन्तिम पूर्ति है।

परन्तु मसीह का बलिदान अनन्तकालीन शान्ति से हमारे लिए कहीं अधिक को प्रदान करती है; यह साथ ही हमें पवित्र आत्मा, हमारे सहायक के साथ सम्बन्ध बनाने की अनुमति देता है, जो हमें मार्गदर्शन देने का वादा करता है (यूहन्ना 16:7, 13)। इसके अतिरिक्त, पवित्र आत्मा स्वयं को हम में उन तरीकों से जीवन जीने के द्वारा प्रकट करेगा, जिन्हें हम सम्भवतः अपनी सामर्थ्य से नहीं जी सकते हैं, जिसमें प्रेम, आनन्द और शान्ति के साथ अपने जीवन को भरना सम्मिलित है (गलतियों 5:22-23)। यह प्रेम, आनन्द और शान्ति एक विश्‍वासी के जीवन में काम कर रहे पवित्र आत्मा के परिणाम स्वरूप हैं। वे हमारे अस्तित्व में उसकी उपस्थिति के प्रतिबिम्ब हैं। और, यद्यपि उनका सबसे गहरा, सबसे महत्वपूर्ण परिणाम हमें परमेश्‍वर के साथ प्रेम, आनन्द और शान्ति में रहने का है, वे लोगों के साथ हमारे सम्बन्धों को विस्तार देने में सहायता प्रदान नहीं कर सकते हैं।

और हमें इसकी बहुत अधिक आवश्यकता है — विशेषरूप से जब से ईश्‍वर हमें अन्य विश्‍वासियों के साथ उद्देश्य की एकता में एक साथ रहने के लिए बुलाता है, दीनता, नम्रता और धैर्य के साथ, "मेल के बन्धन में आत्मा की एकता रखने का यत्न कर" (इफिसियों 4:1-3)। उद्देश्य और नम्रता में यह एकता हमारे भीतर पवित्र आत्मा के काम के बिना और पुत्र के बलिदान के बिना परमेश्‍वर के साथ हमारा मेल असम्भव होगा।

विडम्बना यह है कि, शान्ति की सबसे हल्की परिभाषा, किसी व्यक्ति में शान्ति की उपस्थिति के प्रगटीकरण के बारे में समझना और इसे बनाए रखना सबसे कठिन हो सकता है। हम ईश्‍वर के साथ अपनी आत्मिक शान्ति प्राप्त करने या बनाए रखने के लिए कुछ भी नहीं कर सकते हैं (इफिसियों 2:8-9)। और, जबकि अन्य विश्‍वासियों के साथ एकता में रहना अत्यन्त कठिन हो सकता है, अपने जीवन में शान्ति को बनाए रखने को अक्सर असम्भव अनुभव किया जा सकता है।

ध्यान दें कि शान्ति बने रहने का अर्थ "सहज" बने रहने से नहीं है। यीशु ने कभी भी सहज बनने की प्रतिज्ञा नहीं की है; उसने केवल सहायता देने की प्रतिज्ञा की है। वास्तव में, उसने हमें परीक्षाओं (यूहन्ना 16:33) और जाँचों (याकूब 1: 2) के आने की अपेक्षा करने के लिए कहा है। परन्तु उसने यह भी कहा कि, यदि हम उसे पुकारते हैं, तो वह हमें" परमेश्‍वर की शान्ति, जो सारी समझ से परे" को प्रदान करता है (फिलिप्पियों 4:6-7)। यह बात कोई अर्थ नहीं रखती है कि हम किन कठिनाइयों का सामना करते हैं, हम उस शान्ति की मांग कर सकते हैं जो परमेश्‍वर के सामर्थी प्रेम से आती है जो हमारी अपनी सामर्थ्य या हमारे आस-पास की परिस्थिति के ऊपर निर्भर नहीं है।

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क्या इसका क्या अर्थ है कि यीशु शान्ति का राजकुमार है (यशायाह 9:6)?