त्रिएकत्व के सिद्धान्त की उत्पत्ति क्या है?


प्रश्न: त्रिएकत्व के सिद्धान्त की उत्पत्ति क्या है?

उत्तर:
त्रिएकत्व मसीही विश्वासी का सबसे अनोखा, परिभाषित करने वाला, समझ से परे और श्रद्धा से भरा हुआ रहस्य है। यह इस बात का प्रकाशन है कि हमारा सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता वास्तव में कौन है — वह मात्र एक देवता नहीं, अपितु अनन्तता से अनन्त रूप से तीन सह-समान, अनन्त व्यक्ति, एक तत्व तथापि एक दूसरे से भिन्न होते हुए विद्यमान है। त्रिएकत्व के सिद्धान्त की उत्पत्ति बाइबल से हुई है, यद्यपि त्रिएकत्व शब्द का उपयोग बाइबल में नहीं किया गया है।

जैसा कि सभी बाइबल सम्मत मसीही विश्वासी सहमत हैं, त्रिएकत्व के सिद्धान्त की मान्यता है कि परमेश्वर का एक ही सार है तथापि वह तीन व्यक्ति में हैं; परमेश्वर का एक स्वभाव है, तथापि चेतना के तीन केन्द्र हैं; परमेश्वर केवल एक ही है, तथापि तीन व्यक्ति है। कुछ अविश्वासियों ने गलती से इसे विरोधाभास कहा है। इसकी अपेक्षा, त्रिएकत्व का सिद्धान्त परमेश्वर के द्वारा उसके वचन में प्रकट किया गया एक रहस्य है। एक विरोधाभास यह दावा करना होगा कि परमेश्वर का केवल एक ही स्वभाव है, परन्तु तीन स्वभाव भी हैं, या यह कि वह केवल एक व्यक्ति है, परन्तु तीन व्यक्ति भी हैं।

कलीसिया के आरम्भ से ही, मसीही विश्वासी त्रिएकत्व के रहस्य को समझ चुके थे, यहाँ तक कि इससे पहले कि वे त्रिएक शब्द का उपयोग भी करते।

उदाहरण के लिए, आरम्भिक मसीही विश्वासी जानते थे कि पुत्र सृष्टिकर्ता था (यूहन्ना 1:1-2), जो कि पुराने नियम का "मैं हूँ" है (निर्गमन 3:14; यूहन्ना 8:58), वह पिता के तुल्य है (यूहन्ना 14:9), और सारी पृथ्वी का न्यायी है (उत्पत्ति 18:25; यूहन्ना 5:22), जिसकी आराधना केवल परमेश्वर के रूप में ही की जानी चाहिए (व्यवस्थाविवरण 6:13; लूका 4:8; मत्ती 14:33)।

आरम्भिक मसीही विश्वासी जानते थे कि पवित्र आत्मा अपने स्वयं के विचारों और इच्छाशक्ति (यूहन्ना 16:13) के साथ एक भिन्न व्यक्ति था, जो परमेश्वर से हमारे लिए मध्यस्थता करता है (रोमियों 8:27), जो यह प्रमाणित करता है कि वह परमेश्वर पिता से एक भिन्न व्यक्ति है — क्योंकि मध्यस्थता के लिए कम से कम दो पक्षों के होने की आवश्यकता होती है (कोई भी स्वयं के साथ मध्यस्थता नहीं कर सकता)। इसके अतिरिक्त, एक मनुष्य को परमेश्वर पुत्र की निन्दा किए जाने के लिए क्षमा किया जा सकता है, परन्तु परमेश्वर के पवित्र आत्मा की निन्दा किए जाने को क्षमा नहीं किया जा सकता है (मत्ती 12:32)।

नए नियम के लेखकों ने त्रिएकत्व के तीनों व्यक्तियों का कई बार एक साथ उल्लेख किया (जैसे, रोमियों 1:4; 15:30; 2 कुरिन्थियों 13:14; इफिसियों 1:13-14; 1 थिस्सलुनीकियों 1:3-6)। आरम्भिक विश्वासियों को पता था कि पिता और पुत्र ने त्रिएक के तीसरे व्यक्ति, पवित्र आत्मा को — "एक और परामर्शदाता" के रूप में भेजा है — जो हमारे मनों में वास करता है (यूहन्ना 14:16-17, 26; 16:7)। इन रहस्यों को आरम्भिक कलीसिया के द्वारा पूरी तरह से सच के रूप में स्वीकार किया गया था, तौभी "पवित्र त्रिएकत्व" के संकेत चिन्ह के बिना।

पुराने नियम ने त्रिएकत्व की झलक प्रदान की है, और पवित्रशास्त्र का कोई भी वचन इस धर्मसिद्धान्त का खण्डन नहीं करता है। उदाहरण के लिए, उत्पत्ति 1:26 में परमेश्वर बहुवचन में कहता है, "हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएँ।" परमेश्वर घोषणा करता है कि जब उसने सब कुछ बनाया, तो वह पूरी तरह से अकेला था, वह "अकेला ही" आकाश को तानता और पृथ्वी को फैलाता है (यशायाह 44:24)। तौभी यीशु, परमेश्वर की सृष्टि का साधन (यूहन्ना 1:1-3; कुलुस्सियों 1:16), पवित्र आत्मा की संगति में था जो गहरे जल के ऊपर मण्डरा रहा था (उत्पत्ति 1:2)। केवल त्रिएकत्व का सिद्धान्त ही यह सब कुछ समझा सकता है।

तोराह अर्थात् पंचग्रन्थ ने कई व्यक्तियों में विद्यमान होने के परमेश्वर के विचार के ऊपर संकेत दिया है और उसके शरीर में आने की भविष्यद्वाणी की है। पुराना नियम एक आने वाले विश्व शासक के सन्दर्भ से भरा हुआ है (उत्पत्ति 49:10), जो बेतलहम में जन्म लेगा (मीका 5:2), जो न केवल परमेश्वर का पुत्र होगा (यशायाह 9:6), परन्तु प्रतिज्ञा किया हुआ मसीह भी होगा जो शरीर में परमेश्वर होगा (यशायाह 7:14; जकर्याह 2:8-11)। परन्तु यहूदी रोमन शासन के अधीन, और बड़ी आशा के साथ, एक विजयी — जय पाने वाले मसीहा के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे, न कि एक दीन पीड़ित, दु:ख उठाने वाले सेवक की (यशायाह 53)। इस्त्राएल उसके साधारणपन के कारण परमेश्वर के पुत्र को पहचानने में विफल रहा (यशायाह 53:2; मत्ती 13:54-58; यूहन्ना 10:33), और उन्होंने उसे मार डाला (जकर्याह 12:10; प्रेरितों के काम 2:36)।

अन्तिम प्रेरित, यूहन्ना की मृत्यु के बाद के वर्षों में, मसीही विश्वासी धर्मशास्त्रियों के द्वारा कलीसिया में परमेश्वर को परिभाषित करने और समझाने के कई प्रयास किए गए। सांसारिक प्राणियों को आत्मिक वास्तविकता की व्याख्या करने की सदैव कमी रहेगी; कुछ शिक्षकों के स्पष्टीकरण बहुत ही कमजोर थे, जबकि अन्य गलत शिक्षा में चले गए। प्रेरितों के युग के-पश्चात् त्रुटियों ने यीशु को परमेश्वर होने से लेकर उसके द्वारा केवल मानवीय आभास में प्रगट होने (रूपाभासवाद), उसके अनन्त होने की अपेक्षा सृजे हुए होने (गोदवाद, एरियनवाद और अन्य), एक ही परिवार में तीन भिन्न ईश्वरों के रूप में होने (त्रिदेववाद), एक परमेश्वर का भिन्न-भिन्न समय पर तीन भिन्न-भिन्न भूमिकाओं को निभाने वाला होना (पर्यायवाद, राजतन्त्रवाद) जैसी शिक्षाओं में डाल दिया ।

जैसा कि कोई भी धर्म यह जाने बिना विद्यमान नहीं हो सकता है कि उसके अनुयायी किसकी आराधना करते हैं, इस तरह से परमेश्वर को परिभाषित करने की बहुत अधिक आवश्यकता थी ताकि मसीही विश्वास के सभी अनुयायी "आधिकारिक" या शास्त्र सम्मत धर्मसिद्धान्त से सहमत हों। और, यदि यीशु परमेश्वर नहीं था, तो सभी मसीही विश्वासी एक सृजे हुए प्राणी की आराधना करते हुए गलत शिक्षा का पालन कर रहे थे।

ऐसा प्रतीत होता है कि कलीसियाई धर्माचार्य तरतुलियन (ईस्वी सन् 160-225) ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने शब्द त्रिएकत्व को परमेश्वर की संज्ञा देने के लिए उपयोग किया। तरतुलियन ने ईस्वी सन् 213 में लिखी हुई पुस्तक अगेंस्ट प्रिक्सियस अर्थात् प्राक्सीक्युस के विरुद्ध अपने वाद में इस शब्द का उपयोग किया, जिसमें त्रिएकत्व के विषय को अपने समकालीन प्राक्सीक्युस की शिक्षा के विरुद्ध समझाने और इसका बचाव करने के लिए लिखा गया था, जिसने मोनार्कियन अर्थात् राजतन्त्रवाद आधारित गलत शिक्षा का सहारा लिया था। वहाँ से, हम एक सदी तक चलती रहने वाली कलीसियाई चर्चा, गुटबाजी और फिर 325 में हुई नीकिया की काऊँसिल में पहुँचते हैं, जब त्रिएकत्व की आधिकारिक कलीसियाई धर्मसिद्धान्त के रूप में अन्ततः पुष्टि की गई।

एक अन्तिम अवलोकन — धर्मविज्ञान त्रुटिपूर्ण मनुष्यों के द्वारा बाइबल के वचनों को समझने का प्रयास है, जिस प्रकार विज्ञान त्रुटिपूर्ण मनुष्यों के द्वारा प्रकृति के तथ्यों को समझने का प्रयास है। जैसे प्रकृति के सभी तथ्य सत्य हैं वैसे ही बाइबल के सभी मूल शब्द सत्य हैं। परन्तु मनुष्य सीमित हैं और बहुत सारी गलतियाँ करते हैं, जैसा कि इतिहास निरन्तर दिखाता आया है। इसलिए, जहाँ कहीं विज्ञान या धर्मविज्ञान में त्रुटि या असहमति होती है, दोनों शिक्षाओं में सुधार के तरीके पाए जाते हैं। आरम्भिक कलीसिया के इतिहास से पता चलता है कि कई निष्ठावान मसीही विश्वासियों ने "गलत की" जब बात परमेश्वर के स्वभाव (विनम्रता की आवश्यकता पर एक बड़ी शिक्षा) को परिभाषित करने की आई। परन्तु, परमेश्वर के वचन के सावधानीपूर्वक अध्ययन के माध्यम से, कलीसिया अन्त में यह स्पष्ट करने में सक्षम हुई कि बाइबल स्पष्ट रूप से क्या सिखाती है और वे जिसे जानते थे कि वह सत्य है — वह परमेश्वर का एक अनन्त त्रिएक के रूप में विद्यमान होना है।

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