परमेश्‍वर की प्रजा कौन है?


प्रश्न: परमेश्‍वर की प्रजा कौन है?

उत्तर:
वाक्यांश "परमेश्‍वर की प्रजा" या लोग सदैव ही एक स्पष्ट सम्बन्ध के होने का संकेत देता है। परमेश्‍वर ने अब्राम (बाद में अब्राहम) को उत्पत्ति 12 में उसकी भूमि को छोड़ एक नई भूमि की ओर जाने के लिए बुलाहट दी थी, जिसे परमेश्‍वर उसे भविष्य में दिखाता। जब अब्राम ने उसकी आज्ञा का पालन किया, तब परमेश्‍वर ने उत्पत्ति 12:2 में कहा, "मैं तुझ में से एक बड़ी जाति बनाऊँगा। और मैं तेरा नाम महान् करूँगा और तुझे आशीष दूँगा।" यह जाति इस्राएल की जाति बन जाएगी, यह परमेश्‍वर की प्रजा या लोगों के रूप में ठहराया हुआ प्रथम समूह है।

परमेश्‍वर भविष्यद्वक्ता यशायाह के द्वारा इस्राएल को यह कहता है, "मैं ने तेरे मुँह में अपने वचन डाले, और तुझे अपने हाथ की आड़ में छिपा रखा है — कि आकाश को तानूँ और पृथ्वी की नींव डालूँ, और सिय्योन से कहूँ, 'तुम मेरी प्रजा हो'" (यशायाह 51:16)। परमेश्‍वर यहेजकेल 38:14 में इस्राएल के साथ रहने वाली एक पड़ोसी जाति गोग के लिए की गई भविष्यद्वाणी में उसे अपनी प्रजा के लोग होने की पुष्टि करता है।

क्या गैर-यहूदी विश्‍वासियों में प्रतिज्ञा किए हुए मसीह में विश्‍वास करने वाले यहूदियों को परमेश्‍वर की प्रजा माना जा सकता है? हाँ, यीशु केवल इस्राएल को ही नहीं, अपितु सारी मानवजाति को बचाने के लिए आया था (रोमियों 1:16, 10:12; गलातियों 3:28)। परमेश्‍वर का उसकी प्रजा के साथ सम्बन्ध उसकी दी हुई बुलाहट से कहीं अधिक बढ़कर है; वे साथ ही उसे अपना परमेश्‍वर भी कह कर पुकारते हैं। दाऊद कहता है, "हे मेरे परमेश्‍वर! मैं जानता हूँ कि तू मन को जाँचता है और सिधाई से प्रसन्न रहता है, मै ने तो यह सब कुछ मन की सिधाई और अपनी इच्छा से दिया है; और अब मैं ने आनन्द से देखा है कि तेरी प्रजा के लोग जो यहाँ उपस्थित हैं, वे अपनी इच्छा से तेरे लिये भेंट देते हैं" (1 इतिहास 29:17)। यहाँ पर, परमेश्‍वर की प्रजा को उनकी जाति की तुलना में स्वयं को देने के लिए उनकी इच्छा से कहीं अधिक पहचान की जाती है।

यीशु मसीह को अपना उद्धारकर्ता और प्रभु करके स्वीकार करने वाला कोई भी परमेश्‍वर की प्रजा हो जाता है। यह सम्बन्ध कलीसियाई सहभागिता या भले कार्यों को करने के द्वारा नहीं आता है। यह केवल परमेश्‍वर के ही पीछे चलने के लिए स्वेच्छा से किया निर्णय है। इसलिए ही 2 कुरिन्थियों 6:16 और मरकुस 8:38 दोनों ही संकेत देते हैं कि एक निर्णय को लिया जाना आवश्यक है। और जब हम परमेश्‍वर को अपना लेने के निर्णय को ले लेते हैं, तो वह भी हमें अपना लेता है। तब हम वास्तव में उसकी प्रजा के लोग होते हैं।

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परमेश्‍वर की प्रजा कौन है?