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प्रश्न

क्या यीशु के लहू से याचना करना बाइबल सम्मत है?

उत्तर


"यीशु के लहू से याचना करने" की प्रार्थना में ऐसी शिक्षा दी जाती है, जिसकी पहचान विश्‍वास के वचन के आन्दोलन के आरम्भिक अगुवों से होती है। जब लोग "प्रार्थना में यीशु के लहू से याचना" करते हैं, तब वे इस वाक्यांश "मैं इस _______ के ऊपर मसीह के लहू से याचना करता हूँ" का उपयोग करते हुए किसी भी और प्रत्येक समस्या के ऊपर मसीह की सामर्थ्य के होने का "दावे" पालन करने को उद्धृत करते हैं।

चाहे कुछ भी क्यों न हो "यीशु के लहू से याचना" करने के कोई भी पवित्रशास्त्रीय आधार नहीं पाए जाते हैं। बाइबल में कहीं पर किसी ने कभी भी "मसीह के लहू से याचना" नहीं की है। जो "लहू से याचना" करते हैं, वह ऐसा इसलिए करते हैं कि मानो इन शब्दों में कोई जादुई शक्ति है या मानो इन्हें अपनी प्रार्थनाओं में उपयोग करने के द्वारा वे और अधिक सामर्थी हो जाएँगी। यह शिक्षा प्रार्थना के गलत निर्देशन और विधर्मी दृष्टिकोण से उत्पन्न हुई है कि प्रार्थना वास्तव में परमेश्‍वर की इच्छा को पूरा करने की अपेक्षा परमेश्‍वर को अपने मन की इच्छित बात की प्राप्ति से अधिक और कुछ करने के एक तरीके से ज्यादा नहीं है। पूरे का पूरा विश्‍वास के वचन के आन्दोलन की स्थापना इस झूठी शिक्षा पर हुई है कि विश्‍वास एक शक्ति है और यदि हम पर्याप्त विश्‍वास से प्रार्थना करते हैं, तो परमेश्‍वर हमें चंगाई, धन और प्रसन्नता की गारंटी देता है और यह कि वह हमें प्रत्येक समस्या और प्रत्येक दुर्घटना से बचाएगा। इस दृष्टिकोण में, परमेश्‍वर मात्र एक साधारण देव है, जिससे हम जो चाहे उसे प्राप्त कर सकते हैं, इसकी अपेक्षा कि वह एक पवित्र, सर्वोच्च, पूर्ण और धर्मी सृष्टिकर्ता है, जिसे बाइबल हमें प्रगट करती है कि वह ऐसा ही है।

जो विश्‍वास के वचन के इस झूठ की शिक्षा देते हैं, उनके पास मनुष्य के बारे में एक उच्च दृष्टिकोण है और हम जिसे चाहते हैं, और प्राप्त करना चाहते हैं, उसके लिए परमेश्‍वर से याचना करना "अधिकार" मानते हैं, जिससे कि परमेश्‍वर को उन्हें उत्तर देना ही चाहिए। यह बाइबल के सच्चे विश्‍वास के विरोध में है, जिसे पौलुस के जीवन में और दु:खों और परीक्षाओं के प्रति उसके दृष्टिकोण में प्रदर्शित किया गया है। पौलुस ने 2 तीमुथियुस में लिखा है कि "पर जितने मसीह यीशु में भक्ति के साथ जीवन बिताना चाहते हैं, वे सब सताए जाएँगे" (2 तीमुथियुस 3:12)। परन्तु विश्‍वास के वचन की शिक्षा यह है कि यदि हम दु:खी हैं या बीमार हैं या पाप के साथ संघर्षरत् है, तो इसका कारण यह है कि हमारे पास पर्याप्त विश्‍वास नहीं है या हम यीशु के लहू से जो कुछ "अधिकार के साथ" हमारा है, उसके लिए याचना नहीं कर रहे हैं। परन्तु हम पौलुस को मसीह के लहू से याचना करते हुए या दावा करते हुए नहीं देखते हैं कि उसका "अधिकार के साथ" सही क्या है, जब वह परीक्षाओं और सताव का सामना कर रहा था। इसकी अपेक्षा हम उसके मसीह में न डगमगाने वाले विश्‍वास को देखते हैं, चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी क्यों न हो: "इस कारण मैं इन दु:खों को भी उठाता हूँ, पर लजाता नहीं, क्योंकि मैं उसे जिस पर मैं ने विश्‍वास किया है, जानता हूँ, और मुझे निश्चय है कि वह मेरी धरोहर की उस दिन तक रखवाली कर सकता है" (2 तीमुथियुस 1:12)।

पौलुस ने "यह सीखा है कि जिस दशा में हूँ; उसी में सन्तोष करूँ। मैं दीन होना भी जानता हूँ और बढ़ना भी जानता हूँ; हर एक बात और सब दशाओं में मैं ने तृप्त होना, भूखा रहना, और बढ़ना-घटना सीखा है। जो मुझे सामर्थ्य देता है उसमें मैं सब कुछ कर सकता हूँ" (फिलिप्पियों 4:11-13)। पौलुस का विश्‍वास केवल मसीह में ही था, और वह दृढ़ता पूर्वक निश्चय के साथ यह कह सका कि "और प्रभु मुझे हर एक बुरे काम से छुड़ाएगा और अपने स्वर्गीय राज्य में सुरक्षित पहुँचाएगा। उसी की महिमा युगानुयुग होती रहे। आमीन!" (2 तीमुथियुस 4:18)।

"लहू से याचना करना" का रूप सामान्यतया रहस्यवाद की बातों के अभ्यास के साथ अधिक अनुरूपता में पाया जाता — एक जादुई फार्मूले अर्थात् सूत्र का उच्चारण करना और यह अपेक्षा करना कि यह कार्य करता है — इसकी अपेक्षा यह बाइबल आधारित प्रार्थना है, जो कार्य करती है। कुछ निश्चित शब्दों को कहने से हमारी प्रार्थनाएँ जादुई रूप से अधिक शक्तिशाली नहीं बन जाती हैं। इसके अतिरिक्त, मसीह के "लहू से याचना" करना शैतान को पराजित करने के लिए आवश्यक नहीं है। वह तो पहले से ही पराजित है, और यदि हम सच में नए जन्म पाए हुए हैं, तब तो शैतान के पास हमारे ऊपर कोई अधिकार नहीं है, उसे छोड़ कर जिसे परमेश्‍वर ने अपने उद्देश्य और महिमा के लिए हो जाने की अनुमति उसे प्रदान की है। कुलुस्सियों 1:13 इसे बहुत ही सिद्धता के साथ स्पष्ट कर देता है: "उसी ने हमें अन्धकार के वश से छुड़ाकर अपने प्रिय पुत्र के राज्य में प्रवेश कराया, जिस से हमें छुटकारा अर्थात् पापों की क्षमा प्राप्त होती है।"

सामर्थ्य या सुरक्षा प्राप्ति के लिए मसीह के "लहू से याचना" करने की अपेक्षा मसीही विश्‍वासियों को याकूब 4:7 में दी हुई आज्ञा का पालन करना चाहिए, "इसलिये परमेश्‍वर के अधीन हो जाओ, और शैतान का सामना करो, तो वह तुम्हारे पास से भाग निकलेगा।" प्रार्थना के एक गैर-बाइबल आधारित आदर्श का अभ्यास करने की अपेक्षा, हमें पवित्रशास्त्र के सरल उपदेशों का पालन करना चाहिए -परमेश्‍वर के सामने एक पवित्र जीवन जीना चाहिए, अपने सभी विचारों को पापों के लिए स्थान न देते हुए उनसे बचने के लिए अंगीकार करके उन्हें बाँधते हुए, अपने पापों का तब अंगीकार करना जब हम उन पहले के दो उपदेशों का अभ्यास करने में विफल हो जाते हैं, और इफिसियों 6:13-17 में उल्लिखित परमेश्‍वर के पूर्ण हथियारों को धारण करने के द्वारा पालन करना चाहिए।

बाइबल मसीह में विजयी जीवन को यापन करने के लिए अँसख्य निर्देशों को प्रदान करती है, और यीशु के "लहू से याचना" करना उनमें से एक नहीं है। हमें मसीह के लहू के द्वारा धो दिया गया है और वह हमारा महायाजक और मध्यस्थक है, जो "सदैव हमारे लिए मध्यस्थता" का कार्य कर रहा है (इब्रानियों 7:25)। इब्रानियों। उसकी भेड़ों के रूप में हम पहले से ही उसकी सुरक्षा में हैं; हमें तो जो कुछ उसने पहले से ही प्रतिज्ञा की है और प्रदान किया है, मात्र उसके ऊपर दिन प्रतिदिन भरोसा करने की आवश्यकता है।

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