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प्रश्न

हताशा पर जय पाने की कुँजी क्या है?

उत्तर


जब हम हताश होते हैं, तो हम आगे बढ़ने की प्रेरणा को खो देते हैं। पहाड़ बहुत अधिक कठोर लगता है, घाटी बहुत अधिक अन्धेरी हो जाती, या लड़ाई भी भयंकर प्रतीत होती है, और हम आगे बढ़ने के साहस को खो देते हैं।

पवित्रशास्त्र में कई स्थानों पर, परमेश्‍वर अपने लोगों को साहस लेने की आज्ञा देता है (भजन संहिता 27:14; 31:24; 2 इतिहास 32:7; व्यवस्थाविवरण 31:6)। जब परमेश्‍वर ने मूसा के स्थान पर इस्राएलियों के लिए यहोशू के रूप में अगुवे का चयन किया, तो यहोशू के लिए उसके सबसे पहले शब्दों में से कुछ ये थे “क्या मैं ने तुझे आज्ञा नहीं दी? हियाव बाँधकर दृढ़ हो जा; भय न खा, और तेरा मन कच्‍चा न हो; क्योंकि जहाँ जहाँ तू जाएगा वहाँ वहाँ तेरा परमेश्‍वर यहोवा तेरे संग रहेगा” (यहोशू 1:9)। यहोवा ने वचन 5 में यहोशू को अपनी अतीत की प्रतिज्ञा पर यह आदेश दिया: “तेरे जीवन भर कोई तेरे सामने ठहर न सकेगा; जैसे मैं मूसा के संग रहा वैसे ही तेरे संग भी रहूँगा; और न तो मैं तुझे धोखा दूँगा, और न तुझ को छोड़ूँगा।” यहोवा परमेश्‍वर जानता था कि यहोशू कुछ बड़ी लड़ाइयों का सामना करने पर है, और वह नहीं चाहता था कि उसका दास हताश हो जाए।

हताशा पर नियन्त्रण पाने की कुँजी परमेश्‍वर की प्रतिज्ञाओं को स्मरण रखना है और उन्हें अपने जीवन पर लागू करना है। जब हम प्रभु को जानते हैं, तो हम उसके उन वचनों पर खड़े हो सकते हैं, जो उसने अपने लोगों को उसके वचन में दिए हैं। हम इस जीवन में उन प्रतिज्ञाओं को पूरा होते हुए देखते हैं या नहीं, उसकी प्रतिज्ञा अभी भी स्थिर हैं (इब्रानियों 11:13-16)। इस ज्ञान ने प्रेरित पौलुस को, सुसमाचार का प्रचार करते हुए आगे बढ़ाया, अन्ततः वह रोमी जेल में जाकर रूका, जहाँ उसके जीवन का अन्त हुआ। जेल से, उसने ऐसे लिखा है, "निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूँ, ताकि वह इनाम पाऊँ जिसके लिये परमेश्‍वर ने मुझे मसीह यीशु में ऊपर बुलाया है" (फिलिप्पियों 3:14)। वह सताव, अस्वीकृति, मार खाने, और हताशा के मध्य में आगे बढ़ा क्योंकि उसकी आँखें उस बड़े इनाम के ऊपर टिकी थीं: जो कि उसके प्रभु और उद्धारकर्ता से "अच्छा किया!" शब्दों को सुनना था (देखें मत्ती 25:23; प्रकाशितवाक्य 22:12)।

जब हम अपने आस-पास के लोगों से इनाम या पुष्टि चाहते हैं, तो हम आसानी से हताश हो जाते हैं। यदि हमारी सेवा या आज्ञाकारिता तत्काल सन्तुष्टि पर आधारित है, तो हम स्वयं को हताश होने के लिए तैयार कर सकते हैं। यीशु सदैव आसान रास्ता नहीं अपनाता था, और उसने अपने अनुयायियों को भी इसी बात का विचार करने के लिए चेतावनी दी कि वे आरम्भ करने से पहले सोच लें (लूका 14:25–33)। जब हमने पहले ही शिष्यता की कीमत को गिना है, तो हमारे पास आगे की लड़ाइयों का सामना करने के लिए और अधिक सामर्थ्य है। जब बातें हमारे मार्ग से नहीं जाती हैं, तौभी हम आसानी से हताश नहीं होते हैं, क्योंकि हम जानते हैं कि युद्ध यहोवा परमेश्‍वर का है (1 शमूएल 17:47)।

हताशा एक चेतावनी से भरा हुआ प्रकाश हो सकता है, जो हमें सुझाव दे रहा है कि हमने अपने प्राथमिक ध्यान को खो दिया है। जब हम हताशा को महसूस करते हैं, तो यह प्रभु के साथ अकेले रहने में सहायता प्रदान करता है और उसे हमारे मनों और हमारे उद्देश्यों की जाँच करने की अनुमति देता है (भजन संहिता 139:23)। अक्सर, यह घमण्ड, लालच, या लोभ होता है, जो हम में हताशा का पोषण कर रहा होता है। कई बार हताश होने की भावना उस बात से आती है, जो हमारे पास नहीं है, परन्तु हम विश्‍वास करते हैं कि यह है। जब हम उस स्वभाव को पाप के रूप में पहचानते हैं, तो हम पश्‍चाताप कर सकते हैं, स्वयं को नम्र कर सकते हैं, और ऐसा होने दें कि पवित्र आत्मा हमारी अपेक्षाओं को सही रूप में स्थापित करें। जब हम हताशा को एक स्मरण दिलाने वाले के रूप में उपयोग करते हैं कि हमारी प्राथमिकताएँ विषम हो गई हैं, तब हताश करने वाली भावना हमें यीशु की जैसे और अधिक बनाने के लिए एक परिष्कृत उपकरण बन सकती है (रोमियों 8:29 को देखें)।

भजनकार हताश होने के प्रति अनजान नहीं था, और उसकी प्रतिक्रिया परमेश्‍वर को स्मरण करने और उसके वचन की प्रतिज्ञाओं के ऊपर भरोसा करने की थी:
"हे मेरे प्राण, तू क्यों गिरा जाता है?
तू अन्दर ही अन्दर क्यों व्याकुल है?
परमेश्‍वर पर आशा लगाए रह;
क्योंकि मैं उसके दर्शन से उद्धार पाकर
फिर उसका धन्यवाद करूँगा।
हे मेरे परमेश्‍वर; मेरा प्राण मेरे भीतर
गिरा जाता है...
तुझे स्मरण करता हूँ”(भजन संहिता 42:5–6)।

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