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प्रश्न

केवल यीशु/एकतावादी पेन्टीकॉस्टल अनुयायियों की क्या मान्यताएँ हैं?

उत्तर


जीज़स ओनली अर्थात् "केवल यीशु" आन्दोलन जिसे साथ ही एकतावादी पेन्टीकॉस्टल या एकतावादी धर्मविज्ञान के नाम से भी जाना जाता है, यह शिक्षा देता है कि केवल परमेश्‍वर केवल एक ही है, परन्तु यह साथ ही परमेश्‍वर की त्रि-एकता का खण्डन करता है। दूसरे शब्दों में, एकतावादी धर्मविज्ञान यह स्वीकार नहीं करता है कि परमेश्‍वरत्व में भिन्न व्यक्ति : अर्थात् पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा सम्मिलित हैं। इसके कई स्वरूप हैं — कुछ यीशु ही को एक परमेश्‍वर के रूप में देखते हैं, जो कभी-कभी स्वयं को पिता या पवित्र आत्मा के रूप में प्रगट करता है। एकतावादी पेन्टीकॉस्टल/केवल यीशु के धर्मसिद्धान्त का केन्द्र केवल यही है कि यीशु ही पिता है और यीशु ही आत्मा है। केवल एक ही परमेश्‍वर है, जो स्वयं को विभिन्न "तरीकों" से प्रगट करता है।

यीशु केवल/एकतावादी पेन्टीकॉस्टल की शिक्षा पिछली कई शताब्दियों से, इस या उस तरह से पर्यायवाद के रूप में पाई जाती है। पर्यायवाद यह शिक्षा देता है कि परमेश्‍वर ने विभिन्न रूपों या तरीकों में विभिन्न समयों में — कई बार पिता, कई बार पुत्र और कई बार पवित्र आत्मा के रूप में कार्य किया। परन्तु मत्ती 3:16-17 जैसे सन्दर्भ, जहाँ दो या त्रिएकत्व के सभी तीनों व्यक्ति उपस्थित हैं, इस पर्यायवादी दृष्टिकोण के विरोधाभासी हैं। पर्यायवादी दृष्टिकोण का आरम्भ में ही दूसरी शताब्दी में भ्रान्त शिक्षा के रूप में खण्डन किया गया था। आरम्भिक कलीसिया ने बड़ी सामर्थ्य के साथ इस दृष्टिकोण का खण्डन यह कहते हुए किया कि परमेश्‍वर बड़ी दृढ़ता के साथ एकवचनीय व्यक्ति के रूप में है, जिसने विभिन्न समयों में विभिन्न रूपों में कार्य किया है। उन्होंने पवित्रशास्त्र से तर्क दिए कि परमेश्‍वर का त्रि-एकत्व स्पष्ट है, जो परमेश्‍वरत्व के एक से अधिक व्यक्तियों में अक्सर एक साथ देखा जाता है, और वे अक्सर परस्पर एक-दूसरे से वार्तालाप करते हैं (उदाहरण : उत्पत्ति 1:26; 3:22;11:7; भजन संहिता 2:7; 104:30; 110:1; मत्ती 28:19; यूहन्ना 14:16)। एकतावादी पेन्टीकॉस्टल/केवल यीशु बाइबल आधारित धर्मसिद्धान्त नहीं है।

दूसरी ओर, परमेश्‍वर के त्रि-एकत्व की अवधारणा, पूरे पवित्र शास्त्र में उपस्थित है। यह एक ऐसी अवधारणा नहीं है, जिसे आसानी से अपने सीमित मन के द्वारा आत्मसात् किया जा सके। और क्योंकि मनुष्य अपने धर्मविज्ञान में प्रत्येक बात के भावार्थ की खोज करता है, इसलिए केवल यीशु जैसे आन्दोलन — यहोवा विटनेसेस अर्थात् यहोवा के साक्षियों का उल्लेख न करते हुए — निरन्तर परमेश्‍वर के स्वभाव की व्याख्या करने के लिए उठते रहते हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि ऐसा करना बाइबल के मूलपाठ से छेड़छाड़ किए बिना सम्भव नहीं है। मसीही विश्‍वासी इस बात को स्वीकार करने लगे हैं कि परमेश्‍वर का स्वभाव ऐसी सीमाओं के अधीन हैं, जिसे हम उसके स्वभाव के ऊपर थोपना चाहेंगे। हम बड़ी सरलता के साथ उसमें विश्‍वास करते हैं, जब वह यह कहता है, "क्योंकि यहोवा कहता है, 'मेरे विचार और तुम्हारे विचार एक समान नहीं हैं, न तुम्हारी गति और मेरी गति एक सी है। क्योंकि मेरी और तुम्हारी गति में और मेरे और तुम्हारे सोच विचारों में, आकाश और पृथ्वी का अन्तर है'" (यशायाह 55:8-9)। यहि हम उसके विचारों और गति को नहीं समझते हैं, तब हम यह स्वीकार करते हैं कि हम उसके स्वभाव को भी पूरी तरह नहीं समझ सकते हैं।

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